सरायकेला: शिक्षा विभाग में कथित अवैध नियुक्ति और पद पर बने रहने के गंभीर आरोपों से घिरी सांत्वना जेना के मामले में जांच का आदेश भी अब बेअसर नजर आ रहा है. उपायुक्त ने 15 दिनों के भीतर जांच रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया था, लेकिन चार महीने से अधिक समय बीत जाने के बावजूद जांच रिपोर्ट उपायुक्त तक नहीं पहुंची है. आखिर ऐसा क्या है इस जांच में, जिसकी रिपोर्ट तैयार करने में चार महीने भी कम पड़ गए. क्या विभागीय अधिकारी जांच कर रहे हैं या फिर किसी को बचाने के लिए पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है.


मामले की जांच की जिम्मेदारी जिला शिक्षा अधीक्षक को सौंपी गई थी. इसके बावजूद अब तक जांच रिपोर्ट उपायुक्त को उपलब्ध नहीं कराई गई है. समय-सीमा के भीतर रिपोर्ट नहीं सौंपे जाने से जिला शिक्षा अधीक्षक कार्यालय की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. वहीं, शिक्षा विभाग के सूत्रों का दावा है कि इस पूरे मामले में सांत्वना जेना को बचाने की कोशिश की जा रही है और जांच रिपोर्ट को जानबूझकर दबाकर रखा गया है. हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि होना अभी बाकी है.
इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू सांत्वना जेना की नियुक्ति और उनके पदनाम को लेकर उठ रहे सवाल हैं. शिक्षा विभाग के सूत्रों के अनुसार, सांत्वना जेना पिछले लगभग 15 वर्षों से विभाग में कार्यरत हैं. उन्हें डीआरपी प्रभारी बताया जाता है, जबकि जानकारी के अनुसार डीआरपी विभाग वर्ष 2010 में ही समाप्त कर दिया गया था. यदि राज्य में यह विभाग अस्तित्व में ही नहीं है, तो फिर सांत्वना जेना को किस आधार पर डीआरपी प्रभारी बनाया गया. उन्हें किस आदेश, अधिसूचना या विभागीय स्वीकृति के आधार पर यह जिम्मेदारी दी गई.
इतना ही नहीं, उन्हें चांडिल का बीपीओ भी बताया जाता है. ऐसे में सवाल उठता है कि डीआरपी प्रभारी सह चांडिल बीपीओ के पद पर उनकी नियुक्ति अथवा पदस्थापन का आधार क्या है. क्या इसके लिए कोई सरकारी आदेश जारी हुआ था. यदि हुआ था तो उसकी प्रति सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही है. और यदि ऐसा कोई आदेश नहीं है, तो इतने वर्षों तक विभाग में इस व्यवस्था को किसकी अनुमति से चलाया जाता रहा.
शिक्षा विभाग के सूत्रों से मिल रही जानकारी के अनुसार, इस मामले में जिला शिक्षा पदाधिकारी की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए. सूत्रों का आरोप है कि सांत्वना जेना को बचाने के प्रयास में जांच रिपोर्ट को आगे बढ़ाने में टालमटोल की जा रही है. यदि यह आरोप गलत है तो विभाग को सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए. आखिर जांच रिपोर्ट तैयार होने के बावजूद उसे उपायुक्त को क्यों नहीं सौंपा गया. और यदि जांच पूरी नहीं हुई है तो चार महीने बाद भी देरी का कारण क्या है.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब जिले के उपायुक्त ने 15 दिनों में जांच रिपोर्ट देने का निर्देश दिया था, तो चार महीने बीत जाने के बाद भी उसका अनुपालन क्यों नहीं हुआ. क्या विभागीय अधिकारियों के लिए उपायुक्त का आदेश भी महज औपचारिकता बनकर रह गया है. क्या जांच की समय- सीमा का पालन नहीं करने वाले अधिकारियों से जवाब- तलब किया जाएगा.
अब जरूरत केवल जांच रिपोर्ट मांगने की नहीं, बल्कि पूरे मामले की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कराने की है. सांत्वना जेना की नियुक्ति, पदस्थापन, शैक्षणिक एवं सेवा संबंधी दस्तावेजों और डीआरपी प्रभारी सह चांडिल बीपीओ के पद पर उनकी जिम्मेदारी के आधार को सार्वजनिक किया जाना चाहिए.
जनता जानना चाहती है कि आखिर 15 दिनों की जांच चार महीने में भी पूरी क्यों नहीं हुई. किसके दबाव में फाइल रुकी हुई है. और किसे बचाने के लिए जांच रिपोर्ट उपायुक्त तक नहीं पहुंचाई जा रही है. अब देखना यह है कि उपायुक्त इस मामले में जवाबदेही तय करते हैं या शिक्षा विभाग के अधिकारी इसी तरह जांच के नाम पर मामले को लटकाते रहेंगे.
प्रमोद सिंह (संपादक)

