सरायकेला: सरायकेला की पहचान देश-दुनिया में छऊ नृत्य की समृद्ध परंपरा के लिए है. इसी सांस्कृतिक विरासत को शोध के माध्यम से नई पहचान देने की दिशा में सरायकेला निवासी अमलेश कुमार सिन्हा ने महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है. कोल्हान विश्वविद्यालय, चाईबासा ने उन्हें इतिहास विषय में दर्शनशास्त्र में शोध की उपाधि प्रदान की है. उनकी इस उपलब्धि से परिजनों, शिक्षाविदों, शुभचिंतकों और स्थानीय लोगों में खुशी का माहौल है.



अमलेश कुमार सिन्हा, स्वर्गीय सुनील कुमार सिन्हा के पुत्र हैं और सरायकेला स्थित एसजी एकेडमी, पीएचईडी कॉलोनी के समीप रहते हैं. उन्होंने अपने शोध के लिए सरायकेला की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पहचान से जुड़े महत्वपूर्ण विषय का चयन किया. उनके शोध का विषय “छऊ नृत्य का सरायकेला राज क्षेत्र के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन पर प्रभाव : 1947-2015” रहा.
उनका मौखिक शोध परीक्षण 11 मई 2026 को आयोजित किया गया था. इसके बाद कोल्हान विश्वविद्यालय की ओर से पत्रांक KU/CE/Ph.D./300-312/2026, दिनांक 12 जुलाई 2026 के माध्यम से उन्हें इतिहास विषय में शोध की उपाधि प्रदान किए जाने की अधिसूचना जारी की गई.
अमलेश कुमार सिन्हा ने अपना शोध कार्य डॉ. (श्रीमती) आशा मिश्रा, सेवानिवृत्त सह-प्राध्यापक, इतिहास विभाग, कोल्हान विश्वविद्यालय, चाईबासा के निर्देशन में पूरा किया.
अमलेश कुमार सिन्हा का शोध सरायकेला के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इसमें छऊ नृत्य को केवल कला एवं मनोरंजन के रूप में नहीं, बल्कि क्षेत्र के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण परंपरा के रूप में अध्ययन किया गया है.
शोध में वर्ष 1947 से 2015 के बीच सरायकेला राज क्षेत्र में छऊ नृत्य के विकास और इसके सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रभावों को समझने का प्रयास किया गया है. छऊ से जुड़े कलाकारों, परंपराओं, सामाजिक संरचना, आर्थिक गतिविधियों तथा सांस्कृतिक पहचान पर इसके प्रभाव को शोध के माध्यम से सामने लाने का प्रयास किया गया है.
शोध की उपाधि प्राप्त करने के बाद अमलेश कुमार सिन्हा को परिजनों, मित्रों, शिक्षकों एवं शुभचिंतकों ने बधाई दी. लोगों ने कहा कि सरायकेला की पहचान और गौरव से जुड़े छऊ नृत्य पर किया गया यह शोध आने वाली पीढ़ियों के लिए भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है.
अमलेश कुमार सिन्हा की यह उपलब्धि न केवल उनके व्यक्तिगत शैक्षणिक जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धि है, बल्कि सरायकेला की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को शोध के माध्यम से संरक्षित एवं दस्तावेजीकृत करने की दिशा में भी एक सराहनीय प्रयास है.
प्रमोद सिंह (संपादक)





