Special report झारखंड में इन दिनों शासन व्यवस्था किसी प्रयोगशाला का मॉडल लग रही है- जहां “लोकतंत्र” किताबों में है और “अफसरशाही” जमीन पर. सवाल सीधा है- क्या यहां सरकार चल रही है या “रिमोट कंट्रोल” से संचालित कोई अदृश्य तंत्र ?

हालात ऐसे हैं कि कई अधिकारी अब यह मानकर चल रहे हैं कि उनका कुछ बिगड़ने वाला नहीं. ऊपर की कृपा हो तो नीचे जवाबदेही किस चिड़िया का नाम है ? न जनता की सुनवाई, न जनप्रतिनिधियों की. आम आदमी आवेदन लेकर दफ्तर- दफ्तर घूम रहा है, और फाइलें अपनी कुर्सी से हिलने को तैयार नहीं.
सरकारी दफ्तरों का दृश्य भी कम दिलचस्प नहीं. कुर्सियां खाली, कमरे सूने, और जवाब वही घिसा- पिटा “साहब मीटिंग में हैं” या “फील्ड विजिट पर गए हैं.” ऐसा लगता है जैसे मीटिंग और विजिट अब काम से ज्यादा “अदृश्य रहने” का लाइसेंस बन चुके हैं.
स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि सांसद और विधायक भी खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं. सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधि भी यह कहते सुने जा रहे हैं कि “हमारी सुनता कौन है ?” यानी जनता तो दूर, अब जनप्रतिनिधि भी सिस्टम के बाहर खड़े नजर आ रहे हैं.
और सबसे दिलचस्प मोड़- सिस्टम में “नई प्राथमिकता सूची”. चुने हुए प्रतिनिधि एक तरफ, और छुटभैये नेता दूसरी तरफ. चर्चा यह है कि अफसर अब उन्हीं को ज्यादा “वैल्यू” दे रहे हैं, जिनकी पहुंच सीधे “रिमोट” तक है. नतीजा- जिन्हें जनता ने चुना, वे लाइन में हैं, और जो सिस्टम के करीब हैं, वे फ्रंट सीट पर. अब आते हैं असली सवाल पर- क्या राज्य की महत्वाकांक्षी योजनाएं ही इस अव्यवस्था की जड़ बन रही हैं ? “मैया सम्मान योजना” जैसी योजनाएं क्या वित्तीय दबाव बढ़ा रही हैं ? या केंद्र- राज्य के बीच तालमेल की कमी से फंडिंग अटक रही है, जिससे पूरा ढांचा हिल गया है ? जमीनी सच्चाई यही कहती है कि सड़क, पुल-पुलिया, स्कूल-कॉलेज, प्रखंड, अंचल, नगर निकाय- हर विभाग किसी न किसी स्तर पर कराह रहा है. कई जगह कर्मचारियों और अधिकारियों को महीनों से वेतन नहीं मिला. अब बिना वेतन के सिस्टम कितने दिन “सेवा भाव” से चलेगा, यह भी एक बड़ा सवाल है.
व्यंग्य यह है कि “गुड गवर्नेंस” के पोस्टर हर जगह नजर आते हैं, लेकिन जमीन पर “नो गवर्नेंस” का एहसास होता है. जनता पूछ रही है- अगर यही हाल रहा, तो विकास की गाड़ी आगे कैसे बढ़ेगी ? अब स्थिति यह है कि झारखंड में शासन कम और सवाल ज्यादा दिख रहे हैं. जवाबदेही का संकट गहराता जा रहा है, और “रिमोट कंट्रोल” का मिथक हकीकत में बदलता नजर आ रहा है. अंत में सवाल वही- क्या सरकार इस सिस्टम को पटरी पर ला पाएगी, या फिर अफसरशाही का यह “ओवरड्राइव” लोकतंत्र को और पीछे धकेल देगा ?
Santosh Kumar (Chief Editor)

