रांची: राजधानी रांची के ऐतिहासिक मोरहाबादी मैदान में आयोजित आदिवासी एकता महाजुटान ने झारखंड की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है. राज्य के विभिन्न जिलों से बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोग रैली में पहुंचे. महाजुटान में परिसीमन, आदिवासी आरक्षित सीटों और खान- खनिज से जुड़े मुद्दे प्रमुखता से उठे. वहीं रैली को लेकर पूर्व मंत्री बंधु तिर्की और पूर्व मुख्यमंत्री सह भाजपा नेता चंपाई सोरेन की प्रतिक्रियाओं ने सियासी तापमान और बढ़ा दिया है.


पूर्व मंत्री बंधु तिर्की ने रैली में उमड़ी भीड़ को आदिवासी समाज की एकजुटता का संदेश बताते हुए केंद्र सरकार को चेतावनी दी. उन्होंने कहा कि प्रस्तावित परिसीमन में यदि जनसंख्या को आधार बनाकर आदिवासियों के साथ अन्याय किया गया और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित विधानसभा सीटों की संख्या में कटौती हुई तो इसका पुरजोर विरोध किया जाएगा.
बंधु तिर्की ने खान-खनिज से संबंधित प्रस्तावित संशोधन का भी विरोध किया. उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार को मोरहाबादी में दिखाई दी आदिवासी एकजुटता से संदेश समझ लेना चाहिए. यदि संबंधित संशोधन वापस नहीं लिया गया तो भविष्य में आर्थिक नाकेबंदी कैसी होगी, इसका अंदाजा इस महाजुटान से लगाया जा सकता है. उन्होंने RSS पर भी निशाना साधते हुए कहा कि उसका एजेंडा झारखंड में नहीं चलने दिया जाएगा.
*चंपाई सोरेन का पलटवार, रैली की प्रकृति पर ही उठाया सवाल*
दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स और फेसबुक पर लंबा पोस्ट कर रैली के स्वरूप पर ही सवाल खड़े कर दिए. उन्होंने इसे आदिवासी रैली के बजाय धर्मांतरित ईसाइयों से जुड़ी रैली बताते हुए दावा किया कि ईसाई धर्मगुरुओं के कथित पत्र सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहे हैं. यह चंपाई सोरेन का दावा है.
उन्होंने परिसीमन के मुद्दे पर कांग्रेस को भी कठघरे में खड़ा किया. चंपाई सोरेन ने दावा किया कि 2008 के परिसीमन के दौरान ओडिशा के मयूरभंज में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटें नौ से घटकर सात और छत्तीसगढ़ में 34 से घटकर 29 रह गई थीं. इसके साथ ही उन्होंने कांग्रेस के पुराने फैसलों को लेकर आदिवासी धर्म कोड और डीलिस्टिंग का मुद्दा उठाया.
चंपाई सोरेन ने धर्मांतरण के बाद भी अनुसूचित जनजाति को मिलने वाले संवैधानिक लाभ के सवाल को उठाते हुए कांग्रेस पर तीखे आरोप लगाए. उन्होंने सरकारी नौकरियों और सरना- जाहेर स्थलों को लेकर भी कई दावे किए हैं. हालांकि इन दावों के समर्थन में उन्होंने अपने पोस्ट में विस्तृत आधिकारिक आंकड़े प्रस्तुत नहीं किए.
*परिसीमन पर दोनों पक्षों की चिंता, लेकिन राजनीतिक रास्ते अलग*
दिलचस्प यह है कि तीखे राजनीतिक मतभेदों के बावजूद परिसीमन के बाद आदिवासी प्रतिनिधित्व कम नहीं होने के सवाल पर दोनों नेताओं के बयानों में एक साझा चिंता दिखाई देती है. बंधु तिर्की ने स्पष्ट किया कि आदिवासी आरक्षित सीटों में किसी तरह की कटौती स्वीकार नहीं की जाएगी. वहीं चंपाई सोरेन ने कहा कि जनगणना और जनसांख्यिकी समेत विभिन्न कारकों को ध्यान में रखते हुए परिसीमन किया जाता है, लेकिन उनका स्पष्ट मत है कि परिसीमन के बाद शेड्यूल एरिया में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या बढ़नी चाहिए. उन्होंने भरोसा जताया कि केंद्र सरकार आदिवासी समाज के हितों को लेकर गंभीर है और समाज के साथ अन्याय नहीं होगा.
ऐसे में मोरहाबादी का महाजुटान केवल एक रैली तक सीमित नहीं रहा. इसने परिसीमन, ST राजनीतिक प्रतिनिधित्व, खान-खनिज नीति, धर्मांतरण और डीलिस्टिंग जैसे संवेदनशील मुद्दों को एक साथ झारखंड की राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है. आने वाले दिनों में इन मुद्दों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव और तेज होने के संकेत हैं.

