चांडिल: सरायकेला- खरसावां जिले के कुकड़ू प्रखंड में बालू के कथित अवैध कारोबार पर प्रशासनिक सख्ती के बीच अब जुबानी जंग तेज हो गई है. मामला नदी घाट से निकलकर प्रेस कॉन्फ्रेंस और सोशल मीडिया तक पहुंच गया है. इस पूरे विवाद के केंद्र में पूर्व जिला परिषद सदस्य अशोक साव उर्फ माझी साव हैं. शनिवार को उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर तिरुलडीह थाना क्षेत्र में अवैध बालू उठाव होने का आरोप लगाया और प्रशासन से इसे रोकने की मांग की. मगर उनके आरोपों के बाद अब उनसे ही सवाल पूछे जा रहे हैं कि जिस बालू कारोबार से उनका नाम लंबे समय से जोड़ा जाता रहा, उस दौर में उन्होंने अवैध खनन के खिलाफ ऐसी मुखरता क्यों नहीं दिखाई ?


प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जब अशोक साव से कथित अवैध बालू उठाव के आरोपों के समर्थन में प्रमाण के संबंध में पूछा गया तो वे तत्काल कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सके. उन्होंने मामले की जांच कराने की बात कही. यहीं से उनके दावे पर सवाल खड़े होने शुरू हो गए. सवाल यह है कि यदि आरोप गंभीर हैं तो वे किस घाट, किस वाहन, किस तारीख और किन लोगों की गतिविधियों के आधार पर लगाए जा रहे हैं ? यदि ऐसी जानकारी उनके पास है तो उसे प्रशासन के समक्ष प्रमाण के साथ क्यों नहीं रखा जा रहा ?
सोशल मीडिया पर घिरे माझी साव, विरोधियों ने पूछा- शीशे के घर से पत्थर क्यों ?
रविवार को विवाद सोशल मीडिया पर और तेज हो गया. स्थानीय JLKM नेता विष्णु विद्रोही ने अपने फेसबुक पेज पर किसी का नाम लिए बिना लिखा, “जब खुद का घर शीशे का हो तो किसी और के घर में पत्थर नहीं मारना चाहिए नेताजी.” पोस्ट के साथ कुकड़ू प्रखंड का उल्लेख किया गया. हालांकि उन्होंने अशोक साव का नाम नहीं लिखा, इसलिए इस टिप्पणी को सीधे उनके लिए किया गया बयान मानना उचित नहीं होगा. लेकिन स्थानीय स्तर पर इसे मौजूदा बालू विवाद से जोड़कर देखा जा रहा है.

सोशल मीडिया पर सक्रिय गौरांग दत्ता ने इससे भी तीखा पोस्ट किया. उन्होंने बिना नाम लिए आरोप लगाया कि पिछले तीन वर्षों से JCB, लोडर, हाईवा और ट्रैक्टर के माध्यम से स्वर्णरेखा नदी से रात में कथित अवैध बालू खनन से जुड़ा व्यक्ति अब कार्रवाई के बीच सवाल उठा रहा है. यह गंभीर आरोप है और इसकी स्वतंत्र अथवा आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है. लेकिन इस पोस्ट ने बहस को एक नया सवाल जरूर दे दिया है- बालू के अवैध कारोबार के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों का अपना रिकॉर्ड क्या रहा है?
अशोक साव के सामने सबसे बड़ा सवाल- तब चुप क्यों थे ?
अशोक साव के मौजूदा रुख पर सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि क्षेत्र में उन्हें बालू के कारोबार से जुड़ा व्यक्ति बताया जाता रहा है. ऐसे में उनके लिए केवल दूसरों पर आरोप लगाना पर्याप्त नहीं है. यदि वे वास्तव में कुकड़ू में अवैध बालू खनन के खिलाफ अभियान छेड़ना चाहते हैं तो उन्हें अपने ऊपर लग रहे आरोपों और अपने पुराने कारोबारी संबंधों पर भी स्पष्ट जवाब देना होगा.

अशोक साव
सवाल सीधा है. जब बालू के कारोबार में उनकी सक्रियता की चर्चा होती थी, तब उन्होंने कितनी बार अवैध खनन के खिलाफ प्रशासन को लिखित शिकायत दी ? कितने अवैध घाटों की जानकारी सार्वजनिक की ? कितनी गाड़ियों या कारोबारियों के खिलाफ प्रमाण सौंपे ? और यदि तब सबकुछ नियम के मुताबिक था तो आज जिन लोगों पर सवाल उठा रहे हैं, उनके खिलाफ उनके पास क्या ठोस सबूत हैं ? इन सवालों का जवाब दिए बिना केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोप लगाने से संदेह खत्म होने के बजाय और बढ़ सकता है.
पंचायत चुनाव से पहले सक्रियता पर भी चर्चा
मामले को राजनीतिक नजरिये से भी देखा जा रहा है. अगले पंचायत चुनाव को देखते हुए अशोक साव की सक्रियता के राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं. क्षेत्र के कुछ लोगों का मानना है कि बालू का मुद्दा स्थानीय राजनीति में प्रभावी हथियार बन सकता है. हालांकि अशोक साव ने अपने बयान को चुनावी राजनीति से जोड़कर नहीं बताया है, इसलिए इसे राजनीतिक स्टंट कहना फिलहाल लोगों और उनके विरोधियों की व्याख्या है, स्थापित तथ्य नहीं. इसके बावजूद समय को लेकर सवाल स्वाभाविक हैं. यदि अवैध बालू उठाव लंबे समय से हो रहा था तो विरोध अभी क्यों ? और यदि हाल में कोई नया अवैध नेटवर्क सक्रिय हुआ है तो उसका प्रमाण सामने क्यों नहीं रखा जा रहा ?
पर्दे के पीछे कौन दे रहा हवा ?
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी है कि इस विवाद में कुछ लोग पर्दे के पीछे से माहौल को हवा दे रहे हैं. मगर इस दावे के समर्थन में भी फिलहाल कोई सार्वजनिक प्रमाण सामने नहीं है. इसलिए नामों और आरोपों की राजनीति के बजाय प्रशासनिक जांच ही यह स्पष्ट कर सकती है कि कुकड़ू और तिरुलडीह क्षेत्र में वास्तव में अवैध बालू उठाव हो रहा है या नहीं और यदि हो रहा है तो उसके पीछे कौन लोग हैं. वैसे इस पूरे विवाद का समाधान भी बेहद सीधा है. अशोक साव के पास प्रमाण हैं तो उन्हें सार्वजनिक बयानबाजी तक सीमित रखने के बजाय खनन विभाग, पुलिस और जिला प्रशासन को सौंपना चाहिए. वाहन संख्या, घाट, तारीख, समय, तस्वीर, वीडियो अथवा अन्य दस्तावेज उपलब्ध हैं तो जांच की मांग अधिक मजबूत होगी.
वहीं उनके ऊपर सोशल मीडिया में लगाए जा रहे पुराने अवैध बालू कारोबार के आरोपों की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए. आरोप लगाने वाला हो या आरोप झेलने वाला- पैमाना सबके लिए एक होना चाहिए. कुकड़ू की जनता को राजनीतिक शोर नहीं, तथ्य चाहिए. माझी साव यदि अवैध बालू कारोबार के खिलाफ खड़े हैं तो अब उनके सामने अपने दावे को प्रमाण के साथ साबित करने की चुनौती है. क्योंकि सवाल केवल यह नहीं कि आज बालू कौन उठा रहा है, सवाल यह भी है कि कल कौन उठा रहा था और तब आवाज किसकी बंद थी ?
संतोष कुमार

