सरायकेला: खेतों में लहलहाती नई फसल और भगवान के चरणों में पहली उपज अर्पित करने की परंपरा. सरायकेला के कुदरसाही मंदिर में इस आस्था और ग्रामीण संस्कृति का अनूठा संगम देखने को मिला. बाबा बुद्धेश्वर भोलेनाथ का इस बार नए धान की बालियों से ऐसा अलौकिक श्रृंगार किया गया कि मंदिर परिसर भक्ति के साथ खेत की खुशबू से भी महक उठा.


सुनहरी धान की बालियों से सजे बाबा बुद्धेश्वर का दिव्य स्वरूप श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना रहा. दर्शन के लिए मंदिर पहुंचे लोगों ने इसे केवल भगवान के श्रृंगार के रूप में नहीं, बल्कि धरती, किसान और नई फसल के प्रति सम्मान की सुंदर अभिव्यक्ति बताया.
बाबा बुद्धेश्वर के इस विशेष श्रृंगार की व्यवस्था जामवंती डेयरी के संचालक सह समाजसेवी राजेश साहू ने कराई. राजेश साहू पिछले कई वर्षों से बाबा बुद्धेश्वर का अलग-अलग रूपों और सामग्रियों से श्रृंगार कराते आ रहे हैं. प्रतिदिन बाबा के नए और आकर्षक स्वरूप के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ मंदिर पहुंचती है.
इस बार श्रृंगार में इस्तेमाल की गई धान की बालियां विशेष थीं. ये नई फसल जामवंती डेयरी परिसर में ही उगाई गई थी. खेत की पहली उपज को भगवान के चरणों में अर्पित करने की भावना ने इस श्रृंगार को और खास बना दिया.
“यह सिर्फ श्रृंगार नहीं, बाबा के चरणों में खेत की पहली भेंट है”
राजेश साहू ने कहा कि बाबा बुद्धेश्वर के प्रति उनकी आस्था वर्षों पुरानी है. हर दिन बाबा का अलग-अलग तरीके से श्रृंगार कराने का उद्देश्य श्रद्धालुओं को भोलेनाथ के अलग-अलग दिव्य स्वरूपों के दर्शन का अवसर देना है.
उन्होंने कहा कि इस बार बाबा का श्रृंगार जामवंती डेयरी परिसर में उगाई गई नई धान की बालियों से किया गया है. खेत की पहली फसल भगवान के चरणों में अर्पित करना उनके लिए सौभाग्य की बात है. उन्होंने कहा कि यह श्रृंगार केवल सजावट नहीं, बल्कि बाबा के प्रति श्रद्धा, प्रकृति के प्रति सम्मान और अन्नदाता के प्रति आभार की अभिव्यक्ति है.
धान की सुनहरी बालियों से सजे बाबा बुद्धेश्वर के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती रही. मंदिर पहुंचे लोगों ने इस अनूठे श्रृंगार को आस्था और ग्रामीण जीवन के सुंदर मेल के रूप में देखा.
बाबा के श्रृंगार में इस बार फूलों और पारंपरिक सजावट के साथ खेत की मिट्टी और नई फसल की महक भी शामिल थी. यही वजह रही कि धान की बालियों से सजा बाबा बुद्धेश्वर का यह स्वरूप श्रद्धालुओं के लिए केवल दर्शन का विषय नहीं, बल्कि लंबे समय तक याद रहने वाला अनुभव बन गया.
प्रमोद सिंह (संपादक)

