सरायकेला: सरायकेला छऊ संगीत की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत, शास्त्रीय स्वरूप और पारंपरिक संगीत शैली को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से छऊ केंद्र, चंदनकियारी में तीन दिवसीय सरायकेला छऊ संगीत कार्यशाला का शुभारंभ हुआ. कार्यशाला के पहले दिन त्रिनेत्र सेंटर फॉर परफॉर्मिंग आर्ट्स के कलाकारों ने व्याख्यान और सजीव प्रस्तुतियों के माध्यम से प्रतिभागियों को छऊ संगीत के ऐतिहासिक विकास, शास्त्रीय प्रभाव और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के अनूठे समन्वय से परिचित कराया.


कार्यशाला में वरिष्ठ छऊ संगीतकार देवराज दूबे ने सरायकेला छऊ संगीत की ऐतिहासिक विकास यात्रा पर विस्तार से प्रकाश डाला. उन्होंने बताया कि वर्ष 1920 से पहले प्रचलित संगीत परंपरा में किस प्रकार महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए शास्त्रीय संगीत का समावेश किया गया. पारंपरिक पहचान को बरकरार रखते हुए शास्त्रीय संगीत के साथ स्थापित इस समन्वय ने सरायकेला छऊ संगीत को एक विशिष्ट शैली के रूप में पहचान दिलाई है. इस दौरान वरिष्ठ ढोल वादक पटम मुखी और वरिष्ठ छऊ कलाकार संजय कर्मकार ने नगाड़े पर संगत कर प्रस्तुति को जीवंत बना दिया.
कार्यशाला के दौरान कलाकारों ने सरायकेला छऊ संगीत में प्रयुक्त विभिन्न तालों का तबले और ढोल पर सजीव प्रदर्शन किया. प्रतिभागियों को बताया गया कि कहरवा और तीनताल जैसे शास्त्रीय तालों को किस प्रकार ढोल की पारंपरिक बानी में समाहित कर छऊ संगीत का अभिन्न हिस्सा बनाया गया. इसके साथ ही ढोल, धूमसा और खोल जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों पर विभिन्न तालों के समायोजन और उनकी विशिष्ट वादन शैली का भी प्रदर्शन किया गया. कलाकारों ने ताल, लय और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के समन्वय के माध्यम से सरायकेला छऊ संगीत की विशिष्ट पहचान को समझाया.
कार्यशाला में सरायकेला छऊ संगीत के पौराणिक और सांस्कृतिक संबंधों पर भी चर्चा की गई. ओडिशा के जगन्नाथ मंदिर की देवदासी परंपरा पर आधारित छऊ प्रस्तुति ‘देवदासी’ के माध्यम से प्रतिभागियों को इसमें प्रयुक्त रागों और ओड़िया भाषा के गीतों की विशेषताओं से अवगत कराया गया. कलाकारों ने प्रस्तुति के संगीत पक्ष को विस्तार से समझाया और अन्य उदाहरणों के माध्यम से सरायकेला छऊ संगीत की सांस्कृतिक जड़ों तथा विभिन्न परंपराओं के साथ उसके ऐतिहासिक संबंधों को रेखांकित किया.
कार्यशाला के आगामी दो दिनों में सरायकेला छऊ संगीत के विशिष्ट शास्त्रीय स्वरूप और उसकी स्वतंत्र संगीत धारा पर विशेष चर्चा की जाएगी. इसमें हिंदुस्तानी, दक्षिण भारतीय और ओड़िशी संगीत परंपराओं से अलग सरायकेला छऊ संगीत की अपनी विशिष्ट शैली, संरचना और सांगीतिक विशेषताओं को ऐतिहासिक तथ्यों, व्याख्यानों और सजीव प्रस्तुतियों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाएगा.
तीन दिवसीय यह कार्यशाला सरायकेला छऊ संगीत की ऐतिहासिक विरासत, पारंपरिक वादन शैली और शास्त्रीय विशेषताओं को समझने के साथ-साथ इसके संरक्षण, संवर्धन और भावी पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है.
प्रमोद सिंह (संपादक)

