सरायकेला: जिला समाहरणालय वह स्थान है, जहां से जिले में कानून-व्यवस्था से लेकर अवैध खनन, बालू के परिवहन और भंडारण पर कार्रवाई को लेकर प्रशासनिक निर्देश जारी होते हैं. ऐसे में समाहरणालय परिसर में चल रहे करीब ढाई करोड़ रुपये के मरम्मत कार्य के दौरान बड़ी मात्रा में डंप की गई बालू को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं.


सवाल बालू के समाहरणालय परिसर में रखे जाने पर नहीं, बल्कि उसके स्रोत और वैध दस्तावेजों को लेकर है. लोगों का कहना है कि यदि सरकारी निर्माण कार्य के लिए बालू वैध स्रोत से मंगाई गई है, तो उसकी खरीद, परिवहन और भंडारण से संबंधित दस्तावेज भी उपलब्ध होने चाहिए.
झारखंड में वर्ष 2026 के मानसून सीजन के दौरान 10 जून से 15 अक्टूबर तक नदी से बालू उठाव पर रोक की जानकारी जारी की गई है. वहीं, राज्य में वैध स्रोतों से उपलब्ध बालू के परिवहन और निगरानी के लिए डिजिटल चालान तथा JIMMS जैसी व्यवस्थाओं का भी प्रावधान बताया गया है.
ऐसे में समाहरणालय परिसर में डंप बालू को लेकर यह सवाल स्वाभाविक है कि यह बालू किस तारीख को, किस स्रोत से और किस माध्यम से निर्माण स्थल तक पहुंची.
दस्तावेजों से स्पष्ट हो स्रोत
निर्माण कार्य में इस्तेमाल हो रही बालू के संबंध में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि क्या संबंधित संवेदक या एजेंसी के पास वैध खनन चालान, रॉयल्टी भुगतान का प्रमाण, परिवहन ई-चालान और अन्य आवश्यक दस्तावेज मौजूद हैं.
यदि बालू का स्टॉक पहले से किसी वैध स्टॉकयार्ड में उपलब्ध था और वहीं से इसकी आपूर्ति की गई है, तो उस स्टॉकयार्ड और आपूर्ति से संबंधित रिकॉर्ड से स्थिति स्पष्ट हो सकती है.
सरकार की ओर से खनिजों के अवैध खनन, परिवहन और भंडारण पर रोक के लिए संशोधित नियमावली और डिजिटल निगरानी व्यवस्था लागू किए जाने की जानकारी भी जिला प्रशासन की ओर से दी गई है.
आम लोगों पर कार्रवाई तो सरकारी निर्माण में भी जांच जरूरी
जिले में आम लोगों और बालू परिवहन करने वाले वाहनों के दस्तावेजों की जांच की जाती है. नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर कार्रवाई भी होती है.
ऐसे में सवाल यह है कि क्या सरकारी निर्माण स्थल पर पहुंचने वाली बालू के दस्तावेजों का भी उसी तरह सत्यापन किया जाता है?
यदि कोई व्यक्ति अपने निजी मकान के निर्माण के लिए बालू खरीदता है और उससे स्रोत या परिवहन संबंधी दस्तावेज मांगे जाते हैं, तो सरकारी निर्माण कार्य में इस्तेमाल होने वाली बालू की वैधता भी जांच के दायरे में होनी चाहिए.
कानून और नियमों का उद्देश्य सभी के लिए समान व्यवस्था सुनिश्चित करना है. इसलिए सरकारी भवन की मरम्मत के लिए लाई गई निर्माण सामग्री की जांच को भी पारदर्शी रखा जाना जरूरी है.
खनन विभाग ने की जांच या नहीं?
समाहरणालय परिसर में बड़ी मात्रा में बालू डंप होने के बाद अब मुख्य सवाल यह है कि क्या संबंधित अधिकारियों ने इसकी जांच की है.
प्रशासन और संबंधित विभाग से ये सवाल उठ रहे हैं
– समाहरणालय परिसर में डंप की गई बालू किस स्रोत से आई?
– इसकी आपूर्ति किस संवेदक या एजेंसी ने की?
– क्या बालू के लिए वैध खनन चालान और रॉयल्टी से संबंधित दस्तावेज मौजूद हैं?
– क्या परिवहन के दौरान ई-चालान या अन्य आवश्यक दस्तावेज जारी हुए?
– बालू किस स्टॉकयार्ड या वैध स्रोत से निर्माण स्थल तक पहुंची?
– क्या जिला खनन विभाग ने समाहरणालय परिसर में रखी बालू का सत्यापन किया?
– यदि जांच हुई है तो जांच में बालू को वैध पाए जाने का आधार क्या है?
– यदि जांच नहीं हुई है तो सरकारी निर्माण स्थल पर डंप बालू की जांच क्यों नहीं की गई?
– भवन निर्माण विभाग ने संवेदक से बालू की खरीद और आपूर्ति से संबंधित कौन-कौन से दस्तावेज लिए हैं?
जवाब दस्तावेजों से मिलना चाहिए
करीब ढाई करोड़ रुपये की लागत से होने वाला सरकारी मरम्मत कार्य कोई सामान्य निर्माण कार्य नहीं है. ऐसे कार्य में इस्तेमाल होने वाली निर्माण सामग्री की खरीद, आपूर्ति और गुणवत्ता से संबंधित रिकॉर्ड का संधारण होना स्वाभाविक है.
इसलिए इस मामले में किसी पर आरोप लगाने के बजाय दस्तावेजों के आधार पर स्थिति स्पष्ट करना ही सबसे उचित रास्ता है.
यदि बालू वैध स्रोत से लाई गई है और सभी आवश्यक दस्तावेज मौजूद हैं, तो संबंधित विभाग के स्तर से इसकी जानकारी सार्वजनिक किए जाने पर उठ रहे सवालों का स्वतः समाधान हो सकता है.
वहीं, यदि दस्तावेजों में कोई कमी पाई जाती है तो संबंधित विभाग को नियमानुसार कार्रवाई करनी चाहिए.
समाहरणालय वह परिसर है जहां से जिले में नियमों के अनुपालन और अवैध खनन के खिलाफ कार्रवाई की निगरानी होती है. ऐसे में उसी परिसर में डंप निर्माण सामग्री के स्रोत और दस्तावेजों को लेकर उठे सवालों पर पारदर्शी जांच और स्पष्ट जवाब की अपेक्षा स्वाभाविक है.
अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और संबंधित विभाग समाहरणालय परिसर में डंप बालू के स्रोत, आपूर्ति और दस्तावेजों की स्थिति स्पष्ट करते हैं या नहीं.

