जमशेदपुर: युवा कारोबारी निखार सबलोक की हत्या की गुत्थी पुलिस ने भले सुलझा लेने का दावा किया है, लेकिन इस खुलासे ने जमशेदपुर के अपराध जगत से जुड़े कई पुराने अध्याय एक बार फिर खोल दिए हैं. सवाल केवल यह नहीं है कि निखार को किसने मारा. बड़ा सवाल यह भी है कि इस हत्या के पीछे सक्रिय नेटवर्क कितना बड़ा था, उसके तार कहां- कहां तक फैले हैं और क्या यह हत्याकांड आने वाले दिनों में शहर के आपराधिक समीकरण को बदलने वाला साबित होगा ?


पुलिस ने बुधवार को हत्याकांड का खुलासा करते हुए अशोक कुमार सिंह उर्फ राघव, सुनील रजक, रितेश सिंह, सुशील केराई, राजकुमार सिंह उर्फ प्रिंस सिंह और अंकित सिंह की गिरफ्तारी की जानकारी दी. पुलिस के अनुसार निखार की हत्या के लिए 15 लाख रुपये की सुपारी दी गई थी और इसके पीछे जमीन विवाद तथा आपराधिक वर्चस्व से जुड़े पहलू सामने आए हैं. उत्तर प्रदेश से शूटर बुलाए जाने की बात भी जांच में सामने आई है. पुलिस ने दो पिस्टल, कारतूस, मोबाइल फोन और वारदात में इस्तेमाल लाल रंग की हुंडई आई-10 कार बरामद की है.
पुलिस के खुलासे के बाद भी क्यों उठ रहे सवाल ?
निखार की हत्या के बाद से ही जमशेदपुर के अपराध और राजनीतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाएं चल रही थीं. जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय और पूर्व मंत्री बन्ना गुप्ता के बीच भी इस मामले को लेकर आरोप- प्रत्यारोप हुए. दूसरी तरफ पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसी हत्या की परतें खोलना था, जिसे बेहद योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया. निखार को जिस तरीके से निशाना बनाया गया, उससे शुरुआत से ही यह आशंका मजबूत थी कि यह सामान्य आपराधिक वारदात नहीं है. पुलिस जांच अब इसे जमीन विवाद, सुपारी और आपराधिक वर्चस्व से जोड़ रही है. उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक करीब तीन एकड़ जमीन से जुड़े विवाद की भी जांच हुई है. लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण फर्क समझना होगा. शहर के अपराध जगत में चल रही चर्चाओं और पुलिस द्वारा अब तक आधिकारिक रूप से स्थापित तथ्यों को एक नहीं माना जा सकता. अखिलेश सिंह की इस हत्या में प्रत्यक्ष भूमिका को लेकर अभी सार्वजनिक पुलिस खुलासे में कोई निर्णायक तथ्य सामने नहीं आया है.
ब्लाइंड केस में कार और तकनीकी साक्ष्य बने पुलिस के हथियार
इस हत्याकांड में पुलिस के पास शुरुआत में बेहद सीमित सुराग थे. अपराधियों ने रेकी से लेकर हत्या और भागने तक की योजना तैयार की थी. इसके बावजूद सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल नेटवर्क, संदिग्धों की गतिविधियों और वारदात में इस्तेमाल वाहन की कड़ियों को जोड़ते हुए संयुक्त एसआईटी आरोपियों तक पहुंची. पुलिस के अनुसार लाल रंग की हुंडई आई-10 का इस्तेमाल वारदात में किया गया था. हत्या के बाद आरोपी रांची की ओर निकले और कार को वहां छोड़ दिया गया था. इसी वाहन सहित तकनीकी और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों ने जांच को महत्वपूर्ण दिशा दी. यह पुलिस जांच का महत्वपूर्ण पहलू है. एक लगभग ब्लाइंड केस में जमशेदपुर और सरायकेला- खरसावां पुलिस की संयुक्त टीम ने नौ दिनों के भीतर छह आरोपियों और शूटर तक पहुंचकर हत्या की कथित साजिश की कड़ियां सामने रखीं. हालांकि जांच अभी समाप्त नहीं हुई है और फरार अथवा अन्य संभावित सहयोगियों की भूमिका सामने आने के बाद कहानी का दायरा और बढ़ सकता है.
राघव की गिरफ्तारी ने क्यों बढ़ाई इस केस की गंभीरता ?
अशोक सिंह उर्फ राघव का नाम जमशेदपुर के लिए नया नहीं है. उसका नाम वर्षों से रियल एस्टेट, कथित आपराधिक नेटवर्क और गैंगस्टर अखिलेश सिंह से कथित संबंधों को लेकर चर्चा में आता रहा है. वर्ष 2015 की रिपोर्ट के मुताबिक प्रवर्तन निदेशालय ने राघव से जुड़े करीब 75 करोड़ रुपये के कथित रियल एस्टेट निवेश की जांच की थी. उस समय आरोप लगाया गया था कि इस निवेश का स्पष्ट लेखा- जोखा नहीं था. रिपोर्ट में अखिलेश सिंह की रकम निवेश किए जाने के आरोप का भी उल्लेख था. यह पुराने आरोपों और तत्कालीन जांच का विवरण है, न कि वर्तमान मामले में अपराध सिद्ध होने का प्रमाण. इसके बाद जनवरी 2017 में रोजवैली चिटफंड मामले में CBI ने राघव को पूछताछ के लिए कोलकाता बुलाया था और उससे करीब चार घंटे पूछताछ हुई थी. इसी महीने 21 जनवरी 2017 को सोनारी के खूंटाडीह में राघव स्वयं गोलीबारी का शिकार हुआ था. बाइक सवार हमलावरों ने उस पर फायरिंग की और तीन गोलियां लगने के बावजूद वह स्कूटी चलाकर करीब 200 मीटर दूर अपने घर तक पहुंचा था. यानी निखार हत्याकांड में राघव की गिरफ्तारी को केवल एक हत्या के आरोपी की गिरफ्तारी के रूप में देखना शायद इस केस की पूरी तस्वीर नहीं होगी. पुलिस जांच अब उस व्यक्ति तक पहुंची है जिसका नाम शहर के अपराध और आर्थिक नेटवर्क की चर्चाओं में करीब एक दशक से आता रहा है.
क्या अखिलेश और राघव के रास्ते अब अलग हो सकते हैं ?
यहीं से इस कहानी का सबसे संवेदनशील अध्याय शुरू होता है. अपराध जगत में चर्चा है कि लंबे समय तक एक-दूसरे से जुड़े माने जाने वाले लोगों के हित अब टकरा सकते हैं. यदि पुलिस का यह निष्कर्ष आगे भी कायम रहता है कि राघव ने अपने स्तर पर शूटरों और संसाधनों का इस्तेमाल कर निखार की हत्या की साजिश रची, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठेगा कि क्या उसने किसी पुराने आपराधिक नेटवर्क की सहमति से यह कदम उठाया था या स्वतंत्र रूप से अपनी ताकत स्थापित करने की कोशिश की ? इस प्रश्न का फिलहाल कोई आधिकारिक उत्तर नहीं है. इसीलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि निखार की हत्या अखिलेश सिंह के निर्देश पर हुई अथवा राघव ने उससे अलग होकर फैसला लिया. मगर यदि पुराने नेटवर्क के भीतर हितों का टकराव पैदा हुआ है तो निखार की हत्या के बाद भविष्य में गैंगवार की आशंका को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता. यह फिलहाल एक संभावित सुरक्षा परिदृश्य है, पुलिस द्वारा घोषित निष्कर्ष नहीं.
विक्रम शर्मा की हत्या के बाद किसके हाथ में नेटवर्क ?
विक्रम शर्मा की हत्या के बाद से ही उसके पुराने आर्थिक और आपराधिक संपर्कों के भविष्य को लेकर सवाल उठते रहे हैं. इसी संदर्भ में अपराध जगत में राघव की भूमिका को लेकर भी तरह-तरह की चर्चाएं हैं. सूत्रों के स्तर पर यह दावा भी किया जा रहा है कि पुराने नेटवर्क से जुड़ी बड़ी संपत्तियों और आर्थिक हितों पर नियंत्रण को लेकर अंदरूनी खींचतान थी. करीब 1200 करोड़ रुपये की कथित संपत्ति अथवा साम्राज्य का आंकड़ा भी चर्चा में है, लेकिन इस रकम की स्वतंत्र या आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है. इसलिए इसे स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता. इसी तरह यह अटकल भी लगाई जा रही है कि राघव स्वयं एक स्वतंत्र आपराधिक शक्ति केंद्र बनने की दिशा में बढ़ रहा था. निखार हत्याकांड क्या उसी महत्वाकांक्षा का परिणाम था, इसका उत्तर पुलिस की आगे की जांच ही दे सकती है.
अपराध और मीडिया का गठजोड़ भी जांच के दायरे में आएगा ?
निखार हत्याकांड के समानांतर जमशेदपुर के मीडिया जगत को लेकर भी गंभीर चर्चाएं शुरू हुई हैं. गैंगस्टर अखिलेश का अपराधिक गुरु विक्रम शर्मा जेल से रिहा होने के बाद बेहद ही शातिराना अंदाज में काले साम्राज्य को गोरा करने में जुटा था. इसके लिए उसने राजनेताओं के नेटवर्क को साधना शुरू किया. धीरे- धीरे पुलिस और नौकरशाही में घुसपैठ बनाने के लिए मिडिया का सहारा लिया. सोशल मिडिया के क्षेत्र में कदम रखने के बाद उसने एक अंग्रेजी अख़बार का अधिग्रहण किया और नामचीन मीडिया कर्मियों को मोटी रकम देकर अपने लिए सूचनाएं लेने लगा. क्राइसिस के दौर से गुजर रहे मीडिया घराना के दौर में मोटी रकम के लोभ में मिडियाकर्मी कलम से गद्दारी करते रहे. विक्रम की हत्या के बाद राघव ने उसका नेटवर्क संभाला मगर उसने मिडिया को गलत तरीके से इस्तेमाल किया. सूत्रों के अनुसार जांच के क्रम में पुलिस को महिला पत्रकारों और कुछ नामचीन पत्रकारों के साथ राघव के सम्बंध को लेकर कई अहम साक्ष्य हाथ लगे हैं पुलिस उस दिशा में भी जांच कर सकती है. यदि ऐसा हुआ तो जमशेदपुर के साथ समूचे मिडिया जगत के लिए यह शर्मसार करने वाली घटना होगी. पिछले कुछ वर्षों में अपराध और रियल एस्टेट से जुड़े लोगों द्वारा मीडिया प्लेटफॉर्म, वेबसाइट और सोशल मीडिया नेटवर्क में निवेश अथवा प्रभाव स्थापित करने को लेकर स्थानीय स्तर पर आरोप लगते रहे हैं. सवाल यह है कि क्या मीडिया का इस्तेमाल केवल छवि निर्माण के लिए हुआ या सूचना हासिल करने, विरोधियों पर दबाव बनाने और पुलिस- प्रशासन की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए भी किया गया ? यदि पुलिस के पास वास्तव में वित्तीय लेन-देन, कॉल रिकॉर्ड अथवा अन्य डिजिटल साक्ष्य हैं तो जांच का यह हिस्सा जमशेदपुर की पत्रकारिता के लिए बेहद गंभीर हो सकता है. तब मामला केवल एक कारोबारी की हत्या का नहीं रहेगा, बल्कि अपराध, पैसा, मीडिया और प्रभाव के संभावित गठजोड़ की जांच में बदल सकता है.
निखार की हत्या का खुलासा अंत नहीं, शायद शुरुआत है
निखार सबलोक अब इस दुनिया में नहीं है. लेकिन उसकी हत्या की जांच ने जिन दरवाजों पर दस्तक दी है, वे जमशेदपुर के अपराध जगत के कई पुराने राज खोल सकते हैं. पुलिस ने फिलहाल हत्या की वजह, सुपारी, साजिश और शूटरों की कड़ी सामने रखकर महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है. अब असली परीक्षा इस नेटवर्क की अंतिम सीमा तक पहुंचने की है.
क्या राघव ने यह फैसला अकेले लिया था ?
क्या इसके पीछे कोई बड़ा आर्थिक हित था ?
पुराने गिरोहों के बीच संबंधों की वर्तमान स्थिति क्या है ?
क्या निखार की हत्या के बाद गैंगवार का खतरा बढ़ेगा ?
और यदि किसी मीडिया नेटवर्क अथवा सफेदपोश व्यक्ति की भूमिका के प्रमाण सामने आते हैं तो पुलिस वहां तक पहुंचेगी या नहीं ?
इन सवालों के जवाब अभी बाकी हैं.
एक बात स्पष्ट है. निखार सबलोक हत्याकांड अब केवल एक युवा कारोबारी की हत्या की कहानी नहीं रह गया है. यह जमशेदपुर में अपराध के बदलते स्वरूप, जमीन के कारोबार, पेशेवर शूटरों, पुराने गैंग नेटवर्क और कथित सफेदपोश संपर्कों की उस दुनिया की ओर इशारा कर रहा है, जिसकी कई परतें अभी खुलनी बाकी हैं.

