जमशेदपुर: एक दौर था जब पुलिस की सबसे बड़ी ताकत उसकी वर्दी, हथियार या गाड़ी नहीं, बल्कि उसका सूचना तंत्र हुआ करता था. मोहल्ले से लेकर अपराध की दुनिया तक पुलिस के अपने सूत्र होते थे. यहां तक कि एक अपराधी दूसरे अपराधी की गतिविधियों की सूचना पुलिस तक पहुंचाता था. किस इलाके में नया गिरोह सक्रिय हो रहा है, कौन अपराधी जेल से बाहर आया है, कौन हथियार जुटा रहा है और किन लोगों के बीच पुरानी रंजिश चल रही है- इसकी भनक कई बार वारदात से पहले पुलिस को मिल जाती थी.


आज तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है. पुलिस के पास CCTV, मोबाइल लोकेशन, कॉल डिटेल और दूसरी आधुनिक तकनीक है. अपराध के बाद अपराधियों को दूसरे राज्यों तक खदेड़कर पकड़ने में पुलिस लगातार सफल भी हो रही है. लेकिन बड़ा सवाल है- पुलिस अपराधी तक वारदात से पहले क्यों नहीं पहुंच पा रही ? मुखबिर के विरुद्ध पुलिस द्वारा कई बार नकारात्मक वार्ताव के मामले सामने आते रहे हैं. कई मामलों में यह भी देखा गया है कि पुलिस स्थानीय सूचक को फंसाकर अपराधियों को राज बता देती है और अपराधी सूचक का दुश्मन बन जाता है.
जमशेदपुर में बीट पुलिसिंग पर मैनपावर की कमी का असर
जुलाई 2026 में सामने आई एक रिपोर्ट में जमशेदपुर के 15 थानों में कांस्टेबलों की गंभीर कमी का उल्लेख किया गया था. रिपोर्ट में पुलिस सूत्रों के हवाले से कहा गया कि कई थानों में केवल पांच से सात कांस्टेबल उपलब्ध थे. इसका सीधा असर गश्त, बीट पुलिसिंग और स्थानीय खुफिया जानकारी जुटाने पर पड़ने की बात कही गई थी. यही वह कड़ी है जिसे अपराध नियंत्रण की बुनियाद माना जाता है. बीट कांस्टेबल यदि नियमित रूप से मोहल्ले, बाजार, होटल, चाय दुकान, ऑटो स्टैंड और संवेदनशील इलाकों में लोगों से संपर्क में रहेगा, तभी स्थानीय गतिविधियों की जानकारी पुलिस तक पहुंचेगी.
पूर्वी सिंहभूम पुलिस ने अगस्त 2026 में QR कोड आधारित डिजिटल बीट पुलिसिंग व्यवस्था भी शुरू की. जिले को 102 शहरी और 104 ग्रामीण बीट में बांटकर बीट अधिकारियों को गश्त के साथ स्थानीय सूचना जुटाने और लोगों से संपर्क रखने की जिम्मेदारी दी गई. यह पहल बताती है कि पुलिस भी जमीनी स्तर की पुलिसिंग को मजबूत करने पर जोर दे रही है.
केनरा बैंक डकैती: इतनी बड़ी तैयारी, भनक क्यों नहीं ?
जमशेदपुर के गोलमुरी स्थित केनरा बैंक में 24 सितंबर को हुई डकैती इस सवाल को और गंभीर बनाती है. हथियारबंद अपराधियों ने बैंककर्मियों को बंधक बनाकर महज 24 मिनट में करीब 23 किलो सोना और 43 लाख रुपये नकद लूट लिए. घटना के बाद 20 अधिकारियों की SIT बनाई गई और जांच झारखंड से ओडिशा तथा चतरा तक पहुंची. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक पुलिस को जांच में यह भी संकेत मिले कि वारदात से पहले रेकी की गई थी.
पुलिस की बाद की कार्रवाई अपनी जगह है, लेकिन सूचना तंत्र के नजरिए से सवाल बड़ा है- यदि इतनी बड़ी डकैती के लिए अपराधियों ने पहले रेकी और तैयारी की थी, तो उसकी भनक स्थानीय सूचना तंत्र को क्यों नहीं लगी ? क्या अपराधी शहर में अपनी तैयारी करते रहे और पुलिस को उनकी गतिविधियों की जानकारी वारदात के बाद मिली ?
निखार सबलोक हत्याकांड: साजिश पहले, पुलिस को पता हत्या के बाद
24 अगस्त को होटल कारोबारी निखार सबलोक की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. जांच आगे बढ़ी तो पुलिस ने अशोक सिंह उर्फ राघव को मुख्य साजिशकर्ता बताते हुए गिरफ्तार किया. बाद की पुलिस जांच से जुड़ी रिपोर्टों में दावा किया गया कि हत्या की साजिश वारदात से कई दिन पहले तैयार हो चुकी थी और बाहर से शूटर बुलाने तक की योजना बनाई गई थी. यह मामला भी पुलिस के सामने वही सवाल खड़ा करता है. यदि हत्या के लिए पहले से साजिश रची जा रही थी, शूटरों की व्यवस्था हो रही थी और पुराने कारोबारी व भूमि विवाद जांच में सामने आए, तो पुलिस का जमीनी सूचना तंत्र हत्या से पहले उस हलचल को क्यों नहीं पकड़ सका ?
DD बार से बिंदल मॉल तक एक ही सवाल
DD बार के बाहर हिमांशु सिंह हत्याकांड हो या बिंदल मॉल में दिनदहाड़े फायरिंग- दोनों मामलों में वारदात के बाद पुलिस ने व्यापक कार्रवाई की. आरोपियों को पकड़ने के लिए दूसरे राज्यों तक दबिश दी गई. लेकिन अपराध नियंत्रण की कसौटी केवल यह नहीं है कि अपराधी कितनी जल्दी पकड़ा गया. एक महत्वपूर्ण कसौटी यह भी है कि पुलिस को अपराध की तैयारी की सूचना कितनी जल्दी मिली. यहीं पुराने और आज के पुलिसिंग मॉडल का फर्क दिखाई देता है.
पहले पुलिस की आंखें और कान मोहल्लों में हुआ करते थे. आज उसकी आंखें CCTV और कान मोबाइल सर्विलांस पर ज्यादा निर्भर होते दिखाई देते हैं. तकनीक अपराधी तक पहुंचा सकती है, लेकिन मजबूत मुखबिर तंत्र कई बार अपराधी तक वारदात से पहले पहुंचा देता है.
केनरा बैंक डकैती, निखार सबलोक हत्याकांड, DD बार हत्याकांड और बिंदल मॉल फायरिंग को एक साथ देखने पर किसी एक मामले को खुफिया विफलता घोषित नहीं किया जा सकता. लेकिन ये घटनाएं एक गंभीर सवाल जरूर छोड़ती हैं- क्या जमशेदपुर पुलिस का मानवीय सूचना तंत्र अपराधियों की बदलती रणनीति के मुकाबले कमजोर पड़ रहा है ?
और यदि जवाब तलाशना है तो शुरुआत मुखबिर से ही करनी होगी. आखिर वह व्यक्ति जो अपराधियों के बीच रहकर पुलिस तक खबर पहुंचाता था, आज जोखिम उठाने को तैयार क्यों नहीं है ? क्या उसे अपनी पहचान उजागर होने का डर है ? क्या उसे भरोसा है कि सूचना देने के बाद पुलिस उसकी सुरक्षा करेगी ? अपराध के बाद CCTV में अपराधी तलाशना जरूरी है, लेकिन अपराध से पहले उसकी योजना की खबर मिलना उससे भी बड़ी पुलिसिंग है. इसके लिए पुलिस और जनता के बीच भरोसा लौटाना होगा. बीट पुलिसिंग को मजबूत करना होगा. पुराने और विश्वसनीय सूचना स्रोत विकसित करने होंगे और सबसे महत्वपूर्ण- सूचना देने वाले व्यक्ति को यह भरोसा दिलाना होगा कि उसकी पहचान और सुरक्षा से समझौता नहीं होगा.
संतोष कुमार

