जामताड़ा: देश में मौलिक भूमि सुधार लागू किए बिना कृषि संकट का स्थायी समाधान संभव नहीं है. शुक्रवार को जामताड़ा में CPI(M) के राज्य स्तरीय दो दिवसीय शिक्षण शिविर में ‘कृषि संकट और खाद्य सुरक्षा’ विषय पर बोलते हुए किसान नेता हन्नान मोल्ला ने यह बात कही. भूमि सुधार लंबे समय से CPI(M) की घोषित नीतियों में शामिल रहा है और पार्टी भूमि सीमा कानूनों को प्रभावी बनाने तथा अतिरिक्त भूमि भूमिहीनों में बांटने की वकालत करती रही है.


मोल्ला ने कहा कि ब्रिटिश शासन के दौरान बनी भूमि व्यवस्था में जमींदारों का प्रभाव बढ़ा और किसानों तथा रैयतों से लगान वसूला जाता था. उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौर से ही किसान संगठनों ने जमींदारी प्रथा समाप्त करने और किसानों को भूमि अधिकार देने की मांग उठाई.

उन्होंने आरोप लगाया कि आजादी के बाद जमींदारी उन्मूलन और भूमि सीमा कानून लागू होने के बावजूद कानूनों की कमियों का लाभ उठाकर बड़े भू-स्वामियों का प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ. इसी कारण मौलिक भूमि सुधार का लक्ष्य अधूरा रह गया. भूमि सुधार को लेकर CPI(M) के आधिकारिक दस्तावेजों में भी इसी तरह का दृष्टिकोण दर्ज है.
केंद्र की कृषि नीतियों पर साधा निशाना
कृषि संकट पर चर्चा करते हुए मोल्ला ने केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना की. उन्होंने कहा कि देश की बड़ी आबादी आज भी खेती- किसानी और खेत मजदूरी पर निर्भर है. उन्होंने दावा किया कि करीब 30 करोड़ लोग भूमिहीन खेत मजदूर हैं. इस संख्या की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध स्रोतों से नहीं हो सकी है, इसलिए इसे उनका दावा माना जाना चाहिए.
मोल्ला ने तीन कृषि कानूनों के खिलाफ हुए किसान आंदोलन का भी उल्लेख किया और कहा कि लंबे आंदोलन के बाद केंद्र सरकार को तीनों कानून वापस लेने पड़े. उन्होंने आरोप लगाया कि कृषि उत्पादन और खाद्यान्न भंडारण में कॉरपोरेट क्षेत्र की बढ़ती भूमिका किसानों तथा खाद्य सुरक्षा के हित में नहीं है.
उन्होंने भारतीय खाद्य निगम (FCI) की भूमिका मजबूत रखने पर जोर देते हुए आशंका जताई कि खाद्यान्न भंडारण में निजी कंपनियों की भूमिका बढ़ने से बाजार और कीमतों पर उनका प्रभाव बढ़ सकता है. कॉरपोरेट भागीदारी को लेकर केंद्र सरकार और उसके समर्थकों का तर्क अलग रहा है कि निजी निवेश से कृषि आपूर्ति शृंखला, भंडारण और बाजार तक किसानों की पहुंच बेहतर हो सकती है.
मनरेगा को लेकर भी उठाए सवाल
हन्नान मोल्ला ने मनरेगा की नीतियों को लेकर भी केंद्र सरकार की आलोचना की. उन्होंने कहा कि ग्रामीण गरीबों के लिए रोजगार उपलब्ध कराने में मनरेगा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है और ऐसी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए जिससे रोजगार के अवसर कम हों या राज्यों पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव पड़े. उन्होंने किसानों और खेत मजदूरों से अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर संघर्ष करने का आह्वान किया.
गांधी जयंती पर महात्मा गांधी को किया याद
शिक्षण शिविर की शुरुआत पार्टी का झंडा फहराने के साथ हुई. गांधी जयंती के अवसर पर महात्मा गांधी के स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान को याद किया गया. आयोजन समिति के संयोजक सुजीत मांझी के स्वागत वक्तव्य के बाद शिक्षा उपसमिति के संयोजक डॉ. काशीनाथ चटर्जी ने दो दिवसीय शिविर की रूपरेखा और विषयों की जानकारी दी. पार्टी के राज्य सचिव प्रकाश विप्लव और शिक्षा उपसमिति के प्रभारी समीर दास ने भी संबोधित किया.
इसके बाद हन्नान मोल्ला ने ‘कृषि संकट और खाद्य सुरक्षा’ विषय पर कक्षा ली, जिसकी अध्यक्षता सुरजीत सिन्हा ने की. दूसरे सत्र के लिए ‘नवउदारवाद के दौर में बदलते रोजगार का परिदृश्य’ विषय निर्धारित किया गया, जिसमें डॉ. विक्रम सिंह को संबोधित करना है. आयोजकों के अनुसार शिविर में पार्टी के 35 राज्य कमेटी सदस्य, 22 जिला सचिव और विभिन्न जनसंगठनों के 21 नेतृत्वकारी प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं.
रिपोर्ट: मनीष बर्णवाल

