जामताड़ा: जिले में अवैध कोयला कारोबार पर अंकुश लगाने के प्रशासनिक दावों के बीच गोविंदपुर- साहेबगंज हाईवे पर कोयले की ढुलाई को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. नारायणपुर से मिहिजाम होते हुए पश्चिम बंगाल की सीमा तक पहुंचने वाला यह मार्ग कथित तौर पर अवैध कोयला परिवहन का सुरक्षित गलियारा बनता जा रहा है. रात का अंधेरा होते ही कोयला लदे ट्रकों की आवाजाही तेज हो जाती है. हैरानी की बात यह है कि कई वाहन खुलेआम बिना तिरपाल ढके और ओवरलोड की स्थिति में सड़क पर दौड़ते दिखाई दे रहे हैं. इसके बावजूद नियमित और प्रभावी कार्रवाई नजर नहीं आने से प्रशासनिक निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं.


गुरुवार की रात करीब 10:30 बजे चित्तरंजन स्टेशन के समीप जाम में धनबाद नंबर का एक ओवरलोड कोयला लदा ट्रक फंस गया. ट्रक संख्या JH10AL7998 पर कोयला खुले में लदा था और उसे तिरपाल से भी नहीं ढका गया था. इस ट्रक के पीछे कोयला लदे अन्य वाहनों का काफिला भी नजर आया. इंडिया न्यूज़ वायरल बिहार झारखंड के पास जामताड़ा जिला से गुजरते अवैध कोयला लदे ट्रकों का विडियो फुटेज भी उपलब्ध है. स्टेशन के समीप सड़क जाम में फंसे इन वाहनों ने क्षेत्र में कोयला परिवहन की गतिविधियों को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज कर दी है. सवाल उठता है कि यदि रात साढ़े दस बजे मुख्य सड़क पर इस तरह ट्रकों की आवाजाही हो रही है, तो पूरी रात में कितने वाहन इस रास्ते से गुजरते होंगे ?
कार्रवाई के बाद भी नहीं थम रहा कोयला परिवहन!
अवैध कोयला कारोबार को लेकर बीते बुधवार को नारायणपुर थाना क्षेत्र के पांडेयडीह के पास हुई एक कार्रवाई भी चर्चा में है. जानकारी के अनुसार, शाम करीब आठ बजे एक प्रशासनिक अधिकारी ने कोयला लदे ट्रक को रोककर कार्रवाई की थी. चालक मदन गोप के मुताबिक, अधिकारी ने वाहन के कागजात और ड्राइविंग लाइसेंस अपने कब्जे में ले लिए तथा ट्रक को एक पेट्रोल पंप संचालक की सुपुर्दगी में छोड़ दिया. हालांकि, इस कार्रवाई की पूरी आधिकारिक प्रक्रिया और वाहन के विरुद्ध की गई आगे की कार्रवाई स्पष्ट होना बाकी है. ऐसे में यह मामला भी जांच का विषय बन गया है.
रात नौ बजे के बाद बढ़ जाती है ट्रकों की आवाजाही
स्थानीय लोगों का दावा है कि रात नौ बजे के बाद गोविंदपुर- साहेबगंज हाईवे पर कोयला लदे वाहनों की आवाजाही अचानक बढ़ जाती है. चर्चा है कि धनबाद की ओर से पश्चिम बंगाल भेजे जाने वाले कुछ वाहनों में बिहार के नालंदा समेत अन्य जिलों के पुराने अथवा संदिग्ध चालान का इस्तेमाल किया जा रहा है. हालांकि, चालान में गड़बड़ी और कोयले के वास्तविक स्रोत को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है. यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह केवल अवैध परिवहन का मामला नहीं, बल्कि खनिज के स्रोत और राजस्व चोरी से जुड़ा गंभीर विषय हो सकता है.
40 ट्रकों से कोयला खपाने की चर्चा, जांच की दरकार
सूत्रों के हवाले से क्षेत्र में चर्चा है कि धनबाद की ओर से करीब 40 ट्रकों के माध्यम से कोयले का परिवहन किया जा रहा है. इनमें लगभग 25 ट्रकों को गिरिडीह के रास्ते बिहार और करीब 15 ट्रकों को जामताड़ा- मिहिजाम मार्ग से पश्चिम बंगाल की ओर भेजे जाने की बात कही जा रही है. हालांकि, इन आंकड़ों की स्वतंत्र अथवा आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है. ऐसे में खनन विभाग के लिए यह जांच करना जरूरी है कि संबंधित वाहनों में लदे कोयले का स्रोत क्या है, उनके पास वैध परिवहन चालान हैं या नहीं और निर्धारित गंतव्य तक ही कोयला पहुंचाया जा रहा है या नहीं.
टास्क फोर्स की निगरानी पर सबसे बड़ा सवाल
जिले में अवैध खनन और खनिज परिवहन पर रोक लगाने के लिए जिला खनन टास्क फोर्स और प्रखंड स्तरीय टास्क फोर्स की व्यवस्था है. इसके बावजूद यदि मुख्य राजमार्ग पर रात के समय संदिग्ध कोयला लदे ट्रकों की आवाजाही लगातार हो रही है, तो निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है. आखिर इन वाहनों की जांच कौन कर रहा है ? रात के समय हाईवे पर नियमित चेकिंग क्यों नहीं हो रही है ? संदिग्ध चालान और ओवरलोड वाहनों की जांच के लिए कौन जिम्मेदार है ?
सबसे अहम सवाल यह भी है कि नारायणपुर से मिहिजाम होते हुए चित्तरंजन की ओर जाने वाले मार्ग पर पुलिस, खनन विभाग और परिवहन विभाग की संयुक्त निगरानी कितनी प्रभावी है ? यदि किसी वाहन के पास वैध दस्तावेज नहीं हैं, तो वह किसकी नजरों से बचकर लंबी दूरी तय कर रहा है ?
फिलहाल, अवैध कोयला परिवहन को लेकर उठ रहे आरोपों ने जिला प्रशासन और खनन विभाग की कार्यशैली को सवालों के घेरे में ला दिया है. अब जरूरत केवल छिटपुट कार्रवाई की नहीं, बल्कि रात के समय विशेष अभियान चलाकर संदिग्ध ट्रकों की जांच करने की है. कोयले के वास्तविक स्रोत, ई-चालान, परिवहन अनुमति, वजन और गंतव्य का मिलान कराया जाए, ताकि अवैध कारोबार की पूरी कड़ी सामने आ सके. सवाल सीधा है- जब हाईवे पर कोयले से लदे ट्रक खुलेआम नजर आ रहे हैं, तो उन्हें रोकने और जांचने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है ?
रिपोर्ट: मनीष बरनवाल

