सरायकेला: झारखंड की राजनीति में कभी सत्ता के समीकरण बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखने वाली आजसू पार्टी आज एक कठिन राजनीतिक दौर से गुजरती दिखाई दे रही है. सबसे बड़ा सवाल केवल चुनावी हार- जीत का नहीं, बल्कि संगठन की जमीनी मजबूती का है. सरायकेला- खरसावां जैसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जिले में लंबे समय से नियमित जिलाध्यक्ष नहीं होने की चर्चा ने पार्टी की सांगठनिक स्थिति को लेकर सवाल और गहरे कर दिए हैं.


कभी झारखंड की सत्ता में महत्वपूर्ण भागीदार रही आजसू और उसके केंद्रीय अध्यक्ष सुदेश कुमार महतो के सामने अब चुनौती अपनी पुरानी राजनीतिक जमीन को दोबारा मजबूत करने की है. पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन के साथ जरूर है, लेकिन झारखंड विधानसभा में उसका प्रतिनिधित्व फिलहाल मांडू विधायक निर्मल महतो तक सीमित है. 2024 में निर्मल महतो ने बेहद करीबी मुकाबले में 90,871 वोट हासिल कर कांग्रेस के जयप्रकाश भाई पटेल को 231 मतों से हराया था.
सिल्ली के नतीजों ने दिया बड़ा राजनीतिक संदेश
आजसू की मौजूदा स्थिति समझने के लिए उसके सबसे मजबूत गढ़ सिल्ली के 2024 के चुनाव परिणाम महत्वपूर्ण हैं. यहां झामुमो के अमित कुमार को 73,169 वोट मिले, जबकि सुदेश महतो 49,302 वोट लेकर दूसरे स्थान पर रहे. लेकिन परिणाम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू JLKM के देवेंद्र नाथ महतो को मिले 41,725 वोट थे. यानी जिस सिल्ली से सुदेश महतो 2019 में 83,700 वोट हासिल कर विधायक बने थे, वहीं 2024 में उनका वोट घटकर 49,302 रह गया. 2024 की हार और वोटों में आई बड़ी गिरावट निश्चित रूप से आजसू के लिए गंभीर राजनीतिक संकेत है.
जयराम महतो की राजनीति ने बदला समीकरण ?
आजसू के सामने दूसरी बड़ी चुनौती जयराम महतो और उनके राजनीतिक उभार की है. खासकर कुड़मी-महतो बहुल क्षेत्रों में JLKM ने एक नया राजनीतिक विकल्प खड़ा किया है. हालांकि यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि आजसू का पूरा परंपरागत वोट जयराम महतो के साथ चला गया है, लेकिन सिल्ली के आंकड़े इस चुनौती की गंभीरता जरूर बताते हैं. 2024 में सिल्ली में JLKM प्रत्याशी देवेंद्र नाथ महतो को करीब 24 प्रतिशत वोट मिले. दूसरी ओर मांडू में भी JLKM उम्मीदवार बिहारी कुमार ने 71,276 वोट हासिल किए और लगभग 25 प्रतिशत वोट शेयर प्राप्त किया. ये आंकड़े संकेत देते हैं कि झारखंड की उस राजनीतिक जमीन पर अब मुकाबला बदल रहा है, जहां कभी आजसू की मजबूत पकड़ मानी जाती थी.
सरायकेला- खरसावां में सवाल और गंभीर
ऐसे समय में सरायकेला- खरसावां जिले की सांगठनिक स्थिति पार्टी के लिए और महत्वपूर्ण हो जाती है. यदि जिले में लंबे समय से नियमित जिलाध्यक्ष की नियुक्ति नहीं हुई है, तो सवाल स्वाभाविक है कि पंचायत, प्रखंड और जिला स्तर के संगठन को सक्रिय रखने की जिम्मेदारी आखिर किसके पास है ? सरायकेला- खरसावां कोई सामान्य राजनीतिक जिला नहीं है. ईचागढ़- सिल्ली से जुड़े क्षेत्रीय सामाजिक समीकरण, औद्योगिक बेल्ट, आदिवासी-कुड़मी राजनीति और कोल्हान की व्यापक राजनीतिक दिशा इसे महत्वपूर्ण बनाती है. ऐसे जिले में पिछले विधानसभा चुनाव के पूर्व से जिलाध्यक्ष का न होना या यूं कहें नेतृत्व का खालीपन लंबे समय तक रहना किसी भी क्षेत्रीय दल के लिए चिंता का विषय हो सकता है.
क्या आजसू के सामने नेतृत्व के साथ संगठन का भी संकट ?
अब सवाल सीधे सुदेश महतो के नेतृत्व तक पहुंचता है. लंबे समय से आजसू की पहचान काफी हद तक उनके इर्द- गिर्द केंद्रित रही है. यही कभी पार्टी की ताकत थी, लेकिन बदलते राजनीतिक दौर में यही मॉडल उसकी सीमा भी बन सकता है. पार्टी को यह समीक्षा करनी होगी कि दूसरी पंक्ति का प्रभावशाली नेतृत्व कितना तैयार हुआ. जिलों में संगठन कितना सक्रिय है. युवा मतदाताओं को जोड़ने की रणनीति क्या है. और जयराम महतो जैसे नए क्षेत्रीय नेतृत्व के सामने आजसू अपने पुराने सामाजिक आधार को किस तरह बचाएगी. सुदेश महतो अभी भी सक्रिय हैं. हाल में उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से कुड़मी समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने और प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की CBI जांच जैसे मुद्दे उठाए हैं. इससे साफ है कि पार्टी अपने पुराने सामाजिक और छात्र- युवा मुद्दों पर राजनीतिक स्पेस दोबारा हासिल करने की कोशिश कर रही है.
2029 से पहले असली परीक्षा संगठन की
आजसू के पास वापसी के लिए अभी समय है. 2029 का विधानसभा चुनाव दूर है, लेकिन राजनीतिक जमीन चुनाव से कुछ महीने पहले तैयार नहीं होती. सरायकेला- खरसावां जैसे जिलों में मजबूत नेतृत्व, सक्रिय जिला कमेटी, बूथ स्तर का संगठन और नई पीढ़ी के नेताओं को सामने लाना होगा. फिलहाल सवाल यही है- क्या आजसू बदलते झारखंड की राजनीति के मुताबिक खुद को बदल पाएगी, या कभी सत्ता की धुरी रही पार्टी धीरे- धीरे सीमित राजनीतिक प्रभाव वाली पार्टी बनकर रह जाएगी ?
सरायकेला- खरसावां में जिलाध्यक्ष को लेकर चल रही चर्चा इसी बड़े सवाल का स्थानीय चेहरा है. यदि संगठनात्मक खालीपन की स्थिति वास्तव में लंबे समय से बनी हुई है, तो शीर्ष नेतृत्व के लिए यह केवल एक पद भरने का मामला नहीं, बल्कि 2029 से पहले अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की चेतावनी भी है.
संतोष कुमार

