सरायकेला: विश्व आयुर्वेद दिवस के अवसर पर बुधवार को जिला आयुष कार्यालय में कार्यक्रम आयोजित कर आयुर्वेद और आयुष चिकित्सा पद्धति के प्रचार-प्रसार पर जोर दिया गया. मंच से ग्रामीण क्षेत्रों तक आयुष सेवाएं पहुंचाने और लोगों को जागरूक करने की बात कही गई. लेकिन इसी बीच विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं. ग्रामीणों के बीच जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से आयोजित नुक्कड़ नाटक सदर अस्पताल परिसर तक ही सीमित रह गया.


आयुष विभाग की ओर से ग्रामीणों को आयुष चिकित्सा पद्धति के प्रति जागरूक करने के लिए नुक्कड़ नाटक का आयोजन किया गया था. बताया गया कि यह कार्यक्रम सदर अस्पताल परिसर में ही आयोजित हुआ. कार्यक्रम को देखने वालों में मुख्य रूप से अस्पताल के डॉक्टर और नर्स ही नजर आए. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जिस कार्यक्रम का उद्देश्य ग्रामीणों तक आयुष चिकित्सा का संदेश पहुंचाना था, उसका आयोजन अस्पताल परिसर में करने से आम ग्रामीणों तक इसका संदेश किस हद तक पहुंच पाया.
नुक्कड़ नाटक की मूल अवधारणा लोगों के बीच जाकर जागरूकता का संदेश पहुंचाना है. गांव के चौक, हाट-बाजार, सार्वजनिक स्थल और ग्रामीण बस्तियां इसके स्वाभाविक मंच माने जाते हैं. लेकिन सरायकेला में आयोजित कार्यक्रम में ग्रामीणों के बीच जाने के बजाय सदर अस्पताल परिसर को ही मंच बनाया गया.
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस कार्यक्रम का नाम ही नुक्कड़ नाटक है, उसका नुक्कड़ आखिर कहां था. यदि उद्देश्य ग्रामीणों को आयुष चिकित्सा के प्रति जागरूक करना था तो कार्यक्रम किसी गांव, हाट-बाजार या सार्वजनिक स्थल पर क्यों नहीं आयोजित किया गया. ग्रामीणों के बीच जाकर आयुष पद्धति की जानकारी देने के बजाय अस्पताल परिसर में कार्यक्रम आयोजित करने का निर्णय किस आधार पर लिया गया.
विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि ग्रामीण जागरूकता अभियान के तहत कितने नुक्कड़ नाटक आयोजित किए जाने थे. कितने गांव और सार्वजनिक स्थल इसके लिए निर्धारित किए गए थे. कार्यक्रम के लिए कितनी राशि स्वीकृत हुई और कितनी राशि खर्च की गई. साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि आयोजित कार्यक्रम के माध्यम से कितने ग्रामीणों तक आयुष चिकित्सा का संदेश पहुंचा.
क्योंकि यदि कार्यक्रम के दर्शकों में मुख्य रूप से डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी ही शामिल रहे, तो ग्रामीण जागरूकता अभियान का वास्तविक लाभ आम लोगों तक कितना पहुंचा, यह सवाल बना हुआ है.
नुक्कड़ नाटक का सवाल जिले की आयुष व्यवस्था की दूसरी चुनौतियों से भी जुड़ता है. सरायकेला-खरसावां जिले में 33 आयुष्मान आरोग्य मंदिर संचालित होने की जानकारी है. इनमें 26 आयुष स्वास्थ्य पदाधिकारी पदस्थापित या प्रतिनियुक्त बताए गए हैं. विभाग की ओर से विभिन्न प्रखंडों में स्वास्थ्य शिविर आयोजित कर ग्रामीणों की जांच और दवा वितरण किए जाने की भी जानकारी दी जाती है.
हालांकि कई आयुष केंद्रों पर बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी की बात सामने आ रही है. कई केंद्रों के पास अपना भवन भी नहीं है और दूसरे सरकारी भवनों में स्वास्थ्य सेवाएं संचालित की जा रही हैं. ऐसे में सवाल है कि जिन केंद्रों पर बुनियादी सुविधाओं का अभाव है, वहां मरीजों को बेहतर आयुष चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने का दावा कितना प्रभावी है.
जिले में जिला आयुष चिकित्सा पदाधिकारी का पद भी रिक्त बताया जा रहा है. उपलब्ध जानकारी के अनुसार 12 अगस्त 2024 तक डॉ. कृष्ण कुमार इस पद पर प्रतिनियुक्त थे. उनके स्थानांतरण के बाद यह पद खाली हो गया. इसके बाद 13 अगस्त 2024 को पूर्वी सिंहभूम की जिला आयुष चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. पूनम कुमारी को सरायकेला-खरसावां का अतिरिक्त प्रभार दिया गया. तब से वह दोनों जिलों की जिम्मेदारी संभाल रही हैं.
ऐसे में सवाल है कि एक अधिकारी के पास दो जिलों की जिम्मेदारी होने की स्थिति में सरायकेला-खरसावां के 33 आयुष केंद्रों की नियमित निगरानी और विभागीय व्यवस्था की प्रभावी देखरेख किस तरह हो रही है.
जिले में 13 आयुर्वेदिक, 5 होम्योपैथिक और 2 यूनानी चिकित्सा केंद्र संचालित होने की जानकारी है. वहीं आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा पद्धति के चिकित्सकों की पदस्थापना को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. उपलब्ध जानकारी के अनुसार जिले में आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा पद्धति के चिकित्सक पदस्थापित नहीं हैं. दूसरी ओर केंद्रों में मरीजों के उपचार की व्यवस्था सीएचओ के माध्यम से संचालित की जा रही है.
प्रभारी जिला आयुष चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. पूनम कुमारी के अनुसार राष्ट्रीय आयुष मिशन के तहत वर्ष 2022 से जिले के आयुष केंद्रों में सीएचओ की नियुक्ति कर स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र संचालित किए जा रहे हैं. ऐसे में सवाल है कि आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा केंद्रों पर संबंधित चिकित्सा पद्धति के विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति कब होगी.
जिला संयुक्त औषधालय का भी अपना भवन नहीं है. जानकारी के अनुसार आयुष्मान आरोग्य मंदिर सरायकेला के दो कमरों में जिला कार्यालय संचालित किया जा रहा है. एक ओर विभाग आयुष सेवाओं के विस्तार की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर जिला कार्यालय के लिए भी पर्याप्त आधारभूत संरचना उपलब्ध नहीं होने की स्थिति सामने आ रही है.
विश्व आयुर्वेद दिवस पर हर साल कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं. मंच सज सकते हैं, भाषण हो सकते हैं और प्रचार सामग्री तैयार की जा सकती है. लेकिन आयुष व्यवस्था की वास्तविक कसौटी तब सामने आती है, जब ग्रामीण मरीज आयुष केंद्र पहुंचता है और उसे विशेषज्ञ चिकित्सा, आवश्यक दवा तथा बुनियादी सुविधाएं कितनी आसानी से उपलब्ध होती हैं.
इसी तरह किसी जागरूकता अभियान की सफलता का आकलन इस बात से होना चाहिए कि विभाग का संदेश अस्पताल की चारदीवारी के भीतर मौजूद स्वास्थ्यकर्मियों तक पहुंचा या उन ग्रामीणों तक, जिनके लिए अभियान तैयार किया गया था.
इस पूरे मामले में विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि सदर अस्पताल परिसर में आयोजित नुक्कड़ नाटक को ग्रामीण जागरूकता अभियान के रूप में किस आधार पर देखा जा रहा है और ग्रामीण क्षेत्रों में आयुष चिकित्सा के प्रचार-प्रसार के लिए आगे क्या योजना है.
नुक्कड़ गांव में होना था, लेकिन नाटक अस्पताल में ही खत्म हो गया. अब सवाल यह है कि यह ग्रामीणों तक आयुष का संदेश पहुंचाने का अभियान था या सिर्फ एक औपचारिक कार्यक्रम.
प्रमोद सिंह. संपादक

