चांडिल: दलमा वन्यजीव अभ्यारण्य के माकुलाकोचा में रविवार को पर्यटन विभाग द्वारा आयोजित दालमा ईको रिट्रीट के उद्घाटन समारोह के बाद विवाद गहरा गया है. ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र के सांसद प्रतिनिधि मनोज कुमार महतो ने वन विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाते हुए केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री एवं रांची सांसद संजय सेठ, स्थानीय जनप्रतिनिधियों तथा आदिवासी धार्मिक परंपराओं की उपेक्षा का आरोप लगाया है. उन्होंने पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने और दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की है.


जारी प्रेस विज्ञप्ति में मनोज कुमार महतो ने कहा कि कार्यक्रम में केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ की गरिमा के अनुरूप स्वागत की व्यवस्था नहीं की गई. कार्यक्रम स्थल पर उनके स्वागत के लिए न तो कोई सम्मानजनक स्वागत द्वार बनाया गया और न ही उनके योगदान का समुचित उल्लेख किया गया. उन्होंने कहा कि सांसद प्रतिनिधि होने के बावजूद उन्हें भी अपने विचार रखने का अवसर नहीं दिया गया.
उन्होंने आरोप लगाया कि वन विभाग ने कार्यक्रम की सूचना स्थानीय जनप्रतिनिधियों, पंचायत प्रतिनिधियों और क्षेत्रीय प्रतिनिधियों तक समय पर नहीं पहुंचाई. इसके कारण कई जनप्रतिनिधि उद्घाटन समारोह में शामिल नहीं हो सके. उनका कहना है कि सरकारी आयोजनों में स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भागीदारी सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है.
मनोज कुमार महतो ने आदिवासी धार्मिक परंपराओं की अनदेखी का भी आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि उद्घाटन से पूर्व पूजा-अर्चना के लिए बाहरी पंडितों को बुलाया गया, जबकि स्थानीय परंपरा के अनुसार पूजा कराने वाले लाया, पाहन एवं स्थानीय पुजारियों को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया. उन्होंने इसे आदिवासी संस्कृति, परंपरा और स्थानीय आस्था का अपमान बताया.
उन्होंने कार्यक्रम संचालन के लिए भी बाहरी संचालक बुलाए जाने पर आपत्ति जताई. उनका कहना है कि क्षेत्र में प्रतिभाशाली स्थानीय संचालकों की कोई कमी नहीं है, लेकिन उन्हें अवसर देने के बजाय बाहरी लोगों को प्राथमिकता दी गई, जिससे स्थानीय प्रतिभाओं की उपेक्षा हुई.
मनोज कुमार महतो ने राज्य सरकार और संबंधित विभाग से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग करते हुए कहा कि भविष्य में सरकारी कार्यक्रमों में स्थानीय सांसद, विधायक, पंचायत प्रतिनिधियों, आदिवासी धार्मिक परंपराओं और क्षेत्रीय प्रतिभाओं को उचित सम्मान और सहभागिता सुनिश्चित की जानी चाहिए.
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि भविष्य में भी स्थानीय जनप्रतिनिधियों और आदिवासी परंपराओं की इसी प्रकार उपेक्षा की गई तो क्षेत्र की जनता एवं सामाजिक संगठनों के साथ लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन किया जाएगा.
रिपोर्ट: विपिन वार्ष्णेय

