सरायकेला: झामुमो के जिला संगठन में इन दिनों सदस्यता और पद की राजनीति को लेकर सवाल उठने लगे हैं. सवाल इसलिए भी दिलचस्प है, क्योंकि पार्टी में शामिल होने के लिए मंच एक है, स्वागत एक है, नेता एक हैं. लेकिन मान्यता और पद की प्रक्रिया हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग नजर आ रही है.


पिछले दिनों सरायकेला टाउन हॉल में आयोजित झामुमो के कार्यक्रम में प्रदेश महासचिव विनोद पांडे, सांसद जोबा माझी, ईचागढ़ विधायक सविता महतो और जिलाध्यक्ष डॉ. शुभेंदु महतो समेत पार्टी के कई बड़े नेताओं की मौजूदगी में दूसरे दलों के कई कार्यकर्ताओं ने झामुमो का दामन थामा था. इनमें कांग्रेस छोड़कर झामुमो में शामिल हुए प्रोफेसर कालीपद सोरेन उर्फ केपी सोरेन भी थे. उनके साथ बड़ी संख्या में समर्थकों ने भी पार्टी की सदस्यता ली थी. तब तस्वीर ऐसी थी मानो पार्टी का जनाधार अचानक काफी बढ़ गया हो. लेकिन कुछ ही दिनों बाद वही सदस्यता पार्टी के अंदर सवाल बनकर सामने आ गई.

टाउन हॉल की तस्वीर
मामला तब गरमाया जब केपी सोरेन ने अपने आवास पर सांसद जोबा माझी के स्वागत का कार्यक्रम रखा. कार्यक्रम में कई नए और पुराने कार्यकर्ता शामिल हुए. सांसद ने सभी का गर्मजोशी से स्वागत किया. इस दौरान पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन के करीबी रहे बीटी दास, आदित्यपुर नगर निगम के वार्ड 7 के पार्षद पारितोष बेज और वार्ड 6 की पूर्व पार्षद ममता बेज ने भी पार्टी में घर वापसी की.

केपी सोरेन के आवास की तस्वीर
अब यहीं से कहानी में संगठन का ‘सिस्टम’ सामने आया. जिलाध्यक्ष ने इस कार्यक्रम में हुई सदस्यता को अनुशासनहीनता मानते हुए सदस्यों की सदस्यता को अवैध करार दे दिया. यहां तक कि केपी सोरेन की पार्टी में सदस्यता को लेकर भी सवाल खड़ा कर दिया गया.
जिलाध्यक्ष का तर्क था कि जब केपी सोरेन की प्राथमिक सदस्यता पर अभी प्रदेश स्तर से मुहर ही नहीं लगी है, तो उनके आवास पर किसी को पार्टी की सदस्यता कैसे दिलाई जा सकती है. बात में संगठनात्मक नियमों की मजबूती नजर आती है. लेकिन सवाल यह है कि जब टाउन हॉल में पार्टी के बड़े नेताओं की मौजूदगी में सदस्यता दिलाई गई थी, तब यही ‘सिस्टम’ कहां था.
और कहानी यहीं खत्म नहीं होती
केपी सोरेन के साथ अभय झा समेत कई युवाओं ने झामुमो का दामन थामा था. करीब तीन महीने बाद भी केपी सोरेन की प्राथमिक सदस्यता प्रक्रियाधीन बताई जा रही है. लेकिन इसी दौरान अभय झा को युवा मोर्चा का उपाध्यक्ष बनाए जाने का प्रस्ताव प्रदेश को भेज दिया गया. आदित्यपुर नगर क्षेत्र में उनके नाम के होर्डिंग और बैनर भी नजर आने लगे.

पोस्टर जिसमें अभय झा के पद में उपाध्यक्ष लिखा गया है
अब सवाल सीधा है. जब केपी सोरेन की सदस्यता पर मुहर नहीं लगी, तो उनके साथ आए अभय झा को संगठन में जिम्मेदारी देने की प्रक्रिया इतनी तेजी से कैसे आगे बढ़ गई. रविवार को सरायकेला सर्किट हाउस में जब जिलाध्यक्ष से इस संबंध में सवाल किया गया, तो उनका कहना था कि अभय झा को उपाध्यक्ष बनाए जाने का प्रस्ताव प्रदेश को भेजा गया है. अभी उस पर मुहर नहीं लगी है. यदि उपाध्यक्ष के नाम से बैनर-पोस्टर लगाए गए हैं, तो शो-कॉज किया जाएगा. यानी पार्टी की राजनीति में फिलहाल एक नया नियम सामने आया है. सदस्यता की मुहर लगे या न लगे, पद का प्रस्ताव चल सकता है. पद की मुहर लगे या न लगे, बैनर लग सकता है. लेकिन बैनर लग गया तो शो-कॉज जरूर हो सकता है.
राजनीतिक गलियारों में इसे पार्टी का ‘सिस्टम’ कहा जा रहा है. हालांकि इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा सवाल यही है कि संगठन में नियम सबके लिए समान हैं या फिर नियमों की व्याख्या व्यक्ति और परिस्थिति के हिसाब से बदलती रहती है. केपी सोरेन शिक्षित और लंबे समय से सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय चेहरे के रूप में पार्टी में आए. उनके साथ युवाओं की टोली भी आई. अगर पार्टी ऐसे लोगों को जोड़कर अपना आधार मजबूत करना चाहती है, तो संगठनात्मक प्रक्रिया पारदर्शी और स्पष्ट होनी चाहिए. वरना सदस्यता और पद के बीच का यह अंतर कार्यकर्ताओं के बीच भ्रम ही पैदा करेगा.
सवाल यह भी है कि पार्टी में शामिल कराने के समय बड़े नेताओं की मौजूदगी पर्याप्त है, लेकिन सदस्यता को मान्यता देने के लिए जिला संगठन की मुहर जरूरी है. अगर ऐसा है, तो फिर टाउन हॉल का वह मंच आखिर किस हैसियत से सदस्यता का मंच बना था. झामुमो के सामने अब सवाल विपक्ष का नहीं, अपने ही ‘सिस्टम’ का है. क्योंकि राजनीति में विरोधी दल जितने सवाल नहीं उठाते, उतने सवाल कभी-कभी संगठन की अपनी प्रक्रिया खड़े कर देती है.
संतोष कुमार (प्रधान संपादक- 9431341001)


































































