जामताड़ा: खेल प्रतिभाओं को मंच देने के उद्देश्य से आयोजित खेलो झारखंड 2026-27 की प्रखंड स्तरीय प्रतियोगिता में शुक्रवार को अपेक्षित उत्साह नजर नहीं आया. प्रखंड क्षेत्र में करीब 25 हाई स्कूल संचालित होने के बावजूद प्रतियोगिता में महज नौ विद्यालयों ने ही हिस्सा लिया. कई खेलों में खिलाड़ियों की संख्या भी काफी कम रही. इससे प्रतियोगिता की तैयारी, प्रचार-प्रसार और विद्यालयों की भागीदारी को लेकर सवाल उठने लगे हैं.


जेबीसी प्लस टू मुख्यमंत्री उत्कृष्ट विद्यालय, जामताड़ा समेत निर्धारित खेल स्थलों पर एथलेटिक्स, कबड्डी, खो-खो और वॉलीबॉल प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया. विभागीय स्तर पर सभी विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों को प्रतियोगिता में खिलाड़ियों की भागीदारी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया था. इसके बावजूद बड़ी संख्या में विद्यालय प्रतियोगिता से बाहर रहे.
25 स्कूलों में सिर्फ नौ की भागीदारी. प्रखंड में संचालित करीब 25 हाई स्कूलों में से केवल नौ विद्यालयों का प्रतियोगिता में शामिल होना चर्चा का विषय बना रहा. खेलो झारखंड जैसे आयोजन का उद्देश्य अधिक से अधिक स्कूली बच्चों को खेल से जोड़ना और उनकी प्रतिभा को सामने लाना है. ऐसे में सीमित विद्यालयों की भागीदारी से योजना के उद्देश्य पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
प्रतियोगिता स्थल पर भी खिलाड़ियों की संख्या अपेक्षाकृत कम रही. इससे यह सवाल उठ रहा है कि प्रतियोगिता को लेकर विद्यालयों के बीच किस स्तर पर प्रचार-प्रसार किया गया था. यदि सभी विद्यालयों को समय पर सूचना दी गई थी, तो बड़ी संख्या में विद्यालयों के प्रतियोगिता में शामिल नहीं होने का कारण क्या रहा. वहीं, यदि सूचना और प्रचार-प्रसार पर्याप्त नहीं था, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है.

कागज पर तैयारी, मैदान में कम खिलाड़ी. विभाग की ओर से एसओपी के अनुरूप आयोजन और खिलाड़ियों की भागीदारी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए थे. हालांकि, प्रतियोगिता स्थल पर कम संख्या में खिलाड़ियों की मौजूदगी ने आयोजन की तैयारी और मॉनिटरिंग पर सवाल खड़े कर दिए. खेल प्रतियोगिता केवल औपचारिक आयोजन बनकर न रह जाए, इसके लिए प्रत्येक विद्यालय से प्रतिभावान खिलाड़ियों का चयन कर उन्हें पर्याप्त अवसर देना जरूरी है.
यदि विद्यालयों की भागीदारी ही सीमित रहेगी, तो प्रखंड स्तर पर वास्तविक खेल प्रतिभाओं की पहचान कैसे होगी. यह भी देखना होगा कि विद्यालय स्तर पर खिलाड़ियों के चयन और प्रतियोगिता में भेजने की प्रक्रिया को लेकर कितनी गंभीरता बरती गई.
हजारों रुपये के खर्च की उपयोगिता पर सवाल. प्रतियोगिता के आयोजन के लिए विभागीय स्तर पर राशि खर्च की जाती है. ऐसे में कम विद्यालयों और कम खिलाड़ियों की भागीदारी के बीच खर्च होने वाली राशि की उपयोगिता पर भी सवाल उठ रहे हैं. आयोजन के लिए किस मद में कितनी राशि आवंटित हुई, कितनी राशि खर्च की गई और खिलाड़ियों की संख्या के अनुपात में इसका कितना लाभ पहुंचा, इसकी जानकारी सार्वजनिक किए जाने की मांग उठ रही है.
हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर प्रतियोगिता की राशि में किसी तरह की गड़बड़ी या बंदरबांट का कोई प्रमाण सामने नहीं आया है. ऐसे में फिलहाल सवाल आयोजन की पारदर्शिता और खर्च की उपयोगिता को लेकर है.
प्रचार-प्रसार में लापरवाही या औपचारिकता. खेलो झारखंड का उद्देश्य बच्चों में खेल के प्रति रुचि बढ़ाना और ग्रामीण तथा सरकारी विद्यालयों की प्रतिभाओं को आगे लाना है. ऐसे में प्रखंड के अधिकांश विद्यालयों का प्रतियोगिता में शामिल नहीं होना विभाग के लिए समीक्षा का विषय होना चाहिए.
सवाल यह भी है कि क्या सभी विद्यालयों में खिलाड़ियों का पर्याप्त चयन किया गया था. क्या प्रतियोगिता की सूचना समय पर विद्यालयों और अभिभावकों तक पहुंची थी. क्या जिम्मेदार पदाधिकारियों ने विद्यालयों से खिलाड़ियों की भागीदारी को लेकर नियमित समीक्षा की थी. इन सवालों का जवाब सामने आना जरूरी है.
जिलास्तरीय प्रतियोगिता से पहले हो समीक्षा. प्रखंड स्तरीय प्रतियोगिता के बाद 21 और 22 सितंबर को जिलास्तरीय प्रतियोगिता प्रस्तावित है. ऐसे में जिलास्तरीय आयोजन से पहले प्रखंड स्तर पर सामने आई कमियों की समीक्षा करना जरूरी है.
सिर्फ प्रतियोगिता का आयोजन करा देना ही खेल प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करना नहीं है. पर्याप्त खिलाड़ियों की भागीदारी, अधिक से अधिक विद्यालयों की सहभागिता, पारदर्शी तरीके से खर्च और निष्पक्ष चयन ही ऐसे आयोजनों की सफलता का आधार हैं. यदि आयोजन में किसी स्तर पर लापरवाही हुई है, तो उसकी समीक्षा कर जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए. साथ ही आयोजन मद में खर्च की गई राशि का पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि खेलो झारखंड जैसी योजनाओं का उद्देश्य धरातल पर प्रभावी रूप से पूरा हो सके.
रिपोर्ट: मनीष बर्णवाल

