व्यंग: सरायकेला- खरसावां जिला झामुमो इन दिनों संगठन कम और राजनीतिक धारावाहिक ज्यादा नजर आने लगा है. पार्टी कार्यालय से लेकर नेताओं के ड्राइंग रूम तक हर जगह अलग- अलग पटकथा लिखी जा रही है. हालत ऐसी हो गई है कि हर नेता खुद को संगठन का असली सूत्रधार और बाकी सभी को “साइड कलाकार” मानकर चल रहा है. जिले में फिलहाल “एक पार्टी- कई दरबार” वाला मॉडल सफलतापूर्वक संचालित हो रहा है.

सांसद का अलग कुनबा, विधायक का अलग खेमा, जिलाध्यक्ष का अलग दरबार और नीचे के पदाधिकारियों की अपनी अलग पंचायत चल रही है. कार्यकर्ताओं की स्थिति बिल्कुल उस आम आदमी जैसी हो गई है, जिसे समझ नहीं आ रहा कि आखिर सलाम किसे करें और नाराज किसे न करें.
कहा जा रहा है कि पार्टी में कुछ नेता इतने सक्रिय हैं कि वे विपक्ष से ज्यादा अपने ही लोगों की काट में लगे रहते हैं. संगठन की बैठकों में विकास से ज्यादा चर्चा इस बात पर होती है कि किसका पोस्टर बड़ा था, किसकी कुर्सी आगे लगी थी और किसके समर्थकों ने ज्यादा नारे लगाए.
राजनीतिक गलियारों में यह भी कानाफूसी है कि कुछ चेहरे पार्टी में रहकर भी “कमल प्रेम” से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाए हैं. ऐसे नेताओं को लेकर कार्यकर्ताओं के बीच “स्लीपर सेल” वाली फुसफुसाहट भी तेज हो गई है. हालांकि खुलकर कोई कुछ नहीं बोलता, क्योंकि यहां हर कोई किसी न किसी बड़े नेता का “करीबी” बताया जाता है.
स्थिति यह है कि अब प्रशासनिक अधिकारी भी नेताओं की सिफारिश सुनने से पहले यह जानना चाहते हैं कि नेता किस गुट से आते हैं. कई अधिकारी तो अंदरखाने यह तक कहने लगे हैं कि पहले पार्टी तय कर ले कि असली कप्तान कौन है, फिर आदेश पर अमल किया जाएगा.
जमीनी कार्यकर्ताओं का दर्द भी कम दिलचस्प नहीं है. उनका कहना है कि पार्टी अब आंदोलन से ज्यादा मैनेजमेंट पर चल रही है. जो जितना बड़ा समूह लेकर चलता है, वही उतना बड़ा नेता माना जाता है. विचारधारा अब पीछे छूटती जा रही है और फोटोबाजी, शक्ति प्रदर्शन और गुटीय राजनीति आगे निकल चुकी है.
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यदि समय रहते पार्टी आलाकमान ने “महाभारत” को शांत नहीं कराया तो आने वाले दिनों में संगठन को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है. फिलहाल जिले में झामुमो की राजनीति “एक अनार सौ बीमार” वाली स्थिति में पहुंच चुकी है, जहां हर कोई खुद को भविष्य का सबसे बड़ा चेहरा मानकर चल रहा है.
संतोष कुमार



