जामताड़ा: कभी भारतीय रेलवे के लिए महत्वपूर्ण स्टील कास्टिंग और रेल उपकरण तैयार करने वाली चित्तरंजन की स्टील फाउंड्री अब फिर रेलवे की उपयोगिता में लौट सकती है. वर्षों पुराने इस औद्योगिक परिसर को खाली छोड़ने के बजाय इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव के पीओएच (Periodic Overhaul) और कंपोनेंट ओवरहॉल सेंटर के रूप में विकसित करने की पहल की गयी है. चित्तरंजन रेलवेमेंस कांग्रेस (CRMC) ने इस संबंध में कदम बढ़ाते हुए 24 सितंबर को चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स (CLW) के महाप्रबंधक को पत्र भेजा है.


CRMC महासचिव इंद्रजीत सिंह ने पत्र में फाउंड्री की मौजूदा परिसंपत्तियों को रेलवे के भविष्य के उपयोग में लाने का प्रस्ताव रखा है. संगठन का कहना है कि फाउंड्री भले ही उत्पादन से बाहर हो गयी हो, लेकिन उसका औद्योगिक ढांचा आज भी उपयोगी है. परिसर में जमीन, बड़े शेड, क्रेन, रेल ट्रैक, सड़क, बिजली-पानी और मटेरियल हैंडलिंग जैसी आधारभूत सुविधाएं मौजूद हैं. ऐसे में नये सिरे से जमीन और आधारभूत संरचना विकसित करने की आवश्यकता कम होगी.
1963 से रेलवे की औद्योगिक विरासत का हिस्सा
वर्ष 1963 में स्थापित स्टील फाउंड्री ने दशकों तक रेलवे के लिए महत्वपूर्ण स्टील कास्टिंग और विभिन्न उपकरणों का निर्माण किया. यहां बोगी, बोल्स्टर, कपलर, बैलास्ट ब्लॉक, स्ट्राइकर कास्टिंग, साइड फ्रेम और सेंटर पिवट जैसे कई महत्वपूर्ण कंपोनेंट तैयार होते थे। फाउंड्री को RDSO की क्लास-ए मान्यता भी प्राप्त थी. इस लिहाज से यह परिसर चित्तरंजन की औद्योगिक पहचान और रेलवे की निर्माण विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है.
CRMC के अनुसार, 16 मार्च 2024 के आदेश के बाद फाउंड्री में उत्पादन बंद हो गया. इसके बाद प्लांट और मशीनरी हटाये जाने से परिसर फिलहाल निष्क्रिय पड़ा है. संगठन का तर्क है कि उत्पादन बंद होने के बाद भी यहां बची आधारभूत संरचना को पूरी तरह अनुपयोगी छोड़ना रेलवे की परिसंपत्ति का बेहतर इस्तेमाल नहीं होगा.
पुरानी परिसंपत्ति से बढ़ेगी नई क्षमता
CRMC ने प्रस्ताव दिया है कि फाउंड्री परिसर को चरणबद्ध तरीके से इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव के POH और कंपोनेंट ओवरहॉल केंद्र में बदला जा सकता है. इससे CLW की मौजूदा रखरखाव क्षमता को बढ़ाने के साथ रेलवे की अपनी जमीन और आधारभूत संरचना का पुनः उपयोग संभव होगा.
संगठन के मुताबिक 20-21 अगस्त 2026 को रेलवे बोर्ड और NFIR की PNM बैठक में भी इस प्रस्ताव को रेलवे बोर्ड के अधिकारी के समक्ष रखा गया था. अब CRMC ने NFIR से रेलवे बोर्ड के स्तर पर पहल कर DPR तैयार कराने, तकनीकी-आर्थिक अध्ययन कराने और संयुक्त निरीक्षण की प्रक्रिया शुरू कराने की मांग की है.
धरोहर भी बचे, उपयोगिता भी लौटे
CRMC का प्रस्ताव केवल एक बंद औद्योगिक इकाई को दोबारा उपयोग में लाने का मामला नहीं है, बल्कि चित्तरंजन की पुरानी रेलवे औद्योगिक विरासत को आधुनिक जरूरतों के अनुरूप बचाये रखने की पहल के रूप में देखा जा रहा है. यदि तकनीकी और आर्थिक अध्ययन के बाद प्रस्ताव व्यवहार्य पाया जाता है, तो वर्षों से निष्क्रिय पड़े इस परिसर को फिर रेलवे की सेवा में लाया जा सकता है. अब देखना होगा कि रेलवे इस पुराने औद्योगिक ढांचे को नई उपयोगिता देने की दिशा में DPR, संयुक्त निरीक्षण और तकनीकी अध्ययन की प्रक्रिया को कितनी तेजी से आगे बढ़ाता है.
रिपोर्ट: मनीष बर्णवाल

