सरायकेला: झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) की सरायकेला- खरसावां जिला कार्यसमिति की रविवार की बैठक केवल एक संगठनात्मक बैठक नहीं थी, बल्कि इसने पार्टी के भीतर चल रही राजनीतिक हलचलों को भी नया संदेश दिया. पिछले कुछ दिनों से प्रो. केपी सोरेन के पार्टी में प्रवेश और उनकी भूमिका को लेकर जिस तरह की खींचतान सामने आई थी, उसके बाद रविवार की बैठक ने कई सवालों के जवाब देने की कोशिश की.



कुछ दिन पहले सांसद सह पार्टी महासचिव जोबा माझी की मौजूदगी में प्रो. केपी सोरेन के झामुमो में शामिल होने उसके बाद श्री सोरेन के आवास पर हुए कार्यक्रम पर जिला अध्यक्ष शुभेंदु महतो ने सार्वजनिक रूप से नाराजगी जताई थी. इससे यह संकेत मिला था कि जिले में संगठनात्मक समन्वय को लेकर मतभेद मौजूद हैं. राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी शुरू हो गई थी कि पार्टी के भीतर अलग-अलग शक्ति केंद्र उभर रहे हैं.
ऐसे माहौल में रविवार को राजनगर के बाघराईसाईं में आयोजित जिला कार्यसमिति की बैठक में जिला अध्यक्ष शुभेंदु महतो, मंत्री दीपक बिरुवा, खरसावां विधायक दशरथ गागराई, ईचागढ़ विधायक सबिता महतो और प्रो. केपी सोरेन सहित सभी प्रमुख नेताओं का एक मंच पर आना महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश माना जा रहा है. यह तस्वीर कम से कम सार्वजनिक स्तर पर संगठनात्मक एकजुटता का संकेत देती है.
बैठक में प्रो. केपी सोरेन को बोलने का अवसर दिया गया और उन्होंने भी संगठन तथा कार्यकर्ताओं के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई. दूसरी ओर जिला अध्यक्ष ने अनुशासन और बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करने पर जोर दिया. यानी बैठक में किसी तरह के मतभेद का सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं हुआ.
हालांकि, इसे गुटबाजी के पूरी तरह समाप्त होने का प्रमाण मान लेना जल्दबाजी होगी. राजनीति में कई बार सार्वजनिक मंचों पर एकजुटता का प्रदर्शन संगठनात्मक मजबूरी भी होता है. विशेषकर तब, जब पार्टी को भविष्य के राजनीतिक कार्यक्रमों और चुनावी तैयारियों को लेकर एकजुट संदेश देना हो.
बैठक में 4 अगस्त, 8 अगस्त और 15 अगस्त के कार्यक्रमों की घोषणा तथा बूथ कमेटियों के पुनर्गठन का निर्णय यह संकेत देता है कि झामुमो अब संगठन विस्तार के अभियान को गति देना चाहता है. ऐसे समय में आंतरिक विवादों को सार्वजनिक होने देना पार्टी नेतृत्व के लिए नुकसानदायक हो सकता था.
प्रो. केपी सोरेन की सक्रियता भी अब संगठन के लिए एक नई परीक्षा होगी. यदि उन्हें जिला संगठन और शीर्ष नेतृत्व दोनों का समान सहयोग मिलता है तो यह झामुमो के लिए राजनीतिक रूप से लाभकारी हो सकता है. लेकिन यदि पुराने मतभेद फिर सतह पर आते हैं, तो यह संगठन के लिए चुनौती बन सकते हैं.
निष्कर्ष यह है कि रविवार की बैठक ने फिलहाल झामुमो में सुलह और समन्वय का संदेश जरूर दिया है. लेकिन यह कहना कि सभी मतभेद पूरी तरह समाप्त हो गए हैं, उपलब्ध तथ्यों के आधार पर संभव नहीं है. आने वाले दिनों में संगठनात्मक कार्यक्रमों में सभी नेताओं की सक्रिय भागीदारी, बूथ पुनर्गठन की प्रक्रिया और जिला नेतृत्व के बीच तालमेल ही तय करेगा कि यह एकजुटता स्थायी है या केवल राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप दिखाई गई एक रणनीतिक एकता. यह बैठक निश्चित रूप से झामुमो की जिला राजनीति में एक नया अध्याय खोलती है, लेकिन इसकी वास्तविक दिशा आने वाले महीनों में ही स्पष्ट होगी.





