आदित्यपुर: नगर निगम में नगर आयुक्त बदले, मेयर बदले, डिप्टी मेयर बदले, पार्षद भी बदल गए. लेकिन अगर कुछ नहीं बदला, तो वह है शहर की सफाई व्यवस्था. पिछले तीन- चार दिनों से आदित्यपुर नगर निगम क्षेत्र में कचरा उठाव पूरी तरह ठप है. बरसात के बीच मोहल्लों में कचरा बजबजा रहा है और चारों ओर दुर्गंध फैल रही है. यह स्थिति तब है, जब नगर निगम बने आठ वर्ष से अधिक हो चुके हैं. लेकिन आज तक कचरा निष्पादन की स्थायी व्यवस्था नहीं हो सकी.



नगर निगम की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहां कभी सफाईकर्मियों के वेतन को लेकर हड़ताल होती है, कभी ड्राइवरों के वेतन को लेकर काम ठप हो जाता है और जब यह समस्या नहीं होती, तब कचरा फेंकने की जगह को लेकर विरोध शुरू हो जाता है. नतीजा हर बार एक ही होता है- शहर कचरे में डूब जाता है.
कभी दो दिन यहां कचरा फेंका जाता है, फिर विरोध हुआ तो चार दिन दूसरी जगह. वहां भी विरोध हुआ तो चुपचाप काम बंद. क्या यही आदित्यपुर नगर निगम की कचरा निष्पादन नीति है ?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर हर बार उपायुक्त के हस्तक्षेप और निर्देश के बाद ही सफाई व्यवस्था पटरी पर आती है, तो फिर नगर आयुक्त, मेयर, डिप्टी मेयर और पार्षदों की जवाबदेही आखिर क्या है ?
जनता हर साल बढ़ा हुआ म्युनिसिपल टैक्स भर रही है. लेकिन बदले में उसे न नियमित सफाई मिल रही है, न कचरा निष्पादन की स्थायी व्यवस्था और न ही बुनियादी नागरिक सुविधाएं.
जनकल्याण मोर्चा के अध्यक्ष सह अधिवक्ता ओम प्रकाश ने मांग की है कि एनजीटी की गाइडलाइन के अनुरूप कचरा निष्पादन के लिए स्थायी स्थल तत्काल उपलब्ध कराया जाए. उनका कहना है कि जब तक डंपिंग की स्थायी व्यवस्था नहीं होती, तब तक नगर निगम के नए प्रशासनिक भवन का निर्माण और जनप्रतिनिधियों एवं अधिकारियों को नई लग्जरी सुविधाएं उपलब्ध कराने जैसे कार्य स्थगित किए जाएं. उनका तर्क है कि जब आम जनता बुनियादी सुविधाओं से वंचित है, तब सुविधाओं का विस्तार नहीं बल्कि व्यवस्था को दुरुस्त करना प्राथमिकता होनी चाहिए. आखिर जनता किस बात का टैक्स दे रही है- साफ शहर के लिए या सिर्फ आश्वासनों के लिए ?





