जमशेदपुर: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा ने डोबो, कपाली और आसपास के अनुसूचित क्षेत्रों में कृषि भूमि के बदलते स्वरूप, तेजी से हो रहे बहुमंजिला निर्माण तथा नदी किनारे विकास कार्यों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं. सोमवार को जमशेदपुर के निर्मल गेस्ट हाउस में आयोजित प्रेस वार्ता में उन्होंने आरोप लगाया कि अनुसूचित क्षेत्रों को प्राप्त संवैधानिक संरक्षण और पांचवीं अनुसूची की मूल भावना की अनदेखी की जा रही है.


अर्जुन मुंडा ने कहा कि अनुसूचित क्षेत्रों में जमीन से जुड़े मामलों को केवल राजस्व और निबंधन की सामान्य प्रक्रिया मानकर नहीं देखा जा सकता. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act), संविधान की पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जमीन के उपयोग में बदलाव करते समय संवैधानिक प्रावधानों के साथ स्थानीय सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था को भी ध्यान में रखना जरूरी है.
डोबो में बहुमंजिला इमारतों पर उठाए सवाल
पूर्व मुख्यमंत्री ने डोबो का उदाहरण देते हुए कहा कि पंचायती क्षेत्र में लगातार बहुमंजिला इमारतें बन रही हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि केवल जमीन के गैर- आदिवासी स्वामित्व के आधार पर बड़े निर्माण की अनुमति कैसे दी जा सकती है.
उनका कहना था कि अनुसूचित क्षेत्र में भूमि उपयोग से जुड़ा निर्णय लेते समय जमीन के मालिकाना स्वरूप के साथ पांचवीं अनुसूची के उद्देश्य, स्थानीय व्यवस्था और जनसंख्या के सामाजिक संतुलन को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए.
कृषि भूमि का स्वरूप कैसे बदल रहा, इसकी हो जांच
अर्जुन मुंडा ने कृषि भूमि की निबंधन प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि कृषि भूमि की रजिस्ट्री कृषि भूमि के रूप में ही होनी चाहिए. यदि बाद में जमीन का व्यावसायिक, औद्योगिक या अन्य उपयोग किया जाता है तो उसके लिए नियमानुसार सक्षम प्राधिकारी से अलग अनुमति ली जानी चाहिए. उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ मामलों में कृषि भूमि के स्वरूप में बदलाव की प्रक्रिया सवालों के घेरे में है. ऐसे मामलों में पूर्व में दी गई अनुमतियों और स्वीकृतियों की समीक्षा होनी चाहिए. नियमों का उल्लंघन मिलने पर जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए.
कपाली के परिसीमन पर भी उठाया सवाल
अर्जुन मुंडा ने कपाली के पंचायती क्षेत्रों के शहरी क्षेत्र में शामिल होने और अनुसूचित क्षेत्र की सीमाओं से जुड़े विषय पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि अनुसूचित क्षेत्रों के सीमांकन में किसी प्रकार की त्रुटि का असर भविष्य के परिसीमन के साथ अनुसूचित समुदायों के संवैधानिक अधिकार और प्रतिनिधित्व पर पड़ सकता है. उन्होंने कहा कि अनुसूचित क्षेत्र के संरक्षण का अर्थ केवल जमीन की सुरक्षा नहीं है, बल्कि वहां की सामाजिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक व्यवस्था को संरक्षित रखना भी इसका महत्वपूर्ण उद्देश्य है.
सरकार श्वेत पत्र जारी कर बताए- किसने और किस आधार पर दी अनुमति
अर्जुन मुंडा ने राज्य सरकार से डोबो-कपाली समेत अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि उपयोग परिवर्तन, कृषि भूमि के बदलते स्वरूप और बड़े भवनों के निर्माण से जुड़े मामलों पर श्वेत पत्र जारी करने की मांग की. उन्होंने कहा कि सरकार को सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि कहां-कहां भूमि उपयोग में परिवर्तन हुआ, किस अधिकारी या सक्षम प्राधिकारी ने किस आधार पर अनुमति दी और नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर क्या कार्रवाई की गई.
दलमा और हाथी कॉरिडोर को लेकर भी जताई चिंता
पूर्व मुख्यमंत्री ने दलमा क्षेत्र में बढ़ते निर्माण को वन्यजीवों के प्राकृतिक आवागमन से जोड़ते हुए भी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि दलमा हाथियों के आवागमन की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र है. आसपास तेजी से बढ़ते निर्माण और कृषि भूमि के व्यावसायिक उपयोग का प्रभाव वन्यजीवों के प्राकृतिक मार्ग पर पड़ सकता है.
उन्होंने आशंका जताई कि प्राकृतिक आवागमन मार्ग प्रभावित होने की स्थिति में भविष्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष की समस्या और गंभीर हो सकती है. इसलिए विकास और निर्माण की अनुमति देते समय पर्यावरणीय पहलुओं की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए.
स्वर्णरेखा- खरकई नदी किनारे निर्माण की हो तकनीकी जांच
अर्जुन मुंडा ने स्वर्णरेखा और खरकई नदी के आसपास हो रहे निर्माण को लेकर भी जांच की मांग की. उन्होंने कहा कि नदी के पुराने बाढ़ स्तर और प्राकृतिक जल प्रवाह क्षेत्र को ध्यान में रखे बिना यदि निर्माण की अनुमति दी गई है तो इसकी तकनीकी और पर्यावरणीय जांच जरूरी है.
उन्होंने कहा कि नदी के प्राकृतिक क्षेत्र में अतिक्रमण या अनियोजित निर्माण भविष्य में भारी बारिश अथवा जलाशयों से बड़ी मात्रा में पानी छोड़े जाने की स्थिति में गंभीर खतरा पैदा कर सकता है.
आदिवासी आबादी की वर्तमान स्थिति भी बताए सरकार
अर्जुन मुंडा ने अनुसूचित क्षेत्रों में आबादी के बदलते स्वरूप को भी मुद्दा बनाया. उन्होंने कहा कि सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि इन क्षेत्रों में आदिवासी आबादी की वर्तमान स्थिति क्या है और समय के साथ उसमें किस तरह का बदलाव आया है.
उनका कहना था कि भूमि उपयोग परिवर्तन, अनियोजित निर्माण और जनसंख्या के स्वरूप में बदलाव का प्रभाव भविष्य के परिसीमन, स्थानीय प्रतिनिधित्व और अनुसूचित क्षेत्रों की स्थिति पर भी पड़ सकता है.
विकास का विरोध नहीं, नियमों का पालन जरूरी
अर्जुन मुंडा ने कहा कि वे विकास, उद्योग या निवेश के विरोधी नहीं हैं. विकास जरूरी है, लेकिन इसे संविधान, कानून और पर्यावरणीय प्रावधानों के अनुरूप आगे बढ़ाया जाना चाहिए.
उन्होंने राज्य सरकार से भूमि उपयोग परिवर्तन, नदी क्षेत्र में निर्माण और अनुसूचित क्षेत्रों से जुड़े मामलों की समग्र समीक्षा कराने की मांग करते हुए कहा कि सरकार को इस विषय पर पारदर्शी नीति सामने लानी चाहिए. प्रेस वार्ता में भाजपा जमशेदपुर महानगर अध्यक्ष संजीव सिन्हा, जिला महामंत्री राजीव सिंह, जितेंद्र राय और जिला मीडिया प्रभारी प्रेम झा भी मौजूद थे.

