सरायकेला: सरायकेला- खरसावां जिले में सड़क सुरक्षा और यातायात व्यवस्था को लेकर बैठकें होती हैं. अभियान चलते हैं. नियम तोड़ने वाले वाहनों से जुर्माना भी वसूला जाता है. लेकिन सवाल है कि क्या सड़क सुरक्षा का मतलब केवल चालान काटना है ? जिले की प्रमुख सड़कों की मौजूदा स्थिति देखें तो ट्रैफिक पुलिस और परिवहन विभाग की सक्रियता जमीन से ज्यादा कागजों पर दिखाई देती है. जर्जर सड़क, अवैध पार्किंग, जाम और अव्यवस्थित यातायात के बीच हर दिन हजारों लोगों को जोखिम उठाकर सफर करना पड़ रहा है.


सरायकेला- राजनगर मार्ग हो या टाटा- कांड्रा- सरायकेला- चाईबासा मार्ग. कांड्रा- चौका और कांड्रा- चांडिल मार्ग की स्थिति भी राहगीरों के लिए परेशानी बनी हुई है. कहीं सड़क खराब है तो कहीं मुख्य सड़क के किनारे खड़े भारी वाहन यातायात को प्रभावित कर रहे हैं. नतीजा यह है कि सामान्य तौर पर 30 से 35 किलोमीटर की दूरी भी कई बार घंटों के सफर में बदल जाती है.

विडंबना यह है कि सड़क सुरक्षा समिति की बैठकों में दुर्घटनाओं को रोकने और यातायात व्यवस्था सुधारने को लेकर निर्णय लिए जाते हैं, लेकिन सड़क पर उनका अपेक्षित प्रभाव नजर नहीं आता. वाहन जांच और जुर्माना जरूरी है, मगर खराब सड़क, ब्लैक स्पॉट, अवैध पार्किंग और ट्रैफिक प्रबंधन जैसी बुनियादी समस्याओं का समाधान किए बिना सड़क सुरक्षा का उद्देश्य कैसे पूरा होगा ?
लाल बिल्डिंग से पान दुकान चौक तक हर दिन जद्दोजहद
सबसे गंभीर तस्वीर टाटा- कांड्रा मार्ग पर लाल बिल्डिंग चौक से पान दुकान चौक के बीच दिखाई देती है. सुबह करीब सात बजे से रात आठ बजे तक इस हिस्से में यातायात का दबाव बना रहता है. कई बार स्थिति ऐसी हो जाती है कि वाहन दौड़ने के बजाय रेंगते नजर आते हैं.

इस जाम में केवल निजी वाहन चालक नहीं फंसते. स्कूल जाने वाले छोटे बच्चे, औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले मजदूर, कर्मचारी, व्यवसायी और आम राहगीर हर दिन इस समस्या से दो- चार होते हैं. पर्याप्त ट्रैफिक प्रबंधन और भारी वाहनों के आवागमन को व्यवस्थित करने की ठोस व्यवस्था के अभाव का सीधा असर आम लोगों पर पड़ रहा है. सड़क किनारे अव्यवस्थित और कथित अवैध पार्किंग समस्या को और गंभीर बनाती है. सड़क की प्रभावी चौड़ाई कम होने से जाम के साथ दुर्घटना का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में सवाल उठता है कि यातायात व्यवस्था सुधारने के लिए केवल वाहन चालकों पर जुर्माना पर्याप्त कैसे माना जा सकता है ?
हादसों में जा रही जान, फिर जिम्मेदारी किसकी ?
जिले में लगातार होने वाली सड़क दुर्घटनाएं चिंता बढ़ा रही हैं. लगभग हर तीसरे- चौथे दिन सड़क दुर्घटना में किसी की जान जाने जैसी स्थिति यदि बनी हुई है तो सड़क सुरक्षा व्यवस्था की प्रभावशीलता की गंभीर समीक्षा जरूरी है. दुर्घटना के बाद वाहन जांच और कार्रवाई अपनी जगह है, लेकिन दुर्घटना होने से पहले जोखिम कम करना भी प्रशासन और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी है.

खराब सड़क, सड़क किनारे भारी वाहनों की पार्किंग, अतिक्रमण, यातायात का अत्यधिक दबाव और कमजोर ट्रैफिक नियंत्रण जैसे कारणों की पहचान कर उनका स्थायी समाधान जरूरी है.
तीन विधायक, तीन सांसद; फिर भी ‘लाइफलाइन’ को इंतजार
सरायकेला- खरसावां की राजनीतिक नुमाइंदगी भी कम नहीं है. जिले से प्रत्यक्ष अथवा संसदीय क्षेत्र के स्तर पर तीन विधायक और तीन सांसद जुड़े हैं. ग्रामीण क्षेत्रों की सड़कों के लिए योजनाएं और घोषणाएं सामने आती रहती हैं, मगर कोल्हान की ‘लाइफलाइन’ माने जाने वाले प्रमुख मार्गों की दुर्दशा का स्थायी समाधान अब भी इंतजार में है. प्रशासन की ओर से संबंधित विभाग और सरकार के साथ पत्राचार किए जाने की बात कही जाती रही है. मगर आम आदमी का सवाल सीधा है- पत्राचार आखिर कब तक ? सड़क पर चलने वाला व्यक्ति फाइल की प्रगति नहीं, सुरक्षित और सुगम सड़क चाहता है.
कार्रवाई हुई तो राजनीतिक हस्तक्षेप का सवाल
अवैध पार्किंग के खिलाफ प्रशासनिक अभियान भी कई बार विवाद और राजनीतिक दबाव के बीच उलझ जाता है. कार्रवाई शुरू होने पर जनप्रतिनिधियों के विरोध में उतरने की स्थिति पैदा होती है. जनहित और आजीविका से जुड़े सवाल अपनी जगह हैं, लेकिन सड़क पर सुरक्षित आवागमन सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है. प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को इसका व्यावहारिक और स्थायी रास्ता निकालना होगा.
मुद्दा किसी एक विभाग को कठघरे में खड़ा करने का नहीं है. सड़क निर्माण और रखरखाव से जुड़े विभाग, जिला प्रशासन, परिवहन विभाग, ट्रैफिक पुलिस और जनप्रतिनिधियों को साझा जवाबदेही तय करनी होगी. सड़क सुरक्षा की सफलता चालान की संख्या या वसूले गए जुर्माने से नहीं, बल्कि कम होते हादसों, सुगम यातायात और सुरक्षित घर लौटते लोगों से मापी जानी चाहिए. सरायकेला- खरसावां की जनता का सवाल बस इतना है- आखिर कब तक लोग खराब सड़कों और बदहाल ट्रैफिक व्यवस्था के बीच अपनी जान जोखिम में डालकर सफर करते रहेंगे ?

