चाईबासा: पश्चिमी सिंहभूम जिले के नोवामुंडी बस्ती क्षेत्र में अवैध आयरन खनन एक बार फिर सक्रिय होता नजर आ रहा है. स्थानीय स्तर पर मिल रही जानकारी के अनुसार, इलाके में दो पोकलेन मशीनों की मौजूदगी से अवैध खनन के संकेत मिल रहे हैं. ग्रामीणों का कहना है कि दिन के समय गतिविधियां कम दिखाई देती हैं, लेकिन रात होते ही खनन और ढुलाई का काम तेज हो जाता है.

अंधेरे का फायदा उठाकर माफिया गिरोह आयरन अयस्क निकालकर सुरक्षित ठिकानों तक पहुंचा देते हैं. इससे साफ है कि अवैध खनन का नेटवर्क अब भी मजबूत बना हुआ है. सूत्रों के अनुसार, यहां से निकाले जा रहे अवैध आयरन को राज्य के विभिन्न हिस्सों में खपाया जा रहा है. खासकर गिरिडीह, चंदनकियारी और दुर्गापुर जैसे औद्योगिक क्षेत्रों तक इसकी आपूर्ति की जा रही है, जहां छोटे- बड़े प्लांटों में इसका उपयोग होता है.

हैरानी की बात यह है कि पूर्व में भी अवैध खनन को लेकर कई शिकायतें सामने आई थीं और कार्रवाई के दावे किए गए थे, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है. पोकलेन जैसी भारी मशीनों की मौजूदगी यह सवाल खड़ा करती है कि बिना किसी संरक्षण के इतनी बड़ी गतिविधि संभव कैसे है.
स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया है कि माफिया गिरोह संगठित तरीके से काम कर रहे हैं और प्रशासन की नजर से बचने के लिए समय और रास्ते बदलते रहते हैं. इस मामले में प्रशासन की सक्रियता और ठोस कार्रवाई की जरूरत महसूस की जा रही है, ताकि अवैध खनन पर पूरी तरह रोक लगाई जा सके.

वैसे अवैध आयरन खनन को लेकर सियासत और प्रशासन दोनों सवालों के घेरे में आ गए हैं. चाईबासा और आसपास के इलाकों में कथित आयरन माफिया की सक्रियता को लेकर अब राजनीतिक माहौल गरमाने लगा है. झारखंड मुक्ति मोर्चा के जिला स्तर के पदाधिकारियों द्वारा दिए गए ज्ञापन में सन्नी सिंह और अरविंद चौरसिया जैसे नाम सार्वजनिक किए जाने के बावजूद अब तक न तो प्राथमिकी दर्ज की गई है और न ही कोई ठोस कार्रवाई सामने आई है. इससे प्रशासनिक कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. बताया जा रहा है कि झामुमो जिला अध्यक्ष ने पश्चिमी सिंहभूम के उपायुक्त को ज्ञापन सौंपकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की थी. इसके बावजूद जांच की रफ्तार धीमी है और मामला अधर में लटका हुआ है. स्थानीय सूत्रों के अनुसार, प्रशासन ने फिलहाल अवैध खनन पर आंशिक रोक जरूर लगाई है, लेकिन पहले बड़े पैमाने पर हुए खनन की गहराई से जांच अब तक नहीं हो पाई है. इससे यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि इस अवैध कारोबार में कौन-कौन शामिल थे और उन्हें किसका संरक्षण प्राप्त था.

सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब सत्तारूढ़ दल के पदाधिकारी ही माफियाओं के नाम उजागर कर रहे हैं, तो फिर कार्रवाई में देरी क्यों हो रही है. क्या यह प्रशासनिक सुस्ती है या किसी दबाव के कारण जांच को धीमा किया जा रहा है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि समय रहते इस मामले की पारदर्शी जांच नहीं हुई, तो यह मुद्दा सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है. वहीं आम लोगों के बीच भी यह चर्चा है कि सिर्फ अवैध खनन पर रोक लगाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसमें शामिल लोगों की पहचान कर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई जरूरी है.

