सरायकेला: गम्हरिया थाना परिसर में एक महिला और वायरलेस ऑपरेटर से जुड़ा मामला जितना गंभीर है, उतने ही गंभीर इसके अनुत्तरित सवाल भी हैं. महिला ने अपने साथ गलत होने का आरोप लगाया है. ऐसे आरोप की निष्पक्ष और संवेदनशील जांच जरूरी है, लेकिन आरोप और उसका प्रमाणित होना दो अलग- अलग पहलू हैं. इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले उस रात से लेकर अगले दिन तक के पूरे घटनाक्रम की कड़ियां जोड़ना जरूरी हो गया है.


दुग्धा गांव की महिला के साथ गुरुवार को कथित मारपीट की घटना हुई थी. सूचना मिलने पर ओडी ऑफिसर एक कांस्टेबल के साथ निकले और रास्ते में महिला मिलने पर उसे सुरक्षा के लिए थाना लाया गया. बताया जाता है कि महिला को थाना परिसर के एक कमरे में रखकर बाहर से ताला लगा दिया गया. यहीं से पुलिस की कार्यप्रणाली पर पहला बड़ा सवाल खड़ा होता है.
महिला को अकेले कमरे में बंद क्यों किया गया ? महिला पुलिसकर्मी कहां थी ? रात के समय किसी महिला को थाना लाए जाने के बाद उसकी सुरक्षा और निगरानी की जिम्मेदारी किसकी थी ? उसके साथ महिला पुलिसकर्मी की व्यवस्था क्यों नहीं की गई ? महिला को बाहर से ताला लगाकर कमरे में रखना किस प्रक्रिया के तहत किया गया ? ड्यूटी पर मौजूद अधिकारी ने इसकी स्टेशन डायरी में क्या एंट्री की ? इन सवालों का जवाब थाना प्रशासन को देना होगा.
बताया जा रहा है कि बाद में वायरलेस ऑपरेटर ने महिला से घटना की जानकारी लेने के लिए कमरे का ताला खोला. महिला ने भूख लगने की बात कही, जिसके बाद वह ऑपरेटर के कमरे में गई. फिर दोनों के खाना खाने और रात में उसी कमरे में रहने की बात सामने आई है. सुबह वायरलेस ऑपरेटर के कमरे का दरवाजा अंदर से बंद मिलने पर थाना कर्मियों ने उसे तोड़ा और दोनों को वहां पाया.
यदि घटनाक्रम यही है तो वायरलेस ऑपरेटर ने महिला को अपने कमरे में क्यों ले गया और वरिष्ठ अथवा ड्यूटी अधिकारी को इसकी जानकारी क्यों नहीं दी, यह अपने आप में गंभीर अनुशासनात्मक सवाल है. महिला की सहमति अथवा असहमति से अलग, पुलिसकर्मी का यह आचरण विभागीय नियमों और पेशेवर मर्यादा की कसौटी पर जांच का विषय है.
महिला के आरोप की भी हर पहलू की जांच जरुरी
दूसरी ओर महिला द्वारा अपने साथ गलत होने के आरोप की सत्यता तय करने के लिए परिस्थितिजन्य और वैज्ञानिक साक्ष्य महत्वपूर्ण होंगे. केवल यह सवाल कि महिला ने तत्काल शोर क्यों नहीं मचाया, अपने आप में आरोप को सही या गलत साबित नहीं करता. अलग- अलग परिस्थितियों में पीड़ित की प्रतिक्रिया अलग हो सकती है.
लेकिन जांच में यह जरूर देखा जाना चाहिए कि महिला ने पहली बार आरोप कब, किसके सामने और किन शब्दों में लगाया. शुक्रवार को दिनभर क्या घटनाक्रम रहा ? क्या उसने किसी पुलिसकर्मी, परिजन या अन्य व्यक्ति को घटना की जानकारी दी ? लिखित शिकायत तत्काल क्यों नहीं दी गई ? यदि शिकायत बाद में दी जाती है तो उसमें क्या आरोप हैं ? उसके पहले और बाद के बयानों में कोई अंतर है या नहीं ? महिला की वैवाहिक/पारिवारिक स्थिति की जांच भी जरुरी है.
CCTV, कॉल रिकॉर्ड और स्टेशन डायरी खोल सकते हैं राज
इस मामले की सच्चाई बयानबाजी से नहीं बल्कि साक्ष्यों से सामने आएगी. थाना परिसर के उपलब्ध CCTV फुटेज, स्टेशन डायरी, ड्यूटी रोस्टर, वायरलेस लॉग, संबंधित कर्मियों के बयान और कानूनी प्रक्रिया के तहत जुटाए गए डिजिटल/फोरेंसिक साक्ष्य घटनाक्रम की वास्तविक टाइमलाइन स्पष्ट कर सकते हैं.
सबसे महत्वपूर्ण यह भी है कि सुबह मामला सामने आने के बाद थाना प्रभारी ने क्या कदम उठाए. यदि थाना स्तर पर घटना की जानकारी थी तो वरीय अधिकारियों को तत्काल क्यों नहीं बताया गया ? महिला की शिकायत दर्ज कराने, मेडिकल या अन्य आवश्यक कानूनी प्रक्रिया के संबंध में क्या कार्रवाई की गई ? यह हिस्सा वायरलेस ऑपरेटर पर लगे आरोप से अलग थाना स्तर की प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न है.
टाटा लॉन्ग प्रोडक्ट्स के वर्चस्व की कथित साजिश की चर्चा
इस घटनाक्रम के बीच एक दूसरा एंगल भी चर्चा में आया है. सूत्र इसे टाटा लॉन्ग प्रोडक्ट्स से जुड़े कथित वर्चस्व विवाद और किसी बड़े आपराधिक षड्यंत्र से जोड़कर देखने का दावा कर रहे हैं. हालांकि अभी इस दावे के समर्थन में कोई ठोस दस्तावेज अथवा आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है. इसलिए इसे तथ्य मानना जल्दबाजी होगी. मामले में JLKM नेता प्रेम मार्डी की सक्रियता भी चर्चा का विषय बनी है. उन्होंने महिला से बातचीत कर घटनाक्रम की जानकारी ली थी. यदि पुलिस के सामने साजिश का कोई ठोस इनपुट आता है तो यह जांचना होगा कि महिला, संबंधित पुलिसकर्मी, कथित औद्योगिक वर्चस्व विवाद और मामले को आगे बढ़ाने वाले लोगों के बीच कोई प्रमाणित कड़ी है या नहीं.
ऑपरेटर दोषी या किसी खेल का मोहरा ? फैसला साक्ष्य करें
फिलहाल वायरलेस ऑपरेटर को दोषी घोषित करना जितना जल्दबाजी होगी, महिला के आरोप को बिना जांच के संदिग्ध बताकर खारिज करना भी उतना ही अनुचित होगा. जांच का असली सवाल यही है कि उस रात कमरे के अंदर वास्तव में क्या हुआ और अगले दिन मामले को संभालने में थाना स्तर पर कौन- कौन सी चूक हुई.
पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच में महिला के आरोप, वायरलेस ऑपरेटर का पक्ष, थाना कर्मियों की भूमिका और यदि कोई ठोस आधार मिलता है तो कथित साजिश के एंगल को भी समान रूप से परखा जाना चाहिए.
SP बोले- दोषी किसी कीमत पर नहीं बख्शे जाएंगे
एसपी मनोज स्वर्गीयारी ने बताया कि पूरे मामले की जांच चल रही है. महिला की ओर से फिलहाल लिखित शिकायत नहीं दिए जाने की बात सामने आई है. एसपी ने स्पष्ट किया कि जांच में जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी. लिखित शिकायत मिलने के बाद उसके आधार पर भी विधिसम्मत कार्रवाई की जाएगी.
अब इस मामले में आरोपों से अधिक महत्वपूर्ण साक्ष्य और जांच के निष्कर्ष होंगे. इन्हीं से तय होगा कि यह पुलिसकर्मी की गंभीर करतूत का मामला है, थाना स्तर की बड़ी लापरवाही है, या इसके पीछे कोई दूसरी कहानी भी छिपी है.

