आदित्यपुर: नगर निगम के वार्ड 17 का चुनाव इस बार साधारण नहीं है. यहां लड़ाई पोस्टर और प्रचार से आगे बढ़कर “किसने क्या किया” बनाम “कौन क्या करेगा” पर आ टिकी है. और इस बहस के केंद्र में हैं पूर्व पार्षद नीतू शर्मा.

पिछले कार्यकाल में जयप्रकाश उद्यान सड़क को लेकर आंदोलन हो या स्ट्रीट लाइट और बुनियादी सुविधाओं के लिए प्रशासनिक दबाव- नीतू शर्मा इन मुद्दों को अपनी राजनीतिक पूंजी के रूप में पेश कर रही हैं. वार्ड में विकास की सारी योजनाएं धरातल पर उतर चुकी है. कुछ पाईपलाईन में हैं. वार्ड का शायद ही ऐसा कोई लाभुक हो जिसने नीतू शर्मा से मदद मांगा और वह निराश लौटा हो चाहे किसी भी जाति या धर्म को मानने वाला हो. सरकारी योजनाओं का लाभ हो, वृद्धा पेंशन, विधवा पेंशन, चिकित्सा सहायता, दिव्यांगों को सहायक उपकरण दिलाना हो, आधार कार्ड, वोटर कार्ड शिवर लगवाने से लेकर लाभुकों को पहुंचाने का काम निःस्वार्थ रूप से किया. साफ- सफाई, बाढ़ के वक्त सेनेटाइजेशन, गर्मी के मौसम में टैंकर से जलापूर्ति सभी मोर्चे पर नीतू शर्मा जनता की कसौटी पर खरी उतरी है. समर्थकों का दावा है कि वे केवल कागज़ी प्रतिनिधि नहीं रहीं, बल्कि ज़मीन पर दिखीं. विरोधियों के हमलों का जवाब भी वे “काम” से देने की रणनीति पर चल रही हैं.
अंबुज कुमार: पुरानी फाइल, पोस्टर में दम
अंबुज कुमार फिर मैदान में हैं. पूर्व पार्षद रह चुके अंबुज कुमार व्यापक विकास का खाका पेश कर रहे हैं. उसके चुनावी घोषणा पत्र पर गौर करें वार्ड- 17 अगला स्विजारलैंड होगा लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि मतदाता उनके पिछले कार्यकाल का हिसाब भी जोड़ रहे हैं. उनके समर्थक इसे अनुभव बताते हैं, विरोधी इसे अधूरा अध्याय. वे हमेशा सुर्खियों में रहे जरूर मगर जनता के हित से ज्यादा विवाद में रहे. कांग्रेस में रहकर पार्टी के लिए जनाधार तैयार नहीं कर सके.
अमित रंजन उर्फ शानू: युवा जोश, पर परीक्षा कड़ी
अमित रंजन उर्फ शानू पहली बार चुनावी रण में हैं. सोशल मीडिया से लेकर जमीनी प्रचार तक सक्रिय हैं. बदलाव, पारदर्शिता और नई सोच का नारा दे रहे हैं. लेकिन वार्ड की राजनीति में अनुभव की कसौटी कठोर होती है. देखना होगा युवा जोश वोट में कितना बदलता है. वैसे शानू सिंह वार्ड की जनता के बीच भ्रम फैला रहे है जो उन्हें दौड़ से दूर कर रहा है. जाति विशेष समर्थको के दम पर राजनीती साधने का प्रयास कर रहे हैं जो नकारात्मकतता की ओर ईशारा कर रहा है. उनके पास अपनी उपलब्धि बताने के लिए कुछ भी नहीं है ना ही अपने विजन को स्पष्ट रूप से जनता के बीच रख पा रहे हैं. निशाने पर पूर्व पार्षद के कार्यकाल को ले रहे हैं जो उनकी छवि को नकारात्मकता का स्वरूप दे रही है. उनके व्यवहार से वार्ड की जनता अभी से ही भयभीत नजर आ रही है.
बॉबी सिंह: बाहरी चेहरा और वार्ड के साथ सौतेला व्यहार अब जाति और समीकरण की राजनीति
बॉबी सिंह अपने पारंपरि वार्ड संख्या 23 को छोड़ वार्ड 17 से चुनावी मैदान में हैं. बीजेपी में अर्जुन मुंडा के खेमे से आते हैं. बाहुबली हैं. धन और बल की कोई कमी नहीं है. पिछले चुनाव में डिप्टी मेयर चुने गए थे. पूरा पांच साल का कार्यकाल विवादों में घिरा रहा. पार्षदों को गोलबंद करके विभाग के अधिकारियों पर दबाव की राजनीति करने में समय बिता दिया. अपने वार्ड से भी चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं रहे. हालांकि चाहते तो अपनी पत्नी को वार्ड 23 से चुनाव लड़ा सकते थे मगर वहां अपनों के बीच ही उन्हें जबरदस्त नाराजगी झेलनी पड़ी. यहां तक कि उन्होंने जिन- जिन पार्षदों को गोलबंद करके निगम पर दबाव बनाया उन पार्षदों ने भी अपने वार्ड का त्याग उनके लिए नहीं किया. वार्ड 17 से अंत में चुनावी मैदान में कूदे. वार्ड 17 के विकास में उनका क्या योगदान है जनता यह जानना चाहती है इसपर बताने के लिए उनके पास कोई जवाब नहीं है. खास वर्ग और जातीय गणित के आसरे धनबल और बाहुबल के बूते चुनावी मैदान में डटे हैं. स्थानीय स्तर पर संपर्क और सामाजिक नेटवर्क को अपनी ताकत मान रहे हैं. हालांकि सवाल यह है कि क्या यह नेटवर्क चुनावी लहर में तब्दील होगा. फिलहाल वे मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश में हैं. वैसे चुनावी प्रचार- प्रसार के दौरान बॉडीगार्ड और लाव- लश्कर देख़ जनता समझ चुकी है कि उन्हें अपने लिए क्या करना है.
विरेंद्र सिंह यादव: समाजसेवा से सियासत तक
विरेंद्र सिंह यादव समाजसेवी छवि के साथ प्रचार कर रहे हैं. महिला समूहों और धार्मिक- सामाजिक मंचों के जरिए समर्थन जुटाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं. घोषणापत्र में बड़े वादे हैं, लेकिन मतदाता व्यवहारिकता भी देख रहे हैं. राष्ट्रीय जनता दल के नेता हैं और जातीय समीकरण साधने की जुगत में है. चुनावी घोषणा पत्र के आसरे लोगों को रिझाने में ताकत झोंक रहे हैं.
रामचंद्र पासवान: उम्र अधिक मगर अनुभव की कमी
रामचंद्र पासवान सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी हैं. प्रशासनिक समझ को अपनी ताकत बता रहे हैं. लेकिन चुनावी गणित में संगठन और जमीनी पकड़ भी अहम होती है. जिन समर्थकों के बूते चुनावी रण में कूदे लगभग दूसरे प्रत्याशियों के साथ हो चुके हैं. एक बार विधानसभा चुनाव हार चुके रामचंद्र पासवान अपनी जमानत तक बचा पाने में विफल रहे. आदित्यपुर नगर निगम हो चाहे वार्ड के किसी भी समस्याओं को लेकर कभी मुखर होकर सामने नहीं आए. बुजुर्गों के साथ वार्ड के ताने-बाने को और आपसी समरसता को यदा-कदा तूल देते रहे. जिससे उनकी छवि नकारात्मक रही है. चुनावी प्रचार के दौरान उनके समक्ष कोई ऐसा मुद्दा नहीं है जिससे वह निवर्तमान पार्षद को चुनौती दे सके. अन्य प्रत्याशियों की तरह मेनिफेस्टो के आधार पर ही चुनावी मैदान में है.
निष्कर्ष: बढ़त नीतू शर्मा के पास, लेकिन खेल खुला है
वार्ड 17 में फिलहाल मुकाबले का केंद्र नीतू शर्मा हैं. बाकी प्रत्याशी या तो बदलाव का नैरेटिव गढ़ रहे हैं या पुराने समीकरण साध रहे हैं. यदि चुनाव “काम की निरंतरता” पर हुआ तो नीतू शर्मा को लाभ मिल सकता है. यदि मतदाता बदलाव के मूड में दिखे तो समीकरण बदल सकते हैं. अभी तस्वीर साफ नहीं, लेकिन इतना तय है- वार्ड 17 इस बार चुपचाप नहीं, सोच- समझकर वोट करेगा. परिणाम बताएगा कि जनता ने अनुभव चुना या प्रयोग. करीब छ: हजार मतदाता वाले इस वार्ड में आधी आबादी महिलाओं की है. पूरे आदित्यपुर नगर निगम की बात करें तो सबसे शिक्षित और और सभ्रान्त मतदाता इसी वार्ड में रहते हैं जो बगैर किसी दबाव और प्रलोभन के मतदान करते हैं. दो-तीन स्लम बस्तियां हैं जहां धनबल और बाहुबल का जोर चल सकता है. करीब- करीब सारे धनबली और बाहुबली प्रत्याशियों का जोर उन्हीं स्लम बस्तियों पर है. जातीय गणित पर भी प्रत्याशियों की नजर है. उसके बाद पार्टी आधारित कैडर वोटर भी बड़ा फैक्टर हो सकता है. कुल मिलाकर महिलाएं यदि घरों से निकल गई तो मुकाबला एकतरफा किसी भी प्रत्याशी के पक्ष में जा सकता है. इस मामले में कौन कितना प्रभाव डाल सकता है यह देखना दिलचस्प होगा.

