
जामताड़ा : अलग झारखंड राज्य के निर्माण के लिए वर्षों तक संघर्ष, त्याग और बलिदान देने वाले आंदोलनकारियों को आज भी उनका वास्तविक सम्मान नहीं मिला है. झारखंड आंदोलनकारी संघर्ष मोर्चा के संस्थापक पुष्कर महतो ने राज्य सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिन लोगों ने अपने खून-पसीने से झारखंड राज्य की नींव रखी, वही आज उपेक्षा, आर्थिक तंगी और पहचान के संकट से जूझ रहे हैं. उन्होंने कहा कि आंदोलनकारियों को मुफ्त सहायता नहीं, बल्कि जल, जंगल, जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर उनका संवैधानिक अधिकार मिलना चाहिए.


बुधवार देर शाम मिहिजाम पहुंचे पुष्कर महतो ने गुरुवार को जामताड़ा और मिहिजाम में प्रस्तावित कार्यक्रमों से पहले विशेष बातचीत में कहा कि झारखंड आंदोलनकारियों ने वर्षों तक अलग राज्य की लड़ाई लड़ी, लेकिन राज्य गठन के बाद उनका योगदान धीरे-धीरे हाशिए पर धकेल दिया गया. उन्होंने कहा कि आज भी आंदोलनकारियों को वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे वास्तविक हकदार हैं.
पुष्कर महतो ने कहा कि दिशोम गुरु शिबू सोरेन को झारखंड का निर्माता बताते हुए पूरे राज्य में होर्डिंग लगाए जाते हैं, लेकिन आज तक उन्हें सरकारी गजट में औपचारिक रूप से झारखंड आंदोलनकारी का दर्जा नहीं दिया गया. उन्होंने इसे आंदोलनकारियों के इतिहास और उनके संघर्ष के साथ अन्याय बताया.
उन्होंने कहा कि संथाल परगना और जामताड़ा की धरती हमेशा शोषण और अन्याय के खिलाफ संघर्ष की पहचान रही है. सिद्धू-कान्हू, चांद-भैरव और फूलो-झानो ने इसी धरती से हूल आंदोलन का बिगुल फूंका था, लेकिन आज उन्हीं आदिवासी क्षेत्रों में जल, जंगल और जमीन पर बाहरी हस्तक्षेप लगातार बढ़ रहा है.
एसपीटी कानून के क्रियान्वयन पर उठाए सवाल.
पुष्कर महतो ने संथाल परगना टेनेंसी (एसपीटी) कानून के प्रभावी क्रियान्वयन पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि यह कानून पूरी तरह लागू है तो बड़े पैमाने पर जमीन उद्योगपतियों तक कैसे पहुंच रही है. उन्होंने कहा कि जंगलों की अंधाधुंध कटाई, पहाड़ों का दोहन और लगातार हो रहा विस्थापन झारखंड की मूल पहचान के लिए गंभीर खतरा बन गया है.
प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय लोगों के अधिकार की मांग.
उन्होंने कहा कि झारखंड के लोगों को दो-चार हजार रुपये की सरकारी सहायता देकर अधिकारों की लड़ाई को समाप्त नहीं किया जा सकता. राज्य के प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय लोगों का मालिकाना हक सुनिश्चित किया जाना चाहिए. साथ ही झारखंड को मिलने वाली 26 प्रतिशत रॉयल्टी का उपयोग पूरी पारदर्शिता के साथ जनता के हित में किया जाना चाहिए.
छह लाख रिक्त पदों पर स्थानीय युवाओं की बहाली की मांग.
पुष्कर महतो ने दावा किया कि राज्य में छह लाख से अधिक सरकारी पद रिक्त हैं, लेकिन स्थानीय युवाओं को रोजगार का उचित अवसर नहीं मिल रहा है. उन्होंने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मांग की कि आंदोलनकारियों के परिवारों के बच्चों को रोजगार देने के लिए अलग नीति बनाई जाए. उन्होंने कहा कि राज्य गठन के बाद भी पलायन जारी रहना सरकार की नीतियों की विफलता को दर्शाता है.
स्वतंत्रता सेनानियों की तर्ज पर मिले सम्मान.
उन्होंने मांग की कि झारखंड आंदोलनकारियों को स्वतंत्रता सेनानियों की तरह राजकीय सम्मान दिया जाए. पेंशन के लिए जेल जाने की अनिवार्यता समाप्त की जाए तथा सभी आंदोलनकारियों को बिना किसी भेदभाव के समान पेंशन उपलब्ध कराई जाए. उन्होंने कहा कि कई आंदोलनकारी आज आर्थिक तंगी में जीवन गुजार रहे हैं और उनके घरों में चाय बनाने तक के लिए आवश्यक सामान नहीं होता.
‘आंदोलन हमने किया, श्रेय दूसरे ले गए’.
भावुक होते हुए पुष्कर महतो ने कहा कि अलग झारखंड की लड़ाई आंदोलनकारियों ने लड़ी, लेकिन समय के साथ उसका श्रेय दूसरे लोगों ने ले लिया. आंदोलनकारियों ने अपनी जवानी और जीवन संघर्ष में लगा दी, लेकिन आज भी उनके योगदान को इतिहास में उचित स्थान नहीं मिल सका है.
उन्होंने कहा कि अब पूरे राज्य में जाकर लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जाएगा और आंदोलनकारियों के सम्मान की लड़ाई को नई दिशा दी जाएगी. उन्होंने विश्वास जताया कि यदि सरकार संवेदनशीलता के साथ निर्णय ले तो झारखंड आंदोलनकारियों को उनका वास्तविक सम्मान और अधिकार मिल सकता है.
रिपोर्ट: मनीष बर्णवाल






