सरायकेला: जिले में अवैध खनन रोकने के लिए बैठकें होती हैं. निर्देश जारी होते हैं. अधिकारियों को सख्ती बरतने को कहा जाता है. छापेमारी और कार्रवाई की खबरें भी आती हैं. मगर दूसरी तरफ नदी घाटों से कथित रूप से बालू का उठाव और सड़कों पर उसका परिवहन जारी रहने की शिकायतें सामने आ रही हैं. ऐसे में सवाल सीधा है- अगर NGT की रोक प्रभावी है तो बालू आ कहां से रहा है ? और यदि बालू घाटों से ही निकल रहा है, तो फिर निगरानी किस चीज की हो रही है ?


मीटिंग में ‘जीरो टॉलरेंस’, घाटों पर कौन दे रहा ‘ग्रीन सिग्नल’ ?
अवैध खनन को लेकर प्रशासनिक बैठकों में सख्त निर्देश कोई नई बात नहीं है. खनन विभाग से लेकर अंचल और पुलिस तक को निगरानी की जिम्मेदारी दी जाती है. लेकिन कथित अवैध बालू उठाव की लगातार सामने आती शिकायतें इन दावों पर सवाल खड़े करती हैं. बालू कोई ऐसी चीज भी नहीं जिसे जेब में रखकर घाट से निकाल लिया जाए. इसके उत्खनन में लोग लगते हैं. परिवहन के लिए ट्रैक्टर या दूसरे वाहन चाहिए. वाहन नदी घाट से निकलकर सड़कों से गुजरते हैं और फिर बालू अपने खरीदार तक पहुंचता है. इतनी लंबी प्रक्रिया यदि लगातार चल रही है तो जिम्मेदार तंत्र को इसकी भनक न लगना अपने आप में बड़ा सवाल है.
तीन- चार हजार में ट्रैक्टर बालू, फिर भी सिस्टम ‘अनजान’ ?
स्थानीय स्तर पर आरोप है कि अवैध रूप से निकाला गया बालू तीन से चार हजार रुपये प्रति ट्रैक्टर तक बेचा जा रहा है. हालांकि इस कीमत और कारोबार के पैमाने की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है. लेकिन यदि शिकायतें सही हैं तो मामला केवल चोरी- छिपे बालू उठाने तक सीमित नहीं रह जाता. सवाल यह भी उठता है कि घाट से निकलने के बाद बालू लदे वाहन किन रास्तों से गुजरते हैं और रास्ते में उनकी जांच क्यों नहीं हो पाती ? कहीं ऐसा तो नहीं कि घाटों पर NGT की रोक है, मगर बालू के पहियों को रोकने वाली व्यवस्था ही कमजोर पड़ गई है ?
सफेदपोश संरक्षण के आरोप, जांच से ही साफ होगी तस्वीर
बालू कारोबार से जुड़े कुछ लोगों की ओर से प्रभावशाली और सफेदपोश लोगों के संरक्षण के आरोप भी लगाए जा रहे हैं. इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है. इसलिए किसी व्यक्ति या समूह की भूमिका को बिना जांच के स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता. मगर सवाल आरोप लगाने वाले का नहीं, आरोप की जांच का है. यदि जिले में बार- बार एक जैसी शिकायतें सामने आ रही हैं तो प्रशासन के पास उन्हें गलत साबित करने का सबसे प्रभावी तरीका भी है- घाटों की जांच, नियमित पेट्रोलिंग, वाहनों की चेकिंग और अवैध भंडारण पर कार्रवाई. बालू दिख रहा है, कारोबारी दिख रहे हैं, तो जिम्मेदारों को क्यों नहीं दिख रहा ?
यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा कटाक्ष है.
घाट से बालू निकलने की शिकायत है. सड़कों पर बालू लदे वाहनों की शिकायत है. बाजार में बालू बिकने की बात कही जा रही है. फिर भी यदि अवैध कारोबार नहीं रुक रहा तो सवाल उठेगा ही कि व्यवस्था में कमी कहां है. निगरानी कमजोर है, कार्रवाई नाकाफी है या फिर खेल की जड़ें व्यवस्था की पहुंच से कहीं ज्यादा गहरी हैं ? इन सवालों का जवाब आरोप- प्रत्यारोप से नहीं, प्रशासन की कार्रवाई से मिलेगा.
रोक हटने तक घाट बचेगा या सिर्फ बोर्ड ?
जिस रफ्तार से बालू उठाव के आरोप सामने आ रहे हैं, उससे अब यह कटाक्ष भी सुनाई देने लगा है कि कहीं NGT की रोक हटने तक घाटों में बालू बचेगा भी या केवल घाट का नाम और सरकारी बोर्ड ही रह जाएगा. बालू का अवैध उत्खनन सिर्फ राजस्व का सवाल नहीं है. यह नदियों के पर्यावरण, प्राकृतिक संसाधनों और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन से भी जुड़ा मामला है. जिला प्रशासन के सामने इसलिए चुनौती केवल अवैध बालू रोकने की नहीं, बल्कि यह साबित करने की भी है कि सरकारी आदेश फाइल और बैठक की मेज से निकलकर नदी घाट तक पहुंच रहे हैं.
अब देखना होगा कि प्रशासन घाट से सड़क तक निगरानी का शिकंजा कसता है या फिर अवैध खनन पर एक और बैठक होगी, कुछ और सख्त निर्देश निकलेंगे और नदी किनारे बालू का खेल अपनी रफ्तार से चलता रहेगा.
प्रमोद सिंह (संपादक)

