
सरायकेला: जिले की सांस्कृतिक पहचान माने जाने वाले राजकीय छऊ नृत्य कला केंद्र ने तीन वर्षों की खामोश तपस्या के बाद एक बार फिर नई ऊर्जा के साथ अपनी पहचान बना ली है. यह केवल एक संस्थान के दोबारा शुरू होने की कहानी नहीं, बल्कि उन कलाकारों के समर्पण का उदाहरण है जिन्होंने बिना वेतन, बिना आर्थिक सहायता और तमाम अभावों के बावजूद छऊ की परंपरा को जीवित रखा.


स्थायी कलाकारों और कर्मचारियों के सेवानिवृत्त होने के बाद राजकीय छऊ नृत्य कला केंद्र पूरी तरह बंद हो गया था. वर्षों तक यहां प्रशिक्षण और सांस्कृतिक गतिविधियां ठप रहीं. लेकिन जुलाई 2024 में सरायकेला छऊ आर्टिस्ट एसोसिएशन के संरक्षक मनोज कुमार चौधरी, अध्यक्ष शशांक शेखर महंती, स्थानीय कलाकारों और जिला प्रशासन के संयुक्त प्रयास से केंद्र के दरवाजे दोबारा खुले.
जिला प्रशासन ने छऊ कलाकार सुदीप कुमार कवि को अवैतनिक समन्वयक की जिम्मेदारी सौंपी. उनके नेतृत्व में कलाकारों ने बिना किसी आर्थिक सहयोग के नियमित अभ्यास शुरू किया और वर्ष 2025 एवं 2026 के चैत्र पर्व सह छऊ महोत्सव का सफल संचालन भी किया. आज केंद्र में प्रतिदिन प्रशिक्षण, अभ्यास और सांस्कृतिक गतिविधियां नियमित रूप से संचालित हो रही हैं.
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ गुरु ब्रजेन्द्र पटनायक प्रतिदिन युवा कलाकारों को छऊ नृत्य का प्रशिक्षण दे रहे हैं. आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में युवा कलाकार 4 से 5 किलोमीटर की दूरी तय कर यहां प्रशिक्षण लेने पहुंच रहे हैं. केंद्र में गुरु-शिष्य परंपरा के साथ अनुशासित प्रशिक्षण का वातावरण तैयार हो चुका है.
समन्वयक सुदीप कुमार कवि ने कहा कि पिछले तीन वर्षों से कलाकार बिना किसी आर्थिक सहायता के पूरी निष्ठा के साथ इस केंद्र को जीवित रखे हुए हैं. वहीं वरिष्ठ गुरु ब्रजेन्द्र पटनायक ने कहा कि नई पीढ़ी को छऊ से जोड़ना ही सबसे बड़ा उद्देश्य है, ताकि यह विश्वविख्यात लोकनृत्य आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सके.
एसोसिएशन के अध्यक्ष शशांक शेखर महंती ने बताया कि प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे कलाकारों ने हाल के छऊ महोत्सव में उत्कृष्ट प्रस्तुति देकर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है. उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन कलाकारों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है. वहीं संरक्षक मनोज कुमार चौधरी ने भरोसा जताया कि कला, संस्कृति, खेलकूद एवं युवा कार्य विभाग से लगातार संवाद जारी है और जल्द ही कलाकारों को संस्थागत एवं आर्थिक सहयोग मिलने की उम्मीद है.
आज जिस राजकीय छऊ नृत्य कला केंद्र पर कभी ताला लटका हुआ था, वहां अब प्रतिदिन घुंघरुओं की गूंज सुनाई देती है. यह केवल एक कला केंद्र का पुनर्जीवन नहीं, बल्कि सरायकेला की सांस्कृतिक अस्मिता, कलाकारों की तपस्या और छऊ के प्रति उनके अटूट समर्पण की प्रेरक कहानी है.
प्रमोद सिंह (संपादक)





