रांची/ जमशेदपुर: दलमा वन्यजीव अभयारण्य के अति-संवेदनशील क्षेत्र में करीब 11 करोड़ रुपये की लागत से टूरिस्ट कॉटेज और लॉज निर्माण का मामला अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) तक पहुंच गया है. मामले में CEC ने झारखंड के मुख्य सचिव और प्रधान मुख्य वन संरक्षक सह वन्यजीव प्रतिपालक (PCCF/Wildlife Warden) को नोटिस जारी कर 9 सितंबर 2026 की सुनवाई में उपस्थित होने को कहा है.


जमशेदपुर के पर्यावरण कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता प्रतीक शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के टी.एन. गोदावर्मन वाद से संबंधित मामले में CEC के समक्ष आवेदन दिया है. इसमें आरोप लगाया गया है कि दलमा वन्यजीव अभयारण्य के मकलाकोचा और पिंड्राबेरा क्षेत्र में आवश्यक वैधानिक स्वीकृतियों के बिना वन भूमि पर टूरिस्ट कॉटेज एवं लॉज का निर्माण कराया गया. मकलाकोचा में बने कॉटेज का उद्घाटन 2 अगस्त 2026 को किया गया था. निर्माण पर्यटन विभाग के फंड से वन विभाग द्वारा कराए जाने की बात कही गई है.
विधानसभा में विभाग ने माना था- NBWL की अनुमति नहीं ली
मामले का महत्वपूर्ण पहलू राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL) की अनुमति को लेकर है. याचिकाकर्ता का दावा है कि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम के प्रावधानों के तहत अभयारण्य के भीतर व्यावसायिक पर्यटक लॉज के लिए NBWL की पूर्व अनुमति आवश्यक है. झारखंड विधानसभा के मानसून सत्र में जमशेदपुर पूर्वी के विधायक द्वारा पूछे गए सवाल के जवाब में वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने भी कथित तौर पर स्वीकार किया था कि संबंधित निर्माण के लिए NBWL से अनुमति नहीं ली गई है. यही तथ्य अब CEC के समक्ष उठाए गए प्रमुख बिंदुओं में शामिल है.
मैनेजमेंट प्लान को लेकर भी उठाए सवाल
याचिका में वन विभाग के उस पक्ष पर भी सवाल उठाया गया है जिसमें निर्माण को वर्ष 2020-21 से 2029-30 की स्वीकृत प्रबंधन योजना के तहत बताया गया था. याचिकाकर्ता का दावा है कि प्रबंधन योजना में पुराने पर्यटक आवासों के सुधार एवं रख-रखाव का प्रावधान है, लेकिन नए कॉटेज बनाने की स्पष्ट अनुमति नहीं है. इसके साथ ही दलमा के इको-सेंसिटिव जोन से जुड़े प्रावधानों के उल्लंघन का आरोप भी लगाया गया है. याचिकाकर्ता के मुताबिक अभयारण्य के आसपास निर्माण और पर्यटन गतिविधियों के लिए निर्धारित पर्यावरणीय शर्तों का पालन नहीं किया गया.
हाथियों के प्राकृतिक आवास और कॉरिडोर पर असर का सवाल
आवेदन में दलमा की पारिस्थितिकी और हाथियों के प्राकृतिक आवास का मुद्दा भी उठाया गया है. कहा गया है कि वन क्षेत्र में बड़े निर्माण, सड़क एवं अन्य आधारभूत संरचनाओं का विस्तार और बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप वन्यजीवों के आवागमन को प्रभावित कर सकता है. इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ने की आशंका भी जताई गई है.
निर्माण हटाने और जिम्मेदारी तय करने की मांग
CEC के समक्ष याचिकाकर्ता ने बिना वैधानिक स्वीकृति किए गए निर्माण को रोकने, कथित अवैध पर्यटक कॉटेज एवं अन्य ढांचों को हटाने तथा निर्माण की अनुमति देने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने की मांग की है. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों के उल्लंघन की स्थिति में संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कानूनी एवं अवमानना की कार्रवाई की मांग भी आवेदन में की गई है. CEC का नोटिस फिलहाल मामले में अंतिम निर्णय नहीं है. अब 9 सितंबर की सुनवाई महत्वपूर्ण होगी, जहां राज्य सरकार और वन विभाग का पक्ष सामने आने के बाद यह स्पष्ट हो सकेगा कि निर्माण के लिए किन स्वीकृतियों की आवश्यकता थी, कौन-कौन सी अनुमति ली गई और CEC इस मामले में आगे क्या निर्देश देती है. सूत्रों का दावा है कि डीएफओ सबा आलम की भूमिका इस पूरे मामले में संदिग्ध है हालांकि हमारे पास इसके आधिकारिक प्रमाण नहीं है यदि सटीक जांच हुई तो बड़ा खुलासा हो सकता है. उनके पास तीन- तीन जिलों का प्रभार है जो दर्शाता है कि वह काफी प्रभावशाली अधिकारी हैं.
विशेष संवाददाता

