रांची: झारखंड की दो राज्यसभा सीटों के चुनाव से ठीक पहले राज्य की राजनीति में घटनाक्रम तेजी से बदल रहे हैं. करीब पंद्रह दिनों तक चले सियासी खींचतान और अटकलों के दौर के बाद रविवार देर शाम झारखंड मुक्ति मोर्चा ने आखिरकार कांग्रेस के लिए एक सीट छोड़ने का औपचारिक ऐलान कर दिया. इसके साथ ही ऐसा माना जा रहा था कि महागठबंधन दोनों सीटों पर आसानी से जीत दर्ज कर लेगा. मगर सोमवार की सुबह राजनीतिक तस्वीर अचानक बदलती नजर आने लगी.


विधानसभा में महागठबंधन के पास कुल 56 विधायक हैं. इनमें झामुमो के 34, कांग्रेस के 16, राजद के 4 और माले के 2 विधायक शामिल हैं. दूसरी ओर एनडीए के पास कुल 24 विधायक हैं, जिनमें भाजपा के 21, जदयू, आजसू और लोजपा के एक-एक विधायक शामिल हैं. संख्या बल के हिसाब से देखा जाए तो महागठबंधन दोनों सीटें अपने दम पर जीत सकता है.
लेकिन इसी बीच मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को 8.86 एकड़ जमीन और कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में बड़ा कानूनी झटका लगा है. पीएमएलए की विशेष अदालत ने उनकी डिस्चार्ज पिटीशन खारिज कर दी है. अदालत ने स्पष्ट किया कि इस स्तर पर आरोपों को खारिज करने का पर्याप्त आधार नहीं है. यह वही मामला है जिसमें ईडी जांच कर रही है और हेमंत सोरेन फिलहाल जमानत पर बाहर हैं.
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि राज्यसभा चुनाव के ठीक पहले आया यह फैसला महागठबंधन के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है. भले ही संख्या बल उनके पक्ष में हो, लेकिन विपक्ष को अब एक नया राजनीतिक मुद्दा मिल गया है.
इधर दूसरी तरफ भाजपा ने भी सभी को चौंकाते हुए अपना उम्मीदवार उतारने के बजाय निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नथवानी को समर्थन देने का फैसला कर लिया है. सोमवार को नथवानी का भाजपा प्रदेश कार्यालय पहुंचना पहले ही कई तरह की चर्चाओं को जन्म दे चुका था. अब भाजपा के समर्थन के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि एनडीए इस चुनाव को केवल संख्या बल की लड़ाई नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश के रूप में भी देख रहा है.
राजनीतिक गलियारों में अब सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि क्या भाजपा का समर्थन मिलने के बाद परिमल नथवानी केवल एक निर्दलीय उम्मीदवार रह गए हैं या फिर वे एनडीए की रणनीतिक पसंद बन चुके हैं. यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या राज्यसभा चुनाव के बहाने झारखंड की राजनीति में भविष्य के समीकरण तैयार किए जा रहे हैं.
हालांकि गणित अभी भी महागठबंधन के पक्ष में दिखाई देता है, लेकिन राजनीति केवल गणित से नहीं चलती. समय-समय पर झारखंड की राजनीति ने यह साबित किया है कि यहां अंकगणित से ज्यादा महत्व राजनीतिक रसायनशास्त्र का होता है.
अब नजर सोमवार को होने वाले नामांकन और उसके बाद शुरू होने वाली राजनीतिक गतिविधियों पर टिकी है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को अदालत से मिले झटके और परिमल नथवानी को भाजपा के समर्थन ने राज्यसभा चुनाव को पूरी तरह औपचारिक प्रक्रिया से निकालकर राजनीतिक प्रतिष्ठा की लड़ाई में बदल दिया है.
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या महागठबंधन अपने विधायकों को पूरी तरह एकजुट रख पाएगा. क्या नथवानी की उम्मीदवारी महज प्रतीकात्मक होगी या फिर इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक संदेश छिपा है. और सबसे महत्वपूर्ण, क्या राज्यसभा चुनाव के बाद झारखंड की राजनीति में नए समीकरणों की शुरुआत देखने को मिलेगी. फिलहाल झारखंड की राजनीति में शतरंज की बिसात बिछ चुकी है. अब सभी की निगाहें अगले कुछ दिनों की चालों पर टिकी हैं.



