
सरायकेला: जिला के आदित्यपुर में पत्रकार सुनील गुप्ता और उनके पुत्र पर हुए हमले के बाद जो घटनाक्रम सामने आया, उसने केवल एक आपराधिक मामले को नहीं, बल्कि पत्रकार समाज के भीतर की कई सच्चाइयों को भी उजागर कर दिया. यह प्रकरण आने वाले वर्षों तक सरायकेला- खरसावां के पत्रकारिता इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में याद किया जाएगा.


चार दिनों तक गंभीर धाराओं में प्राथमिकी दर्ज रहने के बावजूद आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं हुई. लेकिन जैसे ही “प्रेस क्लब ऑफ सरायकेला- खरसावां” ने अनिश्चितकालीन धरने का ऐलान किया और जिले के पत्रकार एक मंच पर आए, प्रशासन हरकत में आया और कुछ ही घंटों के भीतर चारों आरोपी गिरफ्तार कर लिए गए. यह संयोग था या पत्रकार एकता का प्रभाव, इसका जवाब जनता स्वयं तलाश सकती है.
इस पूरे आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि प्रेस क्लब ने यह संदेश दिया कि संगठन केवल परिचय- पत्र बांटने के लिए नहीं, बल्कि संकट की घड़ी में अपने साथियों के साथ खड़े रहने के लिए होता है. पिछले छह वर्षों में प्रेस क्लब ने पत्रकारों के हित, सम्मान और सुरक्षा को लेकर कई ऐसे कदम उठाए हैं, जो आज पूरे झारखंड के पत्रकार संगठनों के बीच चर्चा का विषय हैं. यह संगठन हर चुनौती, हर दबाव और हर विरोध के बावजूद अपने मूल उद्देश्य से पीछे नहीं हटा. हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम ने कुछ असहज सवाल भी खड़े किए हैं.
पहला सवाल
जब एक पत्रकार पर हमला हुआ और पत्रकार सुरक्षा का सवाल खड़ा हुआ, तब कुछ स्वयंभू बुद्धिजीवी और प्रभावशाली माने जाने वाले पत्रकार आखिर सामने क्यों नहीं आए ? क्या पत्रकार एकता केवल सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित रह गई है ?
दूसरा सवाल
जो लोग अक्सर पत्रकारिता की नैतिकता और लोकतंत्र की रक्षा पर लंबे- लंबे भाषण देते हैं, क्या उन्हें इस आंदोलन में शामिल होकर अपने विचारों को व्यवहार में नहीं उतारना चाहिए था ?
तीसरा सवाल
जिले और राज्य के कई बड़े मीडिया संस्थानों ने इस आंदोलन को अपेक्षित प्रमुखता क्यों नहीं दी ? क्या पत्रकारों से जुड़ा मुद्दा तब तक खबर नहीं बनता, जब तक उसमें राजनीतिक रंग न हो ? यदि पत्रकारों की सुरक्षा ही समाचार नहीं बनेगी, तो फिर पत्रकारिता के मूल सरोकारों की रक्षा कौन करेगा ?
चौथा सवाल
क्या बड़े मीडिया हाउस में कार्यरत होने का अर्थ यह है कि स्थानीय पत्रकारों के संघर्ष से दूरी बना ली जाए ? क्या संगठनात्मक एकता से ऊपर संस्थान की पहचान होनी चाहिए ?
यह भी चर्चा का विषय रहा कि आंदोलन को कमजोर करने की कोशिशें पर्दे के पीछे से होती रहीं. यदि ऐसा हुआ, तो यह केवल किसी संगठन के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरी पत्रकार बिरादरी की एकजुटता के खिलाफ प्रयास माना जाएगा. स्वस्थ असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन किसी साथी पत्रकार के न्याय के संघर्ष को कमजोर करना निश्चित रूप से गंभीर आत्ममंथन का विषय है.
कहां हुई पुलिस से चूक
इस पूरे प्रकरण में पुलिस की भूमिका का भी उल्लेख जरूरी है. शुरुआती देरी पर सवाल उठे, लेकिन बाद में पुलिस अधीक्षक के निर्देश पर जिस तेजी से कार्रवाई हुई और आरोपियों की गिरफ्तारी हुई, उसने यह भी दिखाया कि इच्छाशक्ति होने पर कानून तेजी से काम कर सकता है. यही सक्रियता यदि पहले दिन दिखाई जाती, तो शायद आंदोलन की नौबत नहीं आती. यह घटना केवल चार आरोपियों की गिरफ्तारी की कहानी नहीं है. यह उस विश्वास की कहानी है कि जब पत्रकार निजी हितों से ऊपर उठकर एक मंच पर खड़े होते हैं, तब व्यवस्था को भी जवाब देना पड़ता है. सरायकेला- खरसावां प्रेस क्लब ने इस आंदोलन के माध्यम से यह साबित किया है कि संगठन की सबसे बड़ी ताकत उसके पदाधिकारी नहीं, बल्कि उसकी एकजुटता होती है. यही एकता भविष्य में भी पत्रकारों के सम्मान, सुरक्षा और अधिकारों की सबसे बड़ी गारंटी बन सकती है.
सलाह
हालांकि इसमें प्रेस क्लब के भी कुछ पत्रकार सदस्यों की भूमिका भी सवालों के घेरे में रही जिसपर संगठन को आत्ममंथन की जरूरत है. वैसे स्लीपर सेल को समय रहते चिन्हित कर कार्रवाई करनी होगी अन्यथा आने वाले दिनों में वैसे सदस्य संगठन के लिए नासूर बन सकते हैं.
संतोष कुमार
संपादक


