सरायकेला:शिक्षा विभाग में लंबे समय से विवादों के केंद्र में रहे सांत्वना जेना बीपीओ प्रकरण ने अब नया मोड़ ले लिया है. विभागीय सूत्रों के अनुसार, जिस बीपीओ पद को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं, उससे संबंधित मूल फाइल विभाग में अब तक नहीं मिल सकी है. इतना ही नहीं, विभागीय अभिलेखों में ऐसे किसी स्वीकृत पद का रिकॉर्ड भी उपलब्ध नहीं होने का दावा किया जा रहा है. ऐसे में यह प्रश्न और गहरा हो गया है कि सांत्वना जेना किस आधार पर बीपीओ की जिम्मेदारी निभा रही थीं.


सूत्रों का कहना है कि मामले की जांच शुरू होने के बाद संबंधित दस्तावेजों की तलाश की जा रही है, लेकिन अब तक विवादित पद से जुड़ी मूल फाइल का पता नहीं चल सका है. यदि यह दावा सही साबित होता है तो यह शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली और रिकॉर्ड प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े करता है.
विभागीय सूत्रों के मुताबिक, उपलब्ध अभिलेखों में बीपीओ का ऐसा कोई स्वीकृत पद दर्ज नहीं है, जिस पर सांत्वना जेना के कार्यरत होने की बात कही जा रही है. ऐसी स्थिति में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि बिना स्वीकृत पद के किसी व्यक्ति को बीपीओ की जिम्मेदारी किस आदेश के तहत सौंपी गई और उसका संचालन किस प्रशासनिक आधार पर होता रहा.
इधर, इस पूरे प्रकरण में जिला शिक्षा पदाधिकारी कैलाश मिश्रा की भूमिका भी चर्चा का विषय बनी हुई है. विभागीय सूत्रों का कहना है कि जांच आगे बढ़ने पर कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं, जिससे विभाग की जवाबदेही पर सवाल और गहरे हो सकते हैं. इसी कारण जांच की निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं.
सूत्रों का यह भी कहना है कि यदि संबंधित फाइल वास्तव में उपलब्ध नहीं होती है, तो यह अपने आप में गंभीर प्रशासनिक मामला है. किसी सरकारी कार्यालय में किसी पद से जुड़ी मूल फाइल का गायब होना रिकॉर्ड संधारण और प्रशासनिक व्यवस्था दोनों पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है.
अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जिला शिक्षा पदाधिकारी कैलाश मिश्रा इस मामले की जांच पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता के साथ कराते हैं या फिर यह प्रकरण केवल औपचारिक जांच तक सीमित रह जाता है.
इस पूरे मामले ने शिक्षा विभाग की कार्यशैली और जवाबदेही पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. यदि जांच तथ्यों और उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर निष्पक्ष ढंग से पूरी होती है, तो सांत्वना जेना की नियुक्ति, पदस्थापना और बीपीओ की जिम्मेदारी का वास्तविक आधार स्पष्ट हो सकेगा. वहीं, जांच में किसी प्रकार की ढिलाई बरती जाती है तो विभाग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल और गंभीर हो सकते हैं.
विभागीय चर्चाओं के बीच कुछ लोगों ने इस पूरे मामले की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए जांच किसी अन्य विभाग के वरिष्ठ पदाधिकारी से कराने की मांग भी उठाई है.
रिपोर्ट: प्रमोद सिंह





