रांची: झारखंड में लगभग तीन वर्षों की देरी के बाद नगर निकाय चुनाव संपन्न हो चुके हैं. चुनाव कराने को लेकर झारखंड हाई कोर्ट ने समय-समय पर सख्त रुख अपनाया था और लोकतांत्रिक व्यवस्था बहाल करने पर जोर दिया था. अब चुनाव होने के बाद राज्य के कई नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायतों के जनप्रतिनिधि यह सवाल उठा रहे हैं कि यदि चुनाव हो गए हैं तो विकास योजनाओं के लिए पर्याप्त फंड क्यों नहीं मिल रहा है.


नगर विकास विभाग के सीमित संसाधनों और कई योजनाओं के धीमे क्रियान्वयन को देखते हुए यह बहस तेज हो गई है कि क्या झारखंड हाई कोर्ट केंद्र सरकार को सीधे फंड जारी करने का आदेश दे सकता है. इस प्रश्न का उत्तर समझने के लिए संविधान, वित्त आयोग और स्थानीय निकायों की वित्तीय व्यवस्था को समझना जरूरी है.
स्थानीय निकायों को फंड कैसे मिलता है ?
भारत में शहरी निकायों को मुख्य रूप से चार स्रोतों से धन प्राप्त होता है.
1. राज्य सरकार से अनुदान.
2. केंद्र सरकार की योजनाओं के तहत सहायता.
3. वित्त आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर मिलने वाले अनुदान.
4. स्थानीय कर, होल्डिंग टैक्स, जलकर, लाइसेंस शुल्क और अन्य राजस्व.
संविधान के 74वें संशोधन के बाद नगर निकायों को स्थानीय स्वशासन की इकाई के रूप में मान्यता मिली. इसके तहत राज्यों को नगर निकायों को वित्तीय रूप से सक्षम बनाने की जिम्मेदारी दी गई.
संविधान क्या कहता है ?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243Y राज्य वित्त आयोग के गठन का प्रावधान करता है. यह आयोग नगर निकायों और पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा कर राज्य सरकार को सुझाव देता है कि उन्हें कितना राजस्व और अनुदान दिया जाना चाहिए. इसी प्रकार अनुच्छेद 280 के तहत गठित केंद्रीय वित्त आयोग राज्यों और स्थानीय निकायों के लिए अनुदान की सिफारिश करता है. 15वें और 16वें वित्त आयोग ने शहरी निकायों के लिए हजारों करोड़ रुपये की सहायता की अनुशंसा की है.
चुनाव नहीं होने से क्यों रुक जाता है फंड ?
वित्त आयोग की कई अनुदान योजनाओं में यह शर्त होती है कि संबंधित राज्य में निर्वाचित स्थानीय निकाय मौजूद हों. यदि लंबे समय तक चुनाव नहीं होते हैं तो केंद्र सरकार कई बार अनुदान रोक सकती है या जारी करने में विलंब कर सकती है. देश के कई राज्यों में ऐसा हुआ है कि स्थानीय निकाय चुनाव नहीं होने के कारण वित्त आयोग की राशि प्रभावित हुई. हाल के उदाहरणों में कुछ राज्यों को करोड़ों रुपये के केंद्रीय अनुदान से वंचित होना पड़ा क्योंकि वहां समय पर स्थानीय चुनाव नहीं कराए गए थे. झारखंड में भी लंबे समय तक निकाय चुनाव लंबित रहने के कारण कई योजनाओं और वित्तीय प्रवाह पर असर पड़ने की चर्चा प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर होती रही है.
क्या हाई कोर्ट केंद्र सरकार को सीधे फंड जारी करने का आदेश दे सकता है ?
यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है. संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार केंद्र सरकार द्वारा राज्यों और स्थानीय निकायों को दी जाने वाली राशि वित्त आयोग की अनुशंसाओं, केंद्रीय मंत्रालयों की गाइडलाइन और बजटीय स्वीकृति के आधार पर जारी होती है. हाई कोर्ट किसी राज्य में चुनाव कराने, संवैधानिक दायित्वों के पालन और प्रशासनिक निष्क्रियता पर निर्देश दे सकता है. लेकिन सामान्य परिस्थितियों में हाई कोर्ट सीधे केंद्र सरकार को यह आदेश नहीं देता कि वह किसी राज्य या नगर निकाय को एक निश्चित राशि जारी करे. हालांकि यदि यह साबित हो कि संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है, वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है या केंद्र अथवा राज्य किसी कानूनी दायित्व का निर्वहन नहीं कर रहे हैं, तब न्यायालय संबंधित पक्षों को आवश्यक निर्देश दे सकता है. अर्थात हाई कोर्ट विकास योजनाओं के लिए जवाबदेही तय कर सकता है, रिपोर्ट तलब कर सकता है, फंड रिलीज की स्थिति पूछ सकता है, लेकिन बजटीय आवंटन और वित्तीय वितरण मुख्य रूप से कार्यपालिका और वित्त आयोग की व्यवस्था के अधीन होते हैं.
चुनाव हो जाने के बाद अब क्या स्थिति है ?
निकाय चुनाव संपन्न होने के बाद झारखंड की शहरी स्थानीय संस्थाओं के लिए वित्त आयोग आधारित अनुदान प्राप्त करने की स्थिति पहले की तुलना में मजबूत हुई है. 16वें वित्त आयोग ने शहरी निकायों के लिए देशभर में अनुदान राशि बढ़ाने की अनुशंसा की है और शहरी निकायों की हिस्सेदारी में भी वृद्धि का सुझाव दिया है. विशेषज्ञों का मानना है कि अब राज्य सरकार को निम्नलिखित बिंदुओं पर तेजी से काम करना होगा.
– राज्य वित्त आयोग की सिफारिशों को लागू करना.
– नगर निकायों की वित्तीय क्षमता बढ़ाना.
– संपत्ति कर और स्थानीय राजस्व संग्रह को मजबूत करना.
– केंद्र प्रायोजित योजनाओं का समय पर उपयोग सुनिश्चित करना.
– उपयोगिता प्रमाणपत्र और ऑडिट रिपोर्ट समय पर भेजना.
– लंबित शहरी परियोजनाओं की मॉनिटरिंग बढ़ाना.
सबसे बड़ी चुनौती क्या है ?
विशेषज्ञों के अनुसार केवल चुनाव करा देना पर्याप्त नहीं है. यदि नगर निकायों के पास वित्तीय संसाधन, तकनीकी कर्मचारी, परियोजना प्रबंधन क्षमता और राजस्व संग्रह व्यवस्था मजबूत नहीं होगी तो विकास कार्य जमीन पर नहीं उतर पाएंगे. 16वें वित्त आयोग ने भी स्पष्ट संकेत दिया है कि स्थानीय निकायों को अधिक फंड देने के साथ- साथ जवाबदेही, पारदर्शिता और वित्तीय सुधार भी जरूरी हैं.
आगे क्या….
झारखंड में निकाय चुनाव संपन्न होना लोकतांत्रिक व्यवस्था की बड़ी उपलब्धि है, लेकिन वास्तविक चुनौती अब शुरू होती है. चुनाव के बाद जनता को सड़क, नाली, जलापूर्ति, स्ट्रीट लाइट, कचरा प्रबंधन और शहरी आधारभूत सुविधाओं का लाभ तभी मिलेगा जब राज्य सरकार, नगर विकास विभाग और नगर निकाय वित्तीय संसाधनों को प्रभावी ढंग से जुटा सकें. हाई कोर्ट संवैधानिक जिम्मेदारियों के पालन को सुनिश्चित कर सकता है, लेकिन स्थायी समाधान वित्तीय विकेंद्रीकरण, वित्त आयोग की अनुशंसाओं के क्रियान्वयन और मजबूत शहरी प्रशासन में ही छिपा है. यदि केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों के बीच समन्वय बेहतर होता है तो आने वाले वर्षों में झारखंड के शहरी क्षेत्रों में विकास की गति तेज हो सकती है.
क्या होगा चुने हुए जनप्रतिनिधियों के वायदों का…
जितने तामझाम और लोक- लुभावन वायदों के साथ जनप्रतिनिधि चुनकर आए हैं यदि जनता के साथ किए गए वायदे पूरे नहीं हुए तो उन्हें जनता की भारी नाराजगी झेलनी पड़ सकती है. शहरी मतदाता जागरूक होने के साथ- साथ अपने हक और हुकूक के लिए आंदोलन कर सकते हैं. केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच यदि आपसी सामंजस्य नहीं बैठता है और केंद्र निकायों को फंड नहीं देता हैं तो आने वाले समय में निकायों में विरोध के स्वर भी मुखर हो सकते हैं.



