जमशेदपुर: रहबर फाउंडेशन ने अपने मिशन “To Help People in Need and Eliminate Poverty” के तहत जुगसलाई ईदगाह मैदान में 100 गरीब, विधवा एवं बेरोज़गार लोगों के बीच फल और सब्ज़ी बेचने के लिए ठेलों का वितरण किया. कार्यक्रम का उद्देश्य जरूरतमंद परिवारों को आत्मनिर्भर बनाकर उन्हें सम्मानजनक रोजगार से जोड़ना रहा.



कार्यक्रम से पहले संस्था की ओर से सभी लाभार्थियों का सत्यापन किया गया. इसके बाद प्रत्येक लाभार्थी को एक नया ठेला उपलब्ध कराया गया. साथ ही व्यवसाय की शुरुआत में किसी प्रकार की परेशानी न हो, इसके लिए प्रत्येक ठेले के साथ 8 से 10 प्रकार के ताज़े फल और सब्ज़ियाँ भी दी गईं, ताकि लाभार्थी पहले ही दिन से अपनी आजीविका शुरू कर सकें.
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में ग़ुलाम रसूल बलियावी, अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष हिदायतुल्लाह ख़ान, डॉ. ज़रकानी तथा मौलाना रौशन ज़मीर नूरी उपस्थित रहे. सभी अतिथियों ने रहबर फाउंडेशन की इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि गरीबी दूर करने का सबसे प्रभावी माध्यम लोगों को रोजगार से जोड़ना है. उन्होंने कहा कि जब किसी व्यक्ति को मेहनत के बल पर सम्मानपूर्वक कमाने का अवसर मिलता है, तो वह न केवल अपने परिवार का भविष्य संवारता है, बल्कि समाज के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है.
ठेला प्राप्त करने वाले लाभार्थियों के चेहरों पर खुशी साफ झलक रही थी. कई विधवा महिलाओं और बेरोज़गार युवाओं ने संस्था का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह सहायता उनके लिए नई उम्मीद लेकर आई है. अब वे दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय अपने परिवार का भरण-पोषण स्वयं कर सकेंगे.
रहबर फाउंडेशन के पदाधिकारियों ने बताया कि संस्था का उद्देश्य केवल राहत सामग्री वितरित करना नहीं, बल्कि जरूरतमंद लोगों को स्थायी रूप से आत्मनिर्भर बनाना है. इसी सोच के साथ समय-समय पर रोजगार आधारित कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, ताकि गरीब और बेरोज़गार लोगों को सम्मानजनक आजीविका का अवसर मिल सके.
कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने भी इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि यदि सामाजिक संस्थाएं, उद्योग जगत और सरकार मिलकर रोजगार आधारित योजनाओं को बढ़ावा दें, तो गरीबी और बेरोज़गारी जैसी समस्याओं पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है.
रहबर फाउंडेशन की यह पहल केवल 100 ठेलों के वितरण तक सीमित नहीं है, बल्कि 100 परिवारों के भविष्य को आत्मनिर्भरता की नई राह दिखाने का एक सार्थक प्रयास है. यह संदेश भी देती है कि अस्थायी सहायता से अधिक महत्वपूर्ण किसी व्यक्ति को अपने पैरों पर खड़ा होने का अवसर देना है.
रिपोर्ट: अफ़रोज़ मल्लिक





