रांची: जिस परीक्षा की तैयारी में अभ्यर्थियों ने वर्षों लगा दिए. कई ने नौकरी छोड़ी, कई ने परिवार और निजी जिम्मेदारियों से समझौता किया और जब सफलता मिली तो लगा कि संघर्ष का दौर खत्म हो गया. लेकिन जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा रद्द किए जाने के फैसले ने सफल अभ्यर्थियों की यह खुशी फिर अनिश्चितता में बदल दी.


सोमवार को जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में छात्रों के आंदोलन के बीच सरकार ने जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा रद्द करने का फैसला लिया. निर्णय की जानकारी मिलते ही परीक्षा में सफल अभ्यर्थियों का आक्रोश राजधानी की सड़कों पर दिखाई देने लगा. सचिवालय के पास जुटे सफल अभ्यर्थियों ने सरकार के फैसले का विरोध करते हुए कहा कि परीक्षा में यदि गड़बड़ी हुई है तो दोषियों को सजा दी जाए, लेकिन ईमानदारी से परीक्षा पास करने वालों को इसकी कीमत क्यों चुकानी पड़े.
प्रदर्शन के दौरान कई सफल अभ्यर्थी भावुक होकर फूट-फूटकर रोने लगे. किसी के हाथ में नियुक्ति की उम्मीद थी तो किसी ने बेहतर भविष्य के लिए अपनी पुरानी नौकरी तक छोड़ दी थी. एक सफल अभ्यर्थी ने बताया कि उसने जेएसएससी-सीजीएल की तैयारी के लिए रेलवे की नौकरी छोड़ दी थी. परीक्षा में सफलता मिली और सहायक प्रशाखा पदाधिकारी के पद पर नौकरी का रास्ता खुला, लेकिन अब परीक्षा रद्द होने के बाद वही भविष्य फिर सवालों के घेरे में है.
सवाल सिर्फ परीक्षा का नहीं, सफल अभ्यर्थियों के भविष्य का भी है
अभ्यर्थियों का तर्क है कि यदि परीक्षा प्रक्रिया में अनियमितता या गड़बड़ी हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए. लेकिन पूरी परीक्षा रद्द होने से उन अभ्यर्थियों पर भी संकट आ गया है, जिन्होंने बिना किसी गड़बड़ी के अपनी मेहनत और योग्यता के आधार पर सफलता हासिल की.
एक ओर परीक्षा में कथित गड़बड़ी को लेकर आंदोलन कर रहे छात्र न्याय की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सफल अभ्यर्थी परीक्षा रद्द किए जाने के फैसले को अपने भविष्य के साथ अन्याय बता रहे हैं. यानी सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है—परीक्षा प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखना और उन अभ्यर्थियों के भविष्य की रक्षा करना, जिन्होंने इसी परीक्षा के परिणाम के आधार पर अपने जीवन के अगले चरण की योजना बनाई थी.
सफल अभ्यर्थियों के आंसू इसी असमंजस की तस्वीर हैं. उनके सामने सवाल है कि उनकी मेहनत का क्या होगा. नियुक्ति का क्या होगा. और सबसे बड़ा सवाल यह कि यदि गलती व्यवस्था की थी तो उसकी सजा अभ्यर्थियों को क्यों मिले. आंदोलन के दौरान अभ्यर्थियों ने “न्याय दो या फांसी दो” जैसे नारे लगाते हुए सरकार से अपने भविष्य को लेकर तत्काल स्पष्ट निर्णय लेने की मांग की.

