आदित्यपुर: बिजली व्यवस्था के आधुनिकीकरण, सिस्टम अपग्रेड और निर्बाध आपूर्ति के सरकारी दावों के बीच कुलुपटांगा फीडर के उपभोक्ता बार- बार घंटों की बिजली कटौती झेलने को मजबूर हैं. सोमवार को एक बार फिर तकनीकी खराबी के कारण करीब आठ घंटे तक विद्युत आपूर्ति प्रभावित रही. विभागीय स्तर से इसका कारण 33/11 KV PSS आदित्यपुर-1 में PTR की समस्या बताया गया. सवाल यह है कि यदि पिछले तीन- चार वर्षों से बिजली व्यवस्था को आधुनिक और मजबूत बनाने पर काम हो रहा है, तो एक ही क्षेत्र में बार-बार लंबे समय तक आपूर्ति बाधित होने की नौबत क्यों आ रही है ?


PTR यानी पावर ट्रांसफॉर्मर 33 KV से प्राप्त बिजली को 11 KV स्तर पर फीडरों को उपलब्ध कराने वाली व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है. इसमें खराबी आने पर उससे जुड़े फीडरों की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है. लेकिन किसी सब-स्टेशन में बार-बार तकनीकी समस्या सामने आना केवल तत्काल खराबी का विषय नहीं रह जाता. यह लोड मैनेजमेंट, उपकरणों की क्षमता, प्रिवेंटिव मेंटेनेंस, सुरक्षा प्रणाली और वैकल्पिक आपूर्ति व्यवस्था की स्थिति पर भी सवाल खड़ा करता है.
कुलुपटांगा फीडर में लंबी बिजली कटौती की यह पहली घटना नहीं है. हाल के दिनों में तकनीकी खराबी और लंबे अंतराल तक आपूर्ति बाधित रहने की शिकायतें बढ़ी हैं. ऐसे में हर बार केवल “टेक्निकल फॉल्ट” बताकर आपूर्ति बहाल कर देना स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता. विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि खराबी की मूल वजह क्या है और उसे दोबारा होने से रोकने के लिए क्या तकनीकी सुधार किए गए हैं.
आठ घंटे का पावर कट सिर्फ असुविधा नहीं
लंबे समय तक बिजली नहीं रहने का असर केवल घरों के पंखे और लाइट पर नहीं पड़ता. पानी की मोटर, छोटे व्यवसाय, दुकानें, ऑनलाइन काम, बच्चों की पढ़ाई और बिजली आधारित दूसरी जरूरी सेवाएं भी प्रभावित होती हैं. उमस और गर्मी के बीच आठ घंटे तक आपूर्ति बाधित रहना उपभोक्ताओं के लिए गंभीर समस्या है. सबसे महत्वपूर्ण सवाल वैकल्पिक व्यवस्था का है. यदि किसी PTR में खराबी आती है तो क्या संबंधित फीडर का पूरा या आंशिक लोड दूसरे ट्रांसफॉर्मर अथवा वैकल्पिक स्रोत पर स्थानांतरित करने की तकनीकी व्यवस्था मौजूद है ? यदि है तो सोमवार को इसका उपयोग क्यों नहीं हो सका ? और यदि नहीं है तो वर्षों से किए जा रहे आधुनिकीकरण में ऐसी व्यवस्था विकसित क्यों नहीं की गई ?
आधुनिकीकरण पर विभाग सार्वजनिक करे हिसाब
कुलुपटांगा फीडर के उपभोक्ताओं को यह जानने का अधिकार है कि पिछले तीन- चार वर्षों में उनके क्षेत्र की बिजली व्यवस्था पर कितना पैसा खर्च हुआ और उससे वास्तव में क्या बदला. कितने पुराने तार, जंपर, इंसुलेटर और अन्य उपकरण बदले गए ? PSS की क्षमता कितनी बढ़ी ? PTR की क्षमता और वर्तमान पीक लोड कितना है ? कितने नए ट्रांसफॉर्मर लगाए गए ? फीडर का लोड विभाजन कब हुआ ? प्रिवेंटिव मेंटेनेंस कितनी बार किया गया ? यदि करोड़ों रुपये के आधुनिकीकरण के बावजूद उपभोक्ता उसी तरह बार-बार घंटों बिजली कटौती झेल रहे हैं, तो खर्च और उसके परिणामों की समीक्षा जरूरी है. बार- बार की खराबी को सीधे भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं माना जा सकता, लेकिन लगातार तकनीकी विफलता, लंबे आउटेज और आधुनिकीकरण के परिणाम दिखाई नहीं देने की स्थिति में कार्यों की गुणवत्ता, खर्च और जवाबदेही की स्वतंत्र जांच की मांग जरूर वाजिब बनती है.
जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर भी उपभोक्ताओं में सवाल उठ रहे हैं. बिजली जैसी बुनियादी सुविधा पर यदि किसी क्षेत्र को लगातार परेशानी झेलनी पड़ रही है तो समस्या को केवल विभागीय तकनीकी खराबी मानकर छोड़ना उचित नहीं है. अब विभाग को रटा-रटाया जवाब देने के बजाय कुलुपटांगा फीडर के लिए तकनीकी ऑडिट, लोड स्टडी, PTR की स्थिति, वैकल्पिक आपूर्ति व्यवस्था और पिछले वर्षों में आधुनिकीकरण पर हुए खर्च का तथ्यात्मक ब्यौरा सार्वजनिक करना चाहिए. क्योंकि सवाल सिर्फ सोमवार के आठ घंटे का नहीं है. सवाल यह है कि आधुनिकीकरण पर वर्षों से काम होने के बाद भी कुलुपटांगा के उपभोक्ताओं को भरोसेमंद बिजली कब मिलेगी ?
संतोष कुमार

