जमशेदपुर: क्या जमशेदपुर विद्युत क्षेत्र में डिपॉजिट हेड से कराए जा रहे करोड़ों रुपये के बिजली कार्यों में नियमों की अनदेखी हुई है ? चाईबासा मेडिकल कॉलेज और जादूगोड़ा स्थित CRPF कैंप को बिजली उपलब्ध कराने से जुड़ी दो बड़ी परियोजनाओं को लेकर सामने आए आरोपों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. आरोप सीधे परियोजनाओं की स्वीकृति, टेंडर प्रक्रिया, तकनीकी स्पेसिफिकेशन, सामग्री की खरीद और अधिकारियों के वित्तीय अधिकार से जुड़े हैं.


मामले में जमशेदपुर विद्युत क्षेत्र के महाप्रबंधक अजीत कुमार और कार्यालय से जुड़े कार्यपालक अभियंता आदित्य नारायण की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं. इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय तकनीकी और वित्तीय जांच कराने की जरूरत है. हालांकि अभी तक किसी सक्षम जांच एजेंसी, ऑडिट या विभागीय जांच में इन आरोपों की पुष्टि होने की जानकारी सामने नहीं आई है.
पहला सवाल: 5.68 करोड़ के मेडिकल कॉलेज प्रोजेक्ट में बदली गई केबल की शर्त ?
आरोपों के केंद्र में चाईबासा मेडिकल कॉलेज को बिजली उपलब्ध कराने की करीब 5.68 करोड़ रुपये की परियोजना है. दावा है कि 220/132/33 केवी ग्रिड से मेडिकल कॉलेज तक 33 केवी डेडिकेटेड फीडर और भूमिगत केबलिंग की व्यवस्था के लिए आकलन तैयार किया गया था. सूत्रों का दावा है कि मूल तकनीकी प्रावधान में कुछ निर्धारित कंपनियों के केबल का उल्लेख था, लेकिन बाद की खरीद में दूसरी कंपनी के केबल को शामिल किया गया.
यहीं पहला बड़ा सवाल खड़ा होता है. यदि मूल तकनीकी स्पेसिफिकेशन में बदलाव हुआ तो उसे किस अधिकारी ने मंजूरी दी ? क्या सक्षम प्राधिकारी की लिखित स्वीकृति ली गई ? और जिस संस्था ने डिपॉजिट राशि उपलब्ध कराई, उसे बदलाव की जानकारी दी गई थी या नहीं ? इन सवालों का जवाब मूल Estimate, BOQ, Technical Specification, Tender Document और संशोधित स्वीकृति से सामने आ सकता है.
दूसरा सवाल: टेंडर के लिए पर्याप्त समय मिला या प्रक्रिया जल्दबाजी में हुई ?
आरोप है कि मेडिकल कॉलेज परियोजना की निविदा प्रक्रिया के लिए बेहद कम समय दिया गया. सूत्रों का दावा है कि इससे अधिक कंपनियों के प्रतिस्पर्धा में शामिल होने की संभावना प्रभावित हुई. लेकिन केवल कम अवधि का आरोप अपने आप में अनियमितता साबित नहीं करता. यह देखना जरूरी होगा कि उस समय लागू खरीद एवं निविदा नियमों के अनुसार इस मूल्य की निविदा के लिए न्यूनतम कितनी अवधि निर्धारित थी और क्या किसी विशेष परिस्थिति में अवधि कम करने का प्रावधान था. यदि अवधि कम की गई थी तो उसके लिए सक्षम अधिकारी की अनुमति और रिकॉर्ड पर दर्ज कारण इस सवाल का महत्वपूर्ण जवाब होंगे.
तीसरा सवाल: 11.32 करोड़ के CRPF प्रोजेक्ट की स्वीकृति का अधिकार किसके पास ?
दूसरा बड़ा मामला जादूगोड़ा स्थित CRPF कैंप को निर्बाध बिजली उपलब्ध कराने से जुड़ी करीब 11.32 करोड़ रुपये की डिपॉजिट हेड परियोजना का बताया जा रहा है. आरोप है कि इतनी बड़ी परियोजना की प्रशासनिक अथवा तकनीकी स्वीकृति का अधिकार जमशेदपुर स्तर पर नहीं था और इसे सक्षम उच्च अधिकारी के पास भेजा जाना चाहिए था. सूत्रों के अनुसार परियोजना को अलग- अलग हिस्सों में बांटकर प्रक्रिया आगे बढ़ाने का भी आरोप लगाया है. साथ ही एक सिविल इंजीनियरिंग अधिकारी की इलेक्ट्रिकल कार्य से संबंधित आकलन में भूमिका पर सवाल उठाया गया है.
यह आरोप दस्तावेजी जांच की मांग करता है. Delegation of Financial Powers और उस समय लागू विभागीय आदेश से ही तय होगा कि किस स्तर के अधिकारी को कितनी राशि तक Estimate, Tender अथवा Work Order की स्वीकृति देने का अधिकार था. यदि स्वीकृति सक्षम अधिकारी से ली गई है तो आरोप का एक महत्वपूर्ण हिस्सा स्वतः स्पष्ट हो जाएगा. यदि नहीं ली गई तो विभाग को इसका कारण बताना होगा.
चौथा सवाल: केबल की गुणवत्ता पर संदेह, मगर टेस्ट रिपोर्ट कहां है ?
सबसे गंभीर आरोप खरीदे गए केबल की गुणवत्ता को लेकर है. सूत्रों ने केबल में इस्तेमाल एल्युमिनियम की गुणवत्ता और निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुपालन पर सवाल उठाया है. मगर यहां तथ्य और आरोप को अलग रखना जरूरी है. जब तक Manufacturer Test Certificate, Type Test Report, Inspection Report, Material Receipt Report या स्वतंत्र लैब जांच सामने नहीं आती, तब तक संबंधित केबल को घटिया अथवा मिलावटी घोषित करना उचित नहीं होगा. जांच का विषय यह जरूर हो सकता है कि खरीदी गई सामग्री स्वीकृत Technical Specification और JBVNL के लागू मानकों के अनुरूप थी या नहीं.
2.86 करोड़ और 3.5 से 4.5 करोड़ की गड़बड़ी का दावा कितना सही ?
सूत्रों ने मेडिकल कॉलेज परियोजना में करीब 2.86 करोड़ रुपये तथा CRPF परियोजना में करीब 3.5 से 4.5 करोड़ रुपये तक की कथित वित्तीय गड़बड़ी का दावा किया गया है. लेकिन ये आंकड़े अभी आरोप लगाने वाले पक्ष के हैं. किसी ऑडिट, सतर्कता जांच अथवा सक्षम एजेंसी ने इन राशियों को सरकारी नुकसान के रूप में प्रमाणित किया हो, ऐसी जानकारी फिलहाल उपलब्ध नहीं है. वास्तविक तस्वीर जानने के लिए स्वीकृत Estimate और BOQ की तुलना Purchase Order, Comparative Statement, संबंधित अवधि के Cost Data, खरीदी गई वास्तविक मात्रा और भुगतान रिकॉर्ड से करनी होगी.
इन दस्तावेजों के सामने आते ही साफ हो सकती है पूरी तस्वीर
इस पूरे मामले की सच्चाई कुछ मूल दस्तावेजों में छिपी है जैसे- मूल और संशोधित Estimate, BOQ, NIT, Technical Specification, Bid Comparative Statement, Administrative Approval, Technical Sanction, Purchase/Work Order, Delegation of Financial Powers, JBVNL Cost Data, Material Inspection/Test Report और भुगतान से संबंधित रिकॉर्ड. इन्हीं दस्तावेजों से पता चलेगा कि नियम टूटे या नहीं, स्पेसिफिकेशन किसके आदेश पर बदला गया, वित्तीय अधिकार किस अधिकारी के पास था और खरीदी गई सामग्री निर्धारित मानकों पर खरी उतरी या नहीं.
विभाग का जवाब सबसे अहम
आरोप गंभीर हैं, लेकिन आरोपों की गंभीरता ही भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं होती. इस मामले में JBVNL, संबंधित महाप्रबंधक और कार्यपालक अभियंता का पक्ष सामने आना बेहद जरूरी है. विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि दोनों परियोजनाओं में किस स्तर से तकनीकी और प्रशासनिक स्वीकृति मिली, निविदा की अवधि किन नियमों के तहत निर्धारित हुई, केबल की कंपनी अथवा तकनीकी शर्त में बदलाव हुआ तो किसकी अनुमति से हुआ और सामग्री को स्वीकार करने से पहले कौन- कौन से गुणवत्ता परीक्षण किए गए. इन सवालों के दस्तावेजी जवाब ही तय करेंगे कि करोड़ों की इन परियोजनाओं में वास्तव में कोई वित्तीय अथवा प्रक्रियागत अनियमितता हुई या पूरी प्रक्रिया नियमों के तहत पूरी की गई. फिलहाल मामला आरोप और सवालों के दायरे में है, लेकिन रकम और परियोजनाओं की प्रकृति को देखते हुए निष्पक्ष तकनीकी एवं वित्तीय जांच की मांग को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा.
संतोष कुमार

