जामताड़ा: शारदीय नवरात्र के आगमन से पहले प्रकृति ने भी मां दुर्गा के स्वागत की तैयारी शुरू कर दी है. जामताड़ा जिले के ग्रामीण इलाकों में इन दिनों खेतों की मेड़ों, नदी किनारे और खुले मैदानों में खिले सफेद काश के फूल लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं. मंद-मंद बहती हवा के साथ लहराते काश के फूल शरद ऋतु के आगमन और दुर्गोत्सव की आहट का एहसास करा रहे हैं.


आसमान में तैरते सफेद बादलों के बीच धरती पर दूर तक फैले काश के सफेद फूल मनमोहक दृश्य प्रस्तुत कर रहे हैं. ऐसा प्रतीत हो रहा है, मानो प्रकृति स्वयं मां दुर्गा के स्वागत के लिए सज-संवर रही हो. वर्षा ऋतु के समापन और शरद ऋतु के आगमन के साथ ही काश के फूल पूरी तरह खिलने लगते हैं. नदी और जलाशयों के किनारे, बलुई जमीन, ग्रामीण क्षेत्रों तथा पहाड़ी इलाकों में इनकी अधिकता देखने को मिलती है.
काश एक प्रकार की घास है, जिसका प्राकृतिक और औषधीय महत्व भी बताया जाता है. हालांकि, दुर्गापूजा के मौसम में इसका महत्व केवल प्राकृतिक सौंदर्य तक सीमित नहीं रहता. काश के सफेद फूल शारदीय नवरात्र और दुर्गोत्सव के आगमन के प्राकृतिक संकेत के रूप में भी देखे जाते हैं.
शरद ऋतु ने बिखेरी प्राकृतिक सुंदरता. शरद ऋतु की दस्तक के साथ नीला आसमान, सफेद बादल, खिले कमल, पकते धान की झुकी बालियां और लहराते काश के फूल ग्रामीण अंचलों की सुंदरता बढ़ा रहे हैं. हल्की हवा के झोंकों के साथ झूमते काश के फूल वातावरण में शांति और सादगी का एहसास कराते हैं. यही कारण है कि भारतीय साहित्य और काव्य में शरद ऋतु का विशेष स्थान रहा है.
महाकवि कालिदास ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ऋतुसंहार में शरद ऋतु के सौंदर्य का मनोहारी वर्णन किया है. शरद के स्वच्छ आकाश, खिले कमल, काश के उज्ज्वल फूल और हंसों के कलरव को उन्होंने इस ऋतु की सुंदरता से जोड़ा है.
दुर्गापूजा से गहरा जुड़ा है काश का फूल. काश के फूलों का संबंध विशेष रूप से बंगाल की दुर्गापूजा की सांस्कृतिक परंपरा से गहराई से जुड़ा हुआ है. दुर्गोत्सव से पहले खेतों और नदी किनारे खिलने वाले सफेद काश के फूलों को मां दुर्गा के आगमन का प्राकृतिक संकेत माना जाता है. बंगाली साहित्य, कला और दुर्गापूजा से जुड़ी सामग्री में भी काश के फूलों का चित्रण देखने को मिलता है.
काश के सफेद फूलों का यह मौसम केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं देता, बल्कि शक्ति, शांति और उल्लास के पर्व शारदीय नवरात्र के आगमन का संदेश भी देता है. जामताड़ा के ग्रामीण इलाकों में प्रकृति के इसी मनोहारी रूप ने दुर्गोत्सव की तैयारियों और उत्सव के माहौल को महसूस कराना शुरू कर दिया है.
रिपोर्ट: मनीष बर्णवाल

