कितना पैसा चाहिए ? कितनी जमीन चाहिए ? कितना बड़ा घर चाहिए ? और आखिर कितनी दौलत के बाद इंसान यह कह पाता है कि अब पर्याप्त है ?


सरायकेला- खरसावां जिले के आरआईटी थाना क्षेत्र में सोमवार रात हुई गोलीबारी के बाद ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि जिस परिवार को वर्षों तक क्षेत्र में शिक्षा, प्रतिष्ठा और सामाजिक पहचान के लिए जाना गया, उसी परिवार का अंदरूनी विवाद अब पुलिस और कानून की चौखट तक पहुंच गया है.
दिवंगत शिक्षाविद डॉ. वाईपी यादव ने अपने जीवनकाल में जिस विरासत को खड़ा किया, उसके केंद्र में शिक्षा थी. उनके परिवार और संस्थानों की पहचान झारखंड से बिहार तक बनी. लेकिन सोमवार की एक घटना ने उस विरासत के सामने ऐसा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया, जिसकी शायद किसी ने कल्पना नहीं की होगी.
आरोप है कि बड़े बेटे और गायत्री शिक्षा निकेतन के संचालक सत्य प्रकाश सुधांशु ने अपने छोटे भाई तथा 111 सेव लाइफ अस्पताल के संचालक डॉ. ओपी आनंद पर गोली चला दी. गोली डॉ. आनंद की पीठ में लगी. TMH में ऑपरेशन के बाद गोली निकाल दी गई है और उनकी स्थिति खतरे से बाहर बताई जा रही है.
पुलिस ने सत्य प्रकाश सुधांशु को हिरासत में लिया है और घटना में कथित रूप से प्रयुक्त लाइसेंसी हथियार भी जब्त किया गया है. अब घटना की वास्तविक परिस्थितियां और आपराधिक जिम्मेदारी पुलिस अनुसंधान और आगे की न्यायिक प्रक्रिया से तय होगी.
लेकिन कानून अपना काम करेगा. समाज के सामने इससे अलग एक सवाल है- आखिर ऐसा क्या टूट गया कि दो सगे भाइयों के बीच का विवाद गोली तक पहुंच गया ?
पिता ने संपत्ति के साथ एक विरासत भी छोड़ी थी
संपत्ति सिर्फ जमीन, भवन, बैंक बैलेंस और संस्थानों का नाम नहीं होती. माता- पिता अपनी अगली पीढ़ी के लिए सामाजिक प्रतिष्ठा, पारिवारिक संबंध और अपना नाम भी छोड़कर जाते हैं. डॉ. वाईपी यादव की सबसे बड़ी पूंजी संभवतः केवल उनके द्वारा खड़े किए गए संस्थान नहीं थे. उनकी असली विरासत वह पहचान थी, जो उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में वर्षों की मेहनत से बनाई.
एक पिता जीवन भर जोड़ता है. जमीन जोड़ता है, संस्थान बनाता है, बच्चों का भविष्य बनाता है और समाज में परिवार की प्रतिष्ठा स्थापित करता है. उसे शायद उम्मीद रहती है कि अगली पीढ़ी उस विरासत को और आगे ले जाएगी. लेकिन जब उसी विरासत के बंटवारे का प्रश्न रिश्तों के बंटवारे में बदल जाए तो करोड़ों की संपत्ति भी छोटी दिखाई देने लगती है.
परिवार के भीतर वर्षों से सबकुछ सामान्य नहीं था ?
घटना के बाद पारिवारिक और स्थानीय सूत्रों से कई तरह की बातें सामने आ रही हैं. कहा जाता है कि डॉ. ओपी आनंद ने अंतर्जातीय विवाह की थी उसके बाद उन्हें अघोषित रूप से पिता द्वारा संपत्ति से अलग कर दिया गया और अपने जीवनकाल में ही उन्होंने अपनी सारी जायदाद अपनी पत्नी गायत्री देवी और बड़े पुत्र इंजिनियर सत्यप्रकाश सुधांशु के नाम कर दिया. उनके जाने के बाद सत्यप्रकाश सुधांशु ने डॉ ओपी आनंद को अस्पताल की जिम्मेदारी दे दी. मगर अपने तुनक मिजाजी और कोविड काल में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता के साथ हुए विवाद उसके बाद मरीज का गलत इलाज करने के आरोप में जेल जाने के बाद की परिस्थितियों में जिस तरह से परिवार के बीच अंदरूनी कलह बढ़ा वह धीरे-धीरे बराबर की हिस्सेदारी पर जा पहुंचा. दोनों भाइयों को अपनी सुरक्षा के लिए निजी बाउंसर रखने पड़े उल्लेखनीय है कि डॉक्टर आप आनंद एक बार जमशेदपुर से लोकसभा और एक बार जमशेदपुर पश्चिम से विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं वह हमेशा सुर्खियों में रहते हैं. इसके उलट सत्य प्रकाश सुधांशु शांतचित्त और मिलनसार प्रवृत्ति के माने जाते हैं. राजनीतिक रसूख भी कम नहीं है. समाज में उनकी अच्छी- खासी पैठ है और हर वर्ग के साथ उनका आत्मीय संबंध है. परिवार में बराबर हिस्सेदारी को लेकर मतभेद जैसी बातें सूत्रों के हवाले से सामने आ रही हैं. इन दावों का सच दस्तावेज और संबंधित पक्ष ही स्पष्ट कर सकते हैं.
इसी तरह सोमवार रात की घटना को लेकर भी कई संस्करण चल रहे हैं. सूत्र बताते हैं कि सोमवार की रात घर में नीचे और ऊपर रहने को लेकर विवाद हुआ. सत्य प्रकाश सुधांशु अपने परिवार के साथ गायत्री शिक्षा निकेतन परिसर में बने आवास के ऊपरी तल पर रहते हैं, जबकि डॉ. आनंद का परिवार निचले तल पर रहता है. सूत्र बताते हैं कि डॉक्टर आनंद का परिवार चाहता था कि वह ऊपर जाकर रहे नीचे कई लोगों का आना-जाना होता है जिससे उनकी निजता का हनन होता है. सत्य प्रकाश सुधांशु नहीं चाहते थे कि नीचे ऊपर का विवाद हो इसके लिए दोनों भाइयों में विवाद शुरू हो गया. आरोप है कि सत्य प्रकाश सुधांशु इस विवाद के पीछे डॉक्टर आनंद की पत्नी सरिता आनंद को मान रहे थे. इसी सोच के साथ उन्होंने सरिता आनंद पर गोली चलाई मगर उनके छोटे भाई डॉक्टर ओपी आनंद बीच में आ गए और गोली उनके पीठ में जा लगी. किसी अन्य सदस्य को निशाना बनाए जाने अथवा बीच- बचाव में गोली लगने जैसी चर्चाओं को जांच पूरी होने से पहले तथ्य नहीं माना जा सकता. इतना जरूर स्पष्ट है कि परिवार के भीतर तनाव उस स्तर तक पहुंच चुका था जहां एक हथियार का इस्तेमाल हुआ और एक भाई गोली लगने से अस्पताल पहुंच गया. यही इस पूरे प्रकरण की सबसे दुखद तस्वीर है.
एक गोली सिर्फ शरीर को नहीं लगी
गोली डॉ. ओपी आनंद की पीठ में लगी. डॉक्टरों ने उसे निकाल दिया. लेकिन उस रात चली गोली का असर केवल एक व्यक्ति के शरीर तक सीमित नहीं रहा. उसने एक परिवार के आपसी विश्वास को घायल किया. वर्षों में अर्जित सामाजिक प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाई. पिता की विरासत को सार्वजनिक चर्चा में ला दिया. बच्चों और अगली पीढ़ी के सामने ऐसे सवाल खड़े कर दिए, जिनका जवाब देना शायद परिवार के लिए आसान नहीं होगा.
और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस विवाद को वर्षों तक घर की चारदीवारी के भीतर संभालने की कोशिश होती रही होगी, अब उसी विवाद का फैसला पुलिस, अदालत और कानूनी दस्तावेजों के बीच होना है. यही वह कीमत है जो कभी- कभी संपत्ति की लड़ाई परिवार से वसूलती है.
बड़ा घर था, लेकिन क्या दिलों के बीच जगह कम पड़ गई ?
प्रारंभिक चर्चाओं में पैतृक आवास के अलग- अलग तलों पर रहने और रहने की व्यवस्था को लेकर विवाद की बात सामने आ रही है. इसकी वास्तविकता पुलिस जांच में स्पष्ट होगी. लेकिन यदि इतनी बड़ी घटना के पीछे आखिरकार घर, हिस्सेदारी या संपत्ति से जुड़ा तनाव निकलता है तो समाज के लिए इससे बड़ी विडंबना क्या होगी ?
मनुष्य जीवन भर बड़ा घर बनाने में लगा रहता है.
पहले एक कमरा. फिर दो मंजिल. फिर जमीन. फिर संस्थान. फिर बैंक बैलेंस. लेकिन यदि उसी घर में दो भाइयों के लिए शांति से रहने की जगह नहीं बची तो सवाल उस मकान के आकार का नहीं, रिश्तों के सिकुड़ते आकार का है.
कौन जीता इस लड़ाई में ?
मान लीजिए किसी को संपत्ति में बड़ा हिस्सा मिल भी गया तो क्या वह जीत होगी ? एक भाई अस्पताल में है. दूसरा पुलिस हिरासत में है. परिवार तनाव में है. पुलिस जांच कर रही है. सामाजिक प्रतिष्ठा पर चर्चा हो रही है और पिता की बनाई विरासत विवाद के संदर्भ में सुर्खियों में है.
तो विजेता कौन है ?
यही संपत्ति विवाद की सबसे बड़ी त्रासदी है- अक्सर इसमें हारने वाले दो पक्ष होते हैं और जीतता कोई नहीं. अदालत अंततः तय कर सकती है कि कानूनी संपत्ति किसकी है. कानून यह भी तय करेगा कि गोली चलाने के मामले में किसकी क्या जिम्मेदारी है. लेकिन अदालत किसी परिवार को उसका पुराना अपनापन वापस नहीं दिला सकती.
गुस्से के कुछ सेकंड वर्षों की कमाई मिटा सकते हैं
इस घटना से समाज के लिए दूसरा बड़ा सबक क्रोध और हथियार को लेकर है. किसी विवाद में व्यक्ति कितनी भी नाराजगी महसूस करे, हथियार निकालने के बाद परिस्थितियां उसके नियंत्रण से बहुत तेजी से बाहर जा सकती हैं. ट्रिगर दबाने में शायद एक सेकंड लगता है, लेकिन उसके बाद शुरू होने वाली कानूनी और पारिवारिक लड़ाई वर्षों तक चल सकती है. लाइसेंसी हथियार आत्मरक्षा और कानूनसम्मत उद्देश्य के लिए होता है. पारिवारिक विवाद का फैसला हथियार नहीं कर सकता. क्षणिक आवेश में उठाया गया एक कदम दशकों में बनाई प्रतिष्ठा को संकट में डाल सकता है.
पैसा साधन है, रिश्तों का विकल्प नहीं
इस घटना को केवल एक क्राइम स्टोरी के रूप में पढ़कर आगे बढ़ जाना आसान है. लेकिन शायद इसे एक सामाजिक चेतावनी के रूप में भी पढ़ने की जरूरत है. हम अपने बच्चों के लिए संपत्ति बनाने में जीवन लगा देते हैं. जमीन खरीदते हैं. मकान बनाते हैं. व्यवसाय और संस्थान खड़े करते हैं. लेकिन क्या उसी गंभीरता से अगली पीढ़ी को यह भी बताते हैं कि इन सबका मूल्य रिश्तों से बड़ा नहीं है ?वसीयत स्पष्ट हो. संपत्ति का बंटवारा पारदर्शी हो. विवाद हो तो परिवार बैठे. जरूरत पड़े तो मध्यस्थता और कानून का रास्ता अपनाया जाए. लेकिन अहंकार और हथियार को पारिवारिक विवाद के बीच आने देना अंततः सबकुछ छीन सकता है.
जिस नाम को पिता ने बनाया, उसे अगली पीढ़ी कैसे याद रखेगी ?
इस घटनाक्रम का सबसे भावनात्मक प्रश्न शायद यही है. एक पिता ने वर्षों मेहनत करके अपना नाम बनाया. शिक्षा के संस्थान खड़े किए. बच्चों को इंजीनियर और डॉक्टर बनाया. समाज में परिवार की पहचान स्थापित की. उनके जाने के बाद अगली पीढ़ी के हाथों में केवल संपत्ति नहीं आई थी. एक नाम भी आया था. अब उस नाम को आगे बढ़ाना है या पारिवारिक विवादों में कमजोर करना है, यह निर्णय अगली पीढ़ी के व्यवहार से होता है. सत्य प्रकाश सुधांशु के खिलाफ लगे आरोपों पर कानून अपना काम करेगा. डॉ. ओपी आनंद स्वस्थ होकर घर लौटें, यह परिवार और समाज दोनों के लिए महत्वपूर्ण है. संपत्ति और पारिवारिक विवादों से जुड़े तमाम दावों की सच्चाई भी जांच और दस्तावेजों से ही सामने आनी चाहिए. मगर आरआईटी की उस रात ने समाज के सामने एक आईना जरूर रख दिया है.
दौलत बहुत कुछ खरीद सकती है, लेकिन टूट चुका विश्वास नहीं.
बड़ा मकान बनाया जा सकता है, लेकिन उसमें परिवार बसाने के लिए पैसा पर्याप्त नहीं होता. संपत्ति विरासत में मिल सकती है, प्रतिष्ठा नहीं. प्रतिष्ठा हर पीढ़ी को अपने आचरण से दोबारा अर्जित करनी पड़ती है. और इसलिए इस पूरे घटनाक्रम के बाद आदित्यपुर के समाज के सामने शायद एक ही सवाल सबसे लंबे समय तक रहेगा-
“आखिर कितनी दौलत चाहिए कि उसके बाद इंसान रिश्तों को दौलत से ज्यादा कीमती समझ सके ?”
संतोष कुमार
9431341001

