चांडिल: सरायकेला-खरसावां जिले के कपाली बस्ती में दुर्गा पूजा की परंपरा का इतिहास राजघराने से जुड़ा बताया जाता है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यहां मां दुर्गा की पूजा की शुरुआत राजा कुंवर विक्रम सिंह ने कराई थी. उस दौर में राजघराने की देखरेख में विधि-विधान से पूजा होती थी और धीरे-धीरे यह क्षेत्र की धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन गई.


बताया जाता है कि बाद में राजा आदित्य प्रताप सिंह देव के कार्यकाल में भी यह परंपरा जारी रही. राजघराने की ओर से अंतिम बार पूजा का आयोजन राजा आदित्य प्रताप सिंह देव ने कराया था. राजपाठ की व्यवस्था समाप्त होने के बाद भी कपाली में मां दुर्गा की आराधना की यह परंपरा नहीं टूटी.
राजपाठ खत्म हुआ तो स्थानीय लोगों ने संभाली विरासत
राजघराने का दौर समाप्त होने के बाद कपाली बस्ती के स्थानीय निवासियों ने पूजा की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली. आपसी सहयोग, श्रद्धा और सामूहिक भागीदारी के बल पर पूजा का आयोजन जारी रखा गया. समय के साथ नई पीढ़ियां भी इससे जुड़ती गईं और आज तक यह परंपरा कायम है.
कपाली की दुर्गा पूजा स्थानीय लोगों के लिए धार्मिक आयोजन के साथ ऐतिहासिक विरासत और सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक बन चुकी है. राजघराने से शुरू हुई परंपरा को स्थानीय लोगों ने न केवल सहेजा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का प्रयास भी जारी रखा है.
बदलते समय और राजव्यवस्था के समाप्त होने के बावजूद कपाली में दुर्गा पूजा का अनवरत जारी रहना स्थानीय लोगों की आस्था, सामाजिक एकजुटता और अपनी विरासत के प्रति लगाव को दर्शाता है.
रिपोर्ट: अफ़रोज़ मल्लिक

