जमशेदपुर: युवा कारोबारी निखार सबलोक हत्याकांड की परतें खुलने के साथ अब सबसे बड़ा सवाल दुमका जेल में बंद गैंगस्टर अखिलेश सिंह को लेकर खड़ा हो रहा है. आखिर अशोक सिंह राघव इस हत्याकांड में बार- बार अखिलेश सिंह का नाम क्यों सामने ला रहा है ? क्या वास्तव में निखार की हत्या अखिलेश के इशारे पर हुई, या फिर इसके पीछे विक्रम शर्मा की मौत के बाद अखिलेश- विक्रम के कथित 1200 करोड़ रुपये के कारोबारी और संपत्ति नेटवर्क पर नियंत्रण की कोई बड़ी लड़ाई छिपी है ?


इस दूसरे दावे की अभी स्वतंत्र अथवा आधिकारिक पुष्टि नहीं है. लेकिन अपराध जगत से जुड़े सूत्रों में इसे लेकर तरह- तरह की चर्चाएं चल रही हैं. सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि पुलिस ने अभी तक सार्वजनिक रूप से ऐसा कोई स्पष्ट निष्कर्ष सामने नहीं रखा है, जिससे यह निर्विवाद रूप से स्थापित हो कि निखार की हत्या का आदेश अखिलेश सिंह ने दुमका जेल से दिया था.
दिसंबर में अखिलेश के बाहर आने की चर्चा, क्या राघव के लिए बन रही थी चुनौती ?
अपराध जगत में चर्चा है कि अखिलेश सिंह के दिसंबर में जेल से बाहर आने की संभावना थी. हालांकि उसकी संभावित रिहाई की कानूनी स्थिति की आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है. इसी चर्चा के बीच एक सवाल उठाया जा रहा है- यदि अखिलेश बाहर आता तो पुराने नेटवर्क में राघव की स्थिति क्या होती ?अशोक सिंह राघव का नाम लंबे समय से अखिलेश सिंह के पुराने नेटवर्क से जुड़ता रहा है. विक्रम शर्मा की मौत के बाद उस नेटवर्क के आर्थिक और कारोबारी हितों को कौन संभाल रहा था और उन पर वास्तविक नियंत्रण किसका था, इसकी अलग से पड़ताल जरूरी है. यहीं से अपराध जगत में एक थ्योरी जन्म ले रही है- क्या राघव अखिलेश की गैरमौजूदगी में अपनी स्वतंत्र ताकत खड़ी करना चाहता था ? यह फिलहाल सवाल है, पुलिस का निष्कर्ष नहीं.
क्या अखिलेश के पुराने शूटरों का इस्तेमाल ही था सबसे बड़ा दांव ?
निखार हत्याकांड में सामने आए आरोपियों और उनके पुराने संपर्कों को लेकर भी पुलिस जांच महत्वपूर्ण हो जाती है. यदि हत्या में ऐसे लोग इस्तेमाल हुए जिनका पूर्व में अखिलेश के नेटवर्क से संबंध रहा है, तो इसके दो बिल्कुल अलग अर्थ हो सकते हैं. एक संभावना यह कि आदेश ऊपर से आया हो. दूसरी यह कि पुराने नेटवर्क से परिचित किसी दूसरे व्यक्ति ने उन्हीं संपर्कों का इस्तेमाल कर वारदात कराई हो और बाद में शक की दिशा अखिलेश की ओर मोड़ दी हो. यही वह बिंदु है जिसे पुलिस की तकनीकी और वित्तीय जांच ही साफ कर सकती है. शूटरों से किसने संपर्क किया ? पैसा किसने दिया ? रेकी किसके निर्देश पर हुई ? हथियार और वाहन किसने उपलब्ध कराए ? और वारदात से पहले तथा बाद में आरोपियों का संपर्क किससे था ? इन सवालों के जवाब ही अखिलेश की वास्तविक भूमिका तय करेंगे.
TMH से सामने आए बयान ने पलटी कहानी
पूरे घटनाक्रम में शुक्रवार का घटनाक्रम बेहद महत्वपूर्ण रहा. TMH में भर्ती राघव का एक बयान बड़े अखबार में पुलिस सूत्रों के हवाले से सामने आया, जिसमें दावा किया गया कि निखार की हत्या अखिलेश सिंह के इशारे पर कराई गई.
यहीं से सवाल और गहरे हो गए
एक गंभीर हत्याकांड में पुलिस निगरानी के बीच अस्पताल में भर्ती आरोपी का पक्ष मीडिया तक कैसे पहुंचा ? क्या यह केवल पत्रकारिता के स्तर पर हासिल की गई जानकारी थी या इसके पीछे कोई रणनीति थी ? इसकी पुष्टि हमारे पास नहीं है. लेकिन इसके बाद घटनाक्रम तेजी से बदला. शुक्रवार को राघव TMH से डिस्चार्ज हुआ, चांडिल अनुमंडल न्यायालय में पेश किया गया और न्यायिक हिरासत में सरायकेला मंडल कारा भेज दिया गया. इस दौरान जमकर ड्रामेबाजी की भी सूचनाएं मिली है.
अस्पताल में रहने को लेकर भी उठ रहे सवाल
राघव की गिरफ्तारी और पूछताछ के बाद उसकी तबीयत बिगड़ने तथा MGM से TMH पहुंचने को लेकर भी अपराध जगत में सवाल उठ रहे हैं. उसके विरोधी इसे जेल जाने से बचने की रणनीति बता रहे हैं. यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी व्यक्ति की बीमारी वास्तविक थी या नहीं, इसका फैसला मीडिया अथवा अपराध जगत की चर्चाओं से नहीं बल्कि मेडिकल रिकॉर्ड से हो सकता है. इसलिए MGM और TMH के चिकित्सकीय दस्तावेज सामने आए बिना अस्पताल में भर्ती होने को निश्चित रूप से ‘ड्रामा’ कहना तथ्यात्मक नहीं होगा. मगर जिस तरह पूरा घटनाक्रम चला, उससे सवाल जरूर पैदा हुए हैं. अब नजर इस बात पर भी रहेगी कि मंडल कारा में राघव की मेडिकल स्थिति क्या रहती है और क्या आने वाले दिनों में उसे फिर किसी अस्पताल में रेफर किया जाता है.
कोर्ट से जेल तक नहीं दिखा पुराने गैंग जैसा जमावड़ा
अपराध जगत को करीब से जानने वाले लोग एक और परिस्थिति की ओर इशारा कर रहे हैं. उनका कहना है कि पूर्व में अखिलेश सिंह नेटवर्क से जुड़े प्रमुख लोगों के जेल जाने के दौरान न्यायालय और जेल गेट के आसपास समर्थकों तथा परिचितों की मौजूदगी देखी जाती रही है. राघव के मामले में तस्वीर अलग दिखाई दी. कोर्ट से लेकर मंडल कारा तक उसकी पत्नी और एक दो लोग ही नजर आए. हालांकि सिर्फ समर्थकों की कम मौजूदगी से यह साबित नहीं किया जा सकता कि हत्या अखिलेश के इशारे पर नहीं हुई. यह परिस्थितिजन्य संकेत हो सकता है, सबूत नहीं. इसलिए अखिलेश की भूमिका को न अभी स्थापित करना उचित होगा और न पूरी तरह खारिज करना.
असली जवाब सिंटू और शिबू से मिल सकता है
अब इस कहानी में दो नाम बेहद महत्वपूर्ण हैं- अभिमन्यु सिंह उर्फ सिंटू और शूटर शिबू. उपलब्ध जानकारी के अनुसार दोनों की भूमिका की जांच महत्वपूर्ण है. सूत्रों का दावा है कि सिंटू को मध्य प्रदेश में पकड़ लिया गया है, लेकिन इसकी आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है. शिबू को लेकर भी पुलिस की कार्रवाई पर निगाह है. इनसे पूछताछ, कॉल डिटेल, डिजिटल कम्युनिकेशन और पैसे की ट्रेल शायद इस सवाल का सबसे ठोस जवाब दे सके- आदेश आखिर आया कहां से था ?
1200 करोड़ के कथित नेटवर्क की भी हो जांच
यदि विक्रम शर्मा और अखिलेश सिंह से जुड़े करीब 1200 करोड़ रुपये के कथित नेटवर्क की चर्चा में तथ्य हैं, तो पुलिस के लिए निखार हत्याकांड से अलग उस आर्थिक साम्राज्य की तह तक जाना भी महत्वपूर्ण होगा. संपत्तियां किसके नाम हैं ? कारोबार कौन संभाल रहा है ? विक्रम की मौत के बाद नियंत्रण किसके हाथ गया ? और क्या निखार हत्याकांड का उससे कोई आर्थिक संबंध था ? फिलहाल इन सवालों के जवाब आधिकारिक जांच से सामने नहीं आए हैं. हां कथित तौर पर विक्रम शर्मा की हत्या के बाद अशोक सिंह राघव ही उसका साम्राज्य देख़ रहा था.
राघव जेल में, मगर सबसे बड़ा सवाल अब भी जिंदा
निखार सबलोक की हत्या की कहानी अब केवल शूटर और सुपारी तक सीमित नहीं दिखाई दे रही. इसके पीछे जमीन कारोबार, आपराधिक वर्चस्व, पुराने गैंग के संबंध और संभावित आर्थिक हितों की कई परतों की चर्चा है. फिलहाल एक बात स्पष्ट है- अखिलेश सिंह की भूमिका पर अंतिम निष्कर्ष पुलिस की जांच और साक्ष्यों से ही निकलेगा. राघव के कथित बयान को ही अंतिम सच मान लेना उतना ही जल्दबाजी होगी, जितना बिना जांच के अखिलेश को पूरी तरह क्लीन चिट देना. अब नजर सिंटू और शिबू, पैसे की ट्रेल, कॉल रिकॉर्ड और पुलिस की अगली आधिकारिक कार्रवाई पर है. इन्हीं कड़ियों से तय होगा कि निखार की हत्या का रिमोट दुमका जेल में था या राघव ने अखिलेश के पुराने नेटवर्क और उसके लोगों का इस्तेमाल कर अपनी कोई अलग बिसात बिछाई थी.

