आदित्यपुर: लंदन, पेरिस और नॉर्दर्न टाउन बनाने का सब्जबाग दिखाकर पांच महीने पहले जनता से वोट मांगने वाले आदित्यपुर नगर निगम के चुने हुए जनप्रतिनिधि अब अपनी ही जनता से मुंह चुराते नजर आ रहे हैं. कोई रील बनाने में व्यस्त है, कोई पार्टी के कार्यक्रमों में सक्रिय है, कोई निगम के नए भवन को लेकर हाय-तौबा कर रहा है तो कोई योजनाओं को लेकर उठापटक में लगा है. लेकिन शहर की सबसे बड़ी समस्या से शायद सभी की नजरें हट गई हैं.



आदित्यपुर नगर निगम के 35 वार्डों में पिछले करीब 20 दिनों से डोर-टू-डोर कचरा उठाव ठप पड़ा है. घरों से कचरा नहीं उठ रहा, गलियों में कचरा जमा है और सड़कों के किनारे गंदगी का अंबार लगा है. कभी सफाई कर्मियों की कमी का बहाना सामने आता है, कभी लेबर नहीं मिलने की बात कही जाती है. कभी मजदूरों की हड़ताल तो कभी ग्रामीणों के विरोध के कारण कचरा डंपिंग बंद होने का तर्क दिया जाता है. लेकिन सवाल यह है कि इन तमाम समस्याओं के बीच जनता के घरों से कचरा उठाने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है.
हालात अब ऐसे हो गए हैं कि आरोप है कि निगम की गाड़ियां रात के अंधेरे में सड़कों और मोहल्लों से कचरा उठाकर चोरी-छिपे यहां-वहां फेंककर निकल जा रही हैं. यानी जिस कचरे को व्यवस्थित तरीके से उठाकर उसका निस्तारण किया जाना चाहिए, वही कचरा अब शहर के किसी दूसरे हिस्से के लोगों के लिए मुसीबत बन रहा है.
और जब जनता सवाल करती है तो जवाब भी कम दिलचस्प नहीं है. मेयर से सवाल कीजिए तो एजेंसी पर जिम्मेदारी डाल दी जाती है. पार्षदों से पूछिए तो उनका कहना है कि क्या करें, मेयर-डिप्टी मेयर और अधिकारी ही उनकी सुनने को तैयार नहीं हैं. अधिकारी कई बार फोन उठाना भी जरूरी नहीं समझते. दूसरी तरफ निगम के वर्षों से जमे कर्मचारी अपने स्थायीकरण और मानदेय बढ़ाने की लड़ाई में जुटे हैं. जनता पूछ रही है कि साहब, आपकी अपनी समस्याएं तो समझ में आती हैं, लेकिन 35 वार्डों की जनता की समस्या कौन सुनेगा.
जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र से लेकर निगम के दूसरे कामों तक आम आदमी को व्यवस्था के चक्कर लगाने पड़ते हैं. शहर में यह आरोप भी लगातार सुनने को मिलता है कि कई कामों के लिए रेट तय हैं. अगर यह आरोप गलत है तो निगम को सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए. और अगर इसमें जरा भी सच्चाई है तो फिर जिम्मेदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती.
सबसे बड़ा सवाल तो चुनावी वादों पर है. चुनाव के दौरान भाजपा ने जोर-शोर से कहा था. “भाजपा ही बाल्टी है, बाल्टी ही भाजपा है.” जनता ने भी भरोसा किया और बाल्टी को चुन लिया. लेकिन जनता को शायद यह नहीं बताया गया था कि जिस बाल्टी को वह विकास की उम्मीद में चुन रही है, पांच महीने बाद उसी बाल्टी में उसे अपने घर का कचरा भरकर खुद व्यवस्था के सामने खड़ा होना पड़ेगा.
वैसे आदित्यपुर की जनता भी कमाल की है. सुविधा मिले या नहीं, टैक्स ईमानदारी से भरती है. पानी मिले या नहीं, कनेक्शन सबसे पहले लेती है. सड़क मिले या नहीं, शुल्क देने में पीछे नहीं रहती. लेकिन अब सवाल यह है कि जब जनता अपनी जिम्मेदारी निभा रही है तो नगर निगम अपनी जिम्मेदारी कब निभाएगा.
जनता को लंदन नहीं चाहिए. पेरिस भी नहीं चाहिए. नॉर्दर्न टाउन बनाने का सपना भी फिलहाल रहने दीजिए. जनता को बस इतना चाहिए कि उसके घर से कचरा नियमित उठे. सड़कें साफ रहें. नालियां साफ हों. पानी मिले. प्रमाण पत्र के लिए कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें और नगर निगम जनता के सवालों का जवाब दे. क्योंकि चुनाव के समय सपना दिखाना आसान है. लेकिन पांच महीने बाद उसी जनता के सामने खड़े होकर अपने काम का हिसाब देना ही असली परीक्षा है. फिलहाल आदित्यपुर की 35 वार्डों की जनता यही पूछ रही है. लंदन कब बनेगा, यह बाद में बताइए. पहले इतना बता दीजिए कि हमारे घर का कचरा कब उठेगा ?





