सरायकेला: जिले के सिनी ओपी क्षेत्र में एक नाबालिग बच्ची के साथ कथित यौन अपराध के मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. आरोप है कि रविवार शाम करीब पांच बजे सूचना मिलने के बावजूद पुलिस ने कानून द्वारा निर्धारित कई अनिवार्य प्रक्रियाओं का समय पर पालन नहीं किया. यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act), भारतीय न्याय संहिता (BNS) तथा झारखंड पुलिस मैन्युअल के प्रावधानों के उल्लंघन का विषय बन सकता है.



सूत्रों के अनुसार रविवार शाम करीब पांच बजे सिनी ओपी पुलिस को सूचना मिली कि एक नाबालिग बच्ची के साथ कथित रूप से गलत घटना हुई है. सूचना मिलने के बाद पुलिस महिला समिति के साथ घटनास्थल पहुंची और झाड़ियों से डरी-सहमी बच्ची को रेस्क्यू कर अपने संरक्षण में लिया. वहीं, कथित आरोपी, जो पीड़िता का चचेरा भाई बताया जा रहा है, उसे भी हिरासत में ले लिया गया.
मेडिकल परीक्षण में देरी पर सवाल
आरोप है कि पीड़िता को पुलिस संरक्षण में लेने के बाद पूरी रात उसका मेडिकल परीक्षण नहीं कराया गया. और बच्ची को ओपी में ही रखा गया. जबकि POCSO Act की धारा 27 तथा BNSS की धारा 184 के अनुसार यौन अपराध के मामलों में पीड़िता का चिकित्सीय परीक्षण यथाशीघ्र कराया जाना आवश्यक है, ताकि साक्ष्यों का संरक्षण हो सके और पीड़िता को तत्काल चिकित्सकीय सहायता मिल सके.
CWC को तत्काल सूचना देना भी अनिवार्य
कानूनी प्रावधानों के अनुसार यदि पीड़ित बच्चा या बच्ची है तो Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015 के तहत संबंधित Child Welfare Committee (CWC) को तत्काल सूचना देना आवश्यक होता है. आरोप है कि इस मामले में भी CWC को समय पर सूचना नहीं दी गई.
वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना देने का भी प्रावधान
झारखंड पुलिस मैन्युअल एवं पुलिस मुख्यालय द्वारा जारी मानक कार्यप्रणाली (SOP) के अनुसार POCSO एवं गंभीर अपराधों की सूचना तत्काल वरीय पुलिस अधिकारियों को देना अनिवार्य माना गया है. आरोप है कि इस मामले में वरीय अधिकारियों को भी समय पर जानकारी नहीं दी गई.
समझौते का दबाव बनाने के आरोप
सूत्रों का दावा है कि पीड़िता के परिजनों पर प्राथमिकी दर्ज नहीं कराने और मामले को सामाजिक स्तर पर ही समाप्त करने के लिए दबाव बनाया गया. हालांकि इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है. यदि जांच में यह आरोप सही पाया जाता है तो यह न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का गंभीर मामला माना जा सकता है.
बताया जाता है कि पीड़िता की मां की कुछ दिन पूर्व हत्या हो चुकी है तथा हत्या के आरोप में उसके पिता जेल में बंद हैं. वर्तमान में बच्ची अपने मामा-मामी के घर रह रही थी. आरोप है कि मामा-मामी पर भी मामले को शांत कराने का दबाव बनाया गया.
दबाव के बाद दर्ज हुआ लिखित आवेदन
सूत्रों के अनुसार ग्रामीणों एवं जिला परिषद प्रतिनिधियों के हस्तक्षेप के बाद देर रात करीब ढाई बजे परिजनों से लिखित आवेदन लिया गया. इसके बाद सोमवार सुबह पीड़िता को चिकित्सीय परीक्षण के लिए सदर अस्पताल भेजा गया.
कानूनी रूप से क्या होना चाहिए था ?
ऐसे मामलों में कानून के अनुसार पुलिस की प्राथमिक जिम्मेदारियां हैं.
• सूचना मिलते ही तत्काल Zero FIR/FIR दर्ज करना, यदि संज्ञेय अपराध का प्रथम दृष्टया मामला बनता हो.
• पीड़िता को तत्काल सुरक्षित संरक्षण उपलब्ध कराना.
• POCSO Act की धारा 27 एवं BNSS धारा 184 के तहत बिना अनावश्यक विलंब मेडिकल परीक्षण कराना.
• Child Welfare Committee (CWC) तथा Special Juvenile Police Unit (SJPU) को तत्काल सूचना देना.
• पीड़िता का बयान महिला पुलिस अधिकारी द्वारा संवेदनशील वातावरण में दर्ज करना.
• BNSS की धारा 183 के तहत महिला पुलिस अधिकारी द्वारा बयान दर्ज करने की प्रक्रिया अपनाना.
• घटनास्थल से वैज्ञानिक एवं भौतिक साक्ष्य सुरक्षित करना.
• पीड़िता और उसके परिवार को किसी भी प्रकार के दबाव या भय से सुरक्षा प्रदान करना.
BNS की संभावित धाराएं
यदि जांच में यौन अपराध की पुष्टि होती है तो मामले की प्रकृति के अनुसार भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं के साथ POCSO Act की उपयुक्त धाराएं लागू की जा सकती हैं. अंतिम धाराएं तथ्यों, मेडिकल रिपोर्ट और जांच के आधार पर निर्धारित की जाती हैं.
फिलहाल पूरे मामले में पुलिस का आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है. यदि लगाए गए आरोपों में सच्चाई पाई जाती है तो यह केवल एक आपराधिक घटना ही नहीं, बल्कि संवेदनशील मामलों में पुलिस की प्रक्रियागत जवाबदेही और कानून के अनुपालन पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करेगा.





