जामताड़ा / Manish Barnwal देश में पसमांदा मुस्लिम समाज की लगातार उपेक्षा को लेकर ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के प्रदेश उपाध्यक्ष और वरिष्ठ पसमांदा नेता मौलाना अब्दुर रकीब अंसारी ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. उन्होंने कहा कि यह एक कड़वी सच्चाई है कि भारत की मुस्लिम आबादी का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा पसमांदा मुसलमानों का है, इसके बावजूद राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षणिक क्षेत्रों में उन्हें उनका वास्तविक हक़ और प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है.

मौलाना अंसारी ने कहा कि देश की लगभग सभी राजनीतिक पार्टियाँ मुस्लिम वोट की बात तो करती हैं, लेकिन पसमांदा मुस्लिमों के लिए अलग और सशक्त मंच बनाने से लगातार बचती रही हैं. उन्होंने मांग की कि सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दल अपने संगठनात्मक ढांचे में “पसमांदा मुस्लिम मोर्चा” का गठन करें, ताकि समाज के इस बहुसंख्यक तबके की आवाज़ सीधे निर्णय- निर्माण की प्रक्रिया तक पहुंच सके. मौलाना अंसारी ने कहा कि यह बेहद दुखद है कि जिन पसमांदा मुसलमानों ने देश की आज़ादी से लेकर लोकतंत्र की मजबूती तक हर स्तर पर योगदान दिया, वही आज राजनीतिक प्रतिनिधित्व, शिक्षा, नौकरियों और संसाधनों से वंचित हैं.
उन्होंने कहा कि पहले जो सीमित भागीदारी दिखाई देती थी, वह भी अब धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है. मौलाना अंसारी ने कहा कि पसमांदा मुस्लिम समाज की वर्तमान स्थिति किसी से छिपी हुई नहीं है. गरीबी, अशिक्षा, बेरोज़गारी और सामाजिक हाशिए पर धकेले जाने की पीड़ा आज भी पसमांदा मुसलमान झेल रहे हैं, जबकि तथाकथित नेतृत्व कुछ गिने-चुने प्रभावशाली वर्गों तक सीमित रह गया है. उन्होंने आरोप लगाया कि मुस्लिम समाज के नाम पर मिलने वाले राजनीतिक और सामाजिक लाभ चंद वर्गों तक सिमट जाते हैं, जबकि बहुसंख्यक पसमांदा समुदाय को केवल आश्वासन ही मिलते हैं.
मौलाना अंसारी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान का भी उल्लेख किया, जिसमें प्रधानमंत्री ने पसमांदा मुस्लिमों को मुख्यधारा में लाने की आवश्यकता पर जोर दिया था. उन्होंने कहा कि यह बयान न केवल महत्वपूर्ण है, बल्कि पसमांदा समाज की दशा और दिशा बदलने की दिशा में एक स्पष्ट संकेत भी देता है.
मौलाना अंसारी ने कहा कि यदि वास्तव में सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की बात की जाती है, तो पसमांदा मुसलमानों को सिर्फ़ वोट बैंक समझने की मानसिकता से बाहर निकलना होगा. उन्होंने कहा कि पसमांदा समाज को निर्णय- निर्माण की भूमिका में लाकर उनकी शिक्षा, रोज़गार और सामाजिक उन्नति के लिए ठोस और ईमानदार कदम उठाने होंगे. अपने बयान के अंत में मौलाना अंसारी ने कहा कि पसमांदा मुस्लिम समाज अब जागरूक हो चुका है और अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक और संगठित संघर्ष के रास्ते पर आगे बढ़ेगा. उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक 90 प्रतिशत आबादी को उसका हक़ नहीं मिलेगा, तब तक मुस्लिम समाज का समग्र विकास संभव नहीं है. पसमांदा मुसलमानों को हाशिए पर रखकर कोई भी राजनीति लंबे समय तक नहीं चल सकती.

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