आदित्यपुर: नगर निगम कार्यालय को लेकर फिर वही पुराना एपिसोड री-रन पर है. फर्क सिर्फ इतना है कि किरदार कुछ नए हैं, लेकिन स्क्रिप्ट वही पुरानी “मैदान बचाओ, विकास रोकाओ”. जागृति मैदान एक बार फिर ‘खेल का मैदान’ कम और ‘राजनीतिक अखाड़ा’ ज्यादा बन चुका है. एक तरफ विकास की इमारत खड़ी करने की बात हो रही है, तो दूसरी तरफ विरोध की पिच पर बयानबाजी के चौके- छक्के लगाए जा रहे हैं.

लेकिन विरोध करने वाले शायद इतिहास की फाइल पढ़ना भूल गए हैं. कल जो इसी मैदान पर विरोध का झंडा लेकर खड़े थे, आज वे सत्ता के मैदान से आउट हो चुके हैं. उस वक्त नगर परिषद के पूर्व उपाध्यक्ष पुरेन्द्र नारायण सिंह के नेतृत्व में कई पूर्व पार्षदों के साथ विरोध की पूरी टीम उतरी थी. बड़े- बड़े नाम भी साथ थे. पूर्व सीएम चंपाई सोरेन का समर्थन और पूर्व मंत्री बन्ना गुप्ता की चर्चा ने इसे हाई-वोल्टेज मुद्दा बना दिया था. पर जनता ने उस मैच का रिजल्ट क्या दिया, ये सबको पता है. विरोध हुआ, शोर हुआ, लेकिन अंत में कई चेहरे सत्ता से बाहर हो गए.
अब वही कहानी नए किरदारों के साथ फिर शुरू हो गई है. कुछ ‘स्वयंभू बुद्धिजीवी’, कुछ पार्षद और कुछ राजनीतिक खिलाड़ी फिर से मैदान में उतर गए हैं. मुद्दा वही- “खेल का मैदान बचाओ”. लेकिन असली खेल क्या है, ये जनता अब समझ रही है.
इधर सच्चाई यह है कि जिस जागृति मैदान को लेकर इतना शोर मचाया जा रहा है, उसकी फाइल खुद सरकारी गलियारों में ठंडी पड़ी है. निगम सूत्र साफ कहते हैं कि यहां केवल तकनीकी स्वीकृति मिली थी, प्रशासनिक नहीं. फाइल अभी सचिवालय में धूल खा रही है. इतना ही नहीं, विभाग स्तर से यह प्रस्ताव पहले ही वापस लिया जा चुका है और अब नगर निगम कार्यालय के लिए हथियाडीह इंडस्ट्रियल पार्क में जमीन चिन्हित की जा चुकी है. हाल की बोर्ड बैठक में कुछ पार्षदों ने फिर से इस मुद्दे को जिंदा करने की कोशिश की, लेकिन नगर निगम प्रशासन ने इस पर कोई मुहर नहीं लगाई. मतलब साफ है- अंदर फाइल शांत है, बाहर राजनीति उफान पर है.
तो सवाल उठता है, जब योजना की खुद फाइल में ‘कोमा’ में है, तब मैदान में यह ‘राजनीतिक वर्ल्ड कप’ क्यों खेला जा रहा है ? जवाब भी उतना ही सीधा है- यह विकास की लड़ाई कम, दिखावे की राजनीति ज्यादा है. यह व्यंग्य नहीं, सीधी चेतावनी समझिए- जागृति मैदान अब ‘राजनीतिक परीक्षा केंद्र’ बन चुका है. यहां हर बार वही फेल होता है, जो जनता को कम और राजनीति को ज्यादा समझता है.
जो कल विरोध कर रहे थे, वे इतिहास बन गए. और जो आज विरोध कर रहे हैं, वे यह तय कर लें कि अगली सूची में उनका नाम किस कॉलम में होगा- सत्ता या इतिहास. कुल मिलाकर, जागृति मैदान पर फिलहाल गेंद विकास के पाले में नहीं, राजनीति के पाले में है. और जनता अंपायर की तरह खड़ी है- समय आने पर फैसला सुनाने के लिए तैयार.
गुमराह होने से बचें
आदित्यपुर नगर निगम की जनता यह जान ले कि जागृति मैदान में प्रस्तावित नगर निगम का कार्यालय हथियाडीह इंडस्ट्रियल पार्क शिफ्ट हो चुका है. उसके बाद भी अगर जनता राजनीति का शिकार होना चाहते हैं तो वे स्वतंत्र हैं. विरोध करने वालों को एकबार पहले पता कर लेना चाहिए कि असल माजरा क्या है. रही बात चंपाई सोरेन की तो पूर्व में उनके समर्थन से ही योजना पर रोक लग चुका है. सरकार की ओर से पीत- पत्र जारी भी किया जा चुका है. ऐसे में विरोध करने वालों की मंशा साफ है कि वे क्या चाहते हैं. आदित्यपुर की जनता ठगे गए हैं. नगर निगम कार्यालय उनके दायरे से दूर जा चुका है. पक्ष और विपक्ष में हाय- तौबा मचाने वाले सिर्फ और सिर्फ राजनीति कर रहे हैं ताकि जनता विकास के मुद्दे पर जनप्रतिनिधियों से सवाल न करें. पानी, सिवरेज- ड्रेनेज़, सड़क, गली, सफाई, कचरा प्रबंधन पर बात न करें. निगम कार्यालय और खेल के मैदान में उलझकर रह जाए.
जागृति मैदान ही क्यों ?
समूचे आदित्यपुर नगर निगम क्षेत्र में आवास बोर्ड की ओर से पार्क और खेल के मैदान के लिए भूखंड छोड़े गए थे. आज उन भूखंडो का अस्तित्व करीब- करीब समाप्त हो चुका है. या तो वहां धार्मिक स्थल बना दिया गया है या रसूखदारों का पार्किंग स्थल बन गया है. क्या आजतक किसी जनप्रतिनिधि को इसकी चिंता हुई ? नगर निगम द्वारा जहां-जहां पार्क का निर्माण कराया गया उसका रखरखाव हो रहा है ? एकबार विरोध करने वाले जरा सरसरी निगाह से उन भूखंडो का भी जायजा ले लें तो आंदोलन का स्वरुप ही बदल जाएगा.
Santosh Kumar (Chief Editor)

