चाईबासा: शारदीय नवरात्र में सिंहभूम की पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच स्थित मां भगवती के पावन स्थलों से हम अपने पाठकों को रूबरू कराते है. सोनुआ और बंदगांव प्रखंड की हरी-भरी पहाड़ी घाटियों के बीच स्थित कुरुजुली के ‘दुर्गा दा’ का विशेष धार्मिक और प्राकृतिक महत्व है.


यहां किसी भव्य मंदिर या स्थापित प्रतिमा के बजाय प्राकृतिक झरने के बीच मां दुर्गा के स्वरूप माने जाने वाले एक शिलाखंड की पूजा होती है. घने जंगल और पहाड़ियों से घिरे इस स्थान तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को कई किलोमीटर पैदल सफर करना पड़ता है. प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक आस्था का यह संगम श्रद्धालुओं के साथ प्रकृति प्रेमियों को भी आकर्षित करता है.

स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार दुर्गा दा के प्रति लोगों की आस्था लगातार बढ़ रही है. कुछ समय पूर्व पवित्र माने जाने वाले शिलाखंड को कथित रूप से कुछ असामाजिक तत्व वहां से उठाकर ले गए थे. बाद में ग्रामीणों और पुलिस के प्रयास से उसे गोइलकेरा के जंगल क्षेत्र से बरामद कर पुनः स्थापित किया गया.
नवरात्र के दिनों में श्रद्धालु दुर्गम पगडंडियों से होकर मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं. चारों ओर ऊंची पहाड़ियां, घना जंगल, प्राकृतिक झरना और पक्षियों की आवाज इस क्षेत्र को बेहद मनोरम बनाती है. वहीं स्थानीय लोगों की मान्यता और दावा है कि नवरात्र के दौरान शाम ढलने के बाद जंगल से बाघ की गर्जना जैसी आवाज भी सुनाई देती है, जिसे वे मां दुर्गा की सवारी से जोड़कर देखते हैं.
कैसे पहुंचें दुर्गा दा
रांची-चाईबासा एनएच-75 से नाकटी होते हुए कुरुजुली गांव पहुंचा जा सकता है. दूसरा मार्ग सोनुआ से लोंजो, नाचल्दा और कर्मबा होते हुए कुरुजुली तक जाता है. कुरुजुली तक बाइक से पहुंचने के बाद करीब छह किलोमीटर जंगल और पहाड़ी रास्ते में पैदल चलना पड़ता है.
दुर्गम वन क्षेत्र होने के कारण यहां जाने से पहले कुरुजुली ग्रामसभा से अनुमति लेना और स्थानीय गाइड को साथ रखना बेहतर माना जाता है. अनजान व्यक्ति के लिए अकेले जंगल में प्रवेश जोखिमपूर्ण हो सकता है.
दिन में पक्षियों की मधुर चहचहाहट और झरने की आवाज से गुलजार रहने वाला दुर्गा दा शाम होते ही गहरी खामोशी में डूब जाता है. प्रकृति की गोद में बसे इस आस्था स्थल की यही रहस्यमयी खूबसूरती इसे सिंहभूम के अन्य धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती है.
रिपोर्ट: जयंत प्रमाणिक

