गम्हरिया: राहुल हांसदा और तपन प्रधान हत्याकांड की जांच अभी पूरी नहीं हुई है. दो आरोपी फूलचंद हांसदा और रविंद्र मार्डी न्यायिक हिरासत में भेजे जा चुके हैं और पुलिस के अनुसार कुछ अन्य लोगों की भूमिका की जांच जारी है. इसी बीच सोमवार को खेरवाल सांवता जाहेरगाड़ समिति, टायो गेट (सरना उमूल) ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस हत्याकांड के संदर्भ में सरना उमूल का नाम सामने आने पर कड़ी आपत्ति जताई है. समिति का कहना है कि सोशल मीडिया पर धार्मिक स्थल की छवि खराब की जा रही है.


समिति की धार्मिक स्थल की गरिमा और प्रतिष्ठा को लेकर चिंता अपनी जगह है. किसी भी जांच में बिना प्रमाण किसी धार्मिक या सामाजिक संस्था को अपराध से जोड़ना उचित नहीं है. लेकिन इस मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि सरना उमूल का नाम मीडिया ने अपनी ओर से घटनास्थल के रूप में तय नहीं किया.
रविवार को गिरफ्तार आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के बाद मीडिया से बातचीत में एसडीपीओ अनुभव भारद्वाज ने दोनों युवकों के साथ गम्हरिया थाना क्षेत्र में सरना उमूल के समीप मारपीट होने की पुष्टि की थी. मृतकों के परिजन भी इससे आगे जाकर आरोप लगाते रहे हैं कि युवकों को वहां ले जाकर पीटा गया. हालांकि परिजनों के आरोप और पुलिस द्वारा अब तक पुष्ट तथ्य के बीच अंतर करना जरूरी है. पुलिस ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि दोनों युवकों की मौत ठीक किस स्थान पर हुई.
समिति की आपत्ति का सम्मान, लेकिन सवाल पुलिस से भी होना चाहिए
यदि समिति का मानना है कि ‘सरना उमूल’ का उल्लेख ही धार्मिक स्थल की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा रहा है, तो सवाल स्वाभाविक है कि उसकी आपत्ति केवल सोशल मीडिया तक सीमित क्यों है ? इस हत्याकांड की रिपोर्टिंग करने वाले विभिन्न मीडिया संस्थानों ने पुलिस और पीड़ित परिवार से सामने आई जानकारी के आधार पर सरना उमूल के आसपास मारपीट का उल्लेख किया है. ऐसे में तथ्यात्मक स्थिति स्पष्ट कराने के लिए समिति को पुलिस से भी यह सवाल पूछना चाहिए कि सरना उमूल के समीप मारपीट होने की बात किस साक्ष्य और अनुसंधान के आधार पर कही गई ? यदि पुलिस की जानकारी गलत है तो समिति को उसका आधिकारिक खंडन मांगना चाहिए. और यदि पुलिस के पास इसके साक्ष्य हैं, तो यह जानना भी जरूरी है कि घटना धार्मिक स्थल के परिसर में हुई, उसके बाहर हुई या उससे कितनी दूरी पर हुई. इन सवालों के जवाब आने से धार्मिक स्थल की छवि को लेकर पैदा भ्रम भी दूर होगा और हत्याकांड की जांच भी अधिक स्पष्ट होगी.
हिमांशु हत्याकांड पर हिला था सरकारी तंत्र, यहां संवेदना के दो शब्द भी क्यों नहीं ?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि पिछले महीने जमशेदपुर के डीडी बार हत्याकांड में हिमांशु सिंह की मौत के बाद मामला इतना गंभीर हुआ कि सरकार और प्रशासन के उच्च स्तर तक हलचल मच गई. पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई हुई, एसआईटी जांच आगे बढ़ी और पीड़ित परिवार की मांगों को लेकर प्रशासन को लिखित आश्वासन तक देना पड़ा. ऐसे में राहुल हांसदा और तपन प्रधान की जघन्य हत्या के बीच खेरवाल सांवता जाहेरगाड़ समिति की प्रेस विज्ञप्ति में धार्मिक स्थल की प्रतिष्ठा को लेकर चिंता तो प्रमुखता से सामने आती है, लेकिन दोनों मृत युवकों और उनके परिवारों के प्रति स्पष्ट संवेदना का उल्लेख नहीं होना सवाल खड़ा करता है. खासकर तब, जब राहुल हांसदा स्वयं आदिवासी समुदाय से था. समिति ने शेष आरोपियों को बेनकाब करने और दोषियों को कठोर सजा देने की मांग जरूर की है, जिसका स्वागत होना चाहिए. लेकिन सवाल यह भी है कि क्या समिति को राहुल और तपन के परिवार के साथ खड़े होकर निष्पक्ष जांच, सभी दोषियों की गिरफ्तारी, पीड़ित परिवारों को उचित मुआवजा और न्याय की मांग उतनी ही मुखरता से नहीं करनी चाहिए थी ? सरना उमूल की प्रतिष्ठा महत्वपूर्ण है, लेकिन दो परिवारों ने अपने बेटे खोए हैं. इसलिए इस पूरे मामले में सबसे पहली प्राथमिकता धार्मिक स्थल की छवि की रक्षा के साथ-साथ हत्या की पूरी सच्चाई सामने लाना और पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाना होनी चाहिए.
सबसे जरूरी है घटनास्थल की सच्चाई सामने आना
इस विवाद को ‘मीडिया बनाम समिति’ या किसी समुदाय के सम्मान का प्रश्न बना देना मूल हत्याकांड से ध्यान भटका सकता है. असली सवाल आज भी वही हैं.
• तीनों युवकों को 13 अगस्त की रात कौन लेकर गया ?
• किस वाहन का इस्तेमाल हुआ ?
• पुलिस जिन अन्य लोगों की भूमिका की जांच कर रही है वे कौन हैं ?
• राहुल और तपन को किस स्थान पर पीटा गया ?
• उनकी मौत कहां हुई ?
• शव रपचा की वन भूमि तक कौन लेकर गया ?
• उन्हें दफनाने में कितने लोग शामिल थे ?
• और यदि सरना उमूल के आसपास मारपीट हुई तो वहां मौजूद किसी व्यक्ति ने पुलिस या परिजनों को इसकी सूचना दी थी या नहीं ?
इन सवालों के जवाब पुलिस अनुसंधान और साक्ष्यों से आने चाहिए, न कि आरोप- प्रत्यारोप से.
समिति के लिए भी आत्ममंथन का अवसर
खेरवाल सांवता जाहेरगाड़ समिति की यह चिंता उचित है कि किसी धार्मिक स्थल को बिना प्रमाण अपराध का केंद्र न बताया जाए. उतना ही जरूरी यह भी है कि दो युवकों की मौत और उनके परिवारों के न्याय का सवाल धार्मिक स्थल की प्रतिष्ठा की बहस के पीछे न छूट जाए. समिति यदि मानती है कि सरना उमूल को गलत तरीके से घटनाक्रम से जोड़ा जा रहा है, तो उसे पुलिस से तथ्य सार्वजनिक करने की मांग करनी चाहिए. साथ ही पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदना, निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को भी उतनी ही मजबूती से सामने रखना चाहिए. क्योंकि इस मामले में किसी संस्था, समुदाय या मीडिया की प्रतिष्ठा से बड़ा सवाल दो युवकों की मौत और उनके परिवारों को मिलने वाले न्याय का है. प्रेस कॉन्फ्रेंस में समिति के अध्यक्ष विराम माझी, महासचिव उदय मार्डी, सचिव भोमरा माझी, सह सचिव अबिनाश सोरेन, कोंडा बेसरा, देव मार्डी, हेमंत मार्डी, बुद्धेश्वर मार्डी, भादो टुडू, भोजू मार्डी, विश्वनाथ हांसदा, होपना बेसरा और कोषाध्यक्ष गोमहा हांसदा समेत अन्य सदस्य मौजूद रहे.

