सरायकेला: शनिवार को कुड़मी समुदाय द्वारा आहूत “रेल टेका- डहर छेका” आंदोलन के 24 घंटे बाद हावड़ा- मुंबई रेलखंड पर रेल परिचालान शुरू हो गया है. वैसे कोल्हान के सभी जगहों पर आंदोलन देर रात ही समाप्त कर दिया गया था मगर सिनी रेलवे स्टेशन से सटे मुंडाटांड रेलवे ट्रैक पर आंदोलनकारी पूरी रात डटे रहे और रविवार सुबह करीब 6:00 बजे पुलिस- प्रशासन के अनुरोध पर आंदोलन समाप्त किया.

आखिर क्या कारण रहा धरना पूरी रात चलने के पीछे
दरसल मुंडाटांड में भी आंदोलन शाम करीब 7:00 बजे के आसपास समाप्त हो चुका था. आंदोलन का नेतृत्व कर रहे नेताओं ने अपनी मांग पत्र सौंपकर धरना समाप्त करने की घोषणा कर दी मगर कुछ महिला और युवा आंदोलनकारी उपेक्षा का आरोप लगाते हुए धरने पर डटे रहे. उनका आरोप था कि हमारे समाज के नेताओं ने ही हमारे साथ धोखा किया और हमारे आंदोलन के साथ सौदा कर लिया. हमें केंद्रीय नेतृत्व से कोई आदेश नहीं मिला है इसलिए हमारा आंदोलन जारी रहेगा. जबकि आंदोलन में शामिल राजनीतिक दल JLKM, AJSU, कुड़मी सेना वगैरह के नेता कहीं नजर नहीं आए. ट्रैक पर बच गए थे स्थानीय ग्रामीण युवा और महिलाएं. छोटे- छोटे बच्चों के साथ महिलाएं रेलवे ट्रैक पर इस उम्मीद के साथ पूरी रात डटी रही कि उनके रहनुमा का आदेश आएगा तब वे ट्रैक से हटेंगी. युवा इस उम्मीद के साथ डटे रहे कि जो उन्हें यहां लेकर आए है वही उन्हें वापस घर तक पहुंचाने का प्रबंध करेंगे. मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ. न कोई नेता आया न कोई रहनुमा. पुलिस- प्रशासन ने उन्हें कई बार समझाने का प्रयास किया मगर आंदोलनकारी टस से मस नहीं हुए.

आंदोलन को बेचने का लगा आरोप
रेलवे ट्रैक पर डटे युवाओं और महिलाओं में इस बात को लेकर नाराजगी देखी गई कि उन्हें यहां तक लाने के लिए जो नेता सामने आए उन्हें वापस उनके गांव कौन भेजेगा. आंदोलन के लिए चंदा जुटाया गया उसका हिसाब कौन देगा. कुल मिलाकर मुंडाटांड में आंदोलन निसंदेह बड़ा था मगर आंदोलनजीवियों ने आंदोलन को बेच दिया.

पुलिस ने दिखाया संयम
एक अनुमान के मुताबिक करीब तीन हजार आंदोलन कारी यहां जुटे थे. इनके हैंसले इतने बुलंद थे कि मूसलाधार बारिश और प्रचंड गर्मी में भी आंदोलनकारी डटे रहे. जैसे- जैसे समय बीतता गया आंदोलन का नेतृत्व कर रहे नेता चलते बने यहां तक कि अपना मोबाईल तक बंद कर लिया. अंत में करीब डेढ़ सौ महिला- पुरुष और युवा डटे रहे. इनका न तो कोई नेतृत्व कर्ता था न वार्ताकार. पुलिस के समक्ष गंभीर चुनौती थी कि आंदोलनकारी को सुरक्षा भी देना है और सरकार की संपत्ति को भी बचाना है. कई दौर की वार्ता के बाद भी आंदोलनकारी टस से मस नहीं हुए. उन्हें यह लग रहा था कि आधी रात को अपने गांव कैसे जाएंगे कौन उन्हें अपने गंतव्य तक पहुंचाएगी. वैसे पुलिस उन्हें उनके गांव तक पहुंचाने का भरोसा देती रही मगर आंदोलनकारियों को पुलिस पर ऐतबार नहीं था. अंततः रविवार सुबह आंदोलनकारी स्वत: ही अपने-अपने गांव की ओर चल पड़े.

