जामताड़ा/ Yogesh Kumar झारखंड का यह ऐतिहासिक जिला दुर्गा पूजा की सदियों पुरानी परंपराओं और धार्मिक आस्थाओं को सहेजे हुए है. बंगाल की सीमा से सटे इस जिले में मां दुर्गा की पूजा- अर्चना राजा- महाराजाओं के समय से चली आ रही है. यहां की पूजा पद्धति, वेशभूषा और भव्य आयोजन बंगाल की झलक और झारखंड की आस्था का अद्भुत मिश्रण प्रस्तुत करते हैं.

नारायणपुर बाजार में लगभग 450 वर्षों से दुर्गा पूजा की परंपरा चली आ रही है. इसकी शुरुआत राजा डामर नारायण सिंह ने 16वीं सदी में की थी. आज उनके वंशज मनमोहन सिंह और कद्रवनारायण सिंह इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. महाष्टमी पर छप्पन भोग अर्पित किए जाते हैं और दूर- दूर से श्रद्धालु दंडवत करते हुए महतो तालाब से मंदिर तक पहुंचते हैं. अष्टमी से दशमी तक आदिवासी समाज आकर्षक झांकियों और ढोल- नगाड़ों के साथ मंदिर तक जुलूस निकालते हैं, जो श्रद्धा और सांस्कृतिक एकता का अद्भुत उदाहरण है.

जामताड़ा मुख्य बाजार में 109 वर्षों से दुर्गा पूजा धूमधाम से मनाई जा रही है. इसकी शुरुआत स्थानीय राजघराने ने की थी. पूजा का व्यय तिलाबाद के मांझी परिवार द्वारा वहन किया जाता है, जिन्हें राजा ने खेत दान में दिए थे. इस पूजा की खासियत मां दुर्गा के श्रृंगार में भक्तों द्वारा दान स्वरूप दिए गए सोने के आभूषणों का उपयोग है. हालांकि विसर्जन से पूर्व ये आभूषण उतार लिए जाते हैं.

कमरबाद पंचायत के तिलकी गांव में 500 वर्षों से पूजा होती आ रही है, जिसकी स्थापना जमींदार ठाकुर दास ने की थी. कुंडहित प्रखंड के खजूरी गांव में 450 वर्षों से वैष्णवी परंपरा में पूजा होती है, जो न्याय स्थल के रूप में भी प्रसिद्ध है. सहाना में 200 वर्ष, धर्मपुर में ढाई सौ वर्ष, मंडरो में 400 वर्ष तथा नाला में 500 वर्षों से राजाओं द्वारा स्थापित पूजा स्थलों पर अब भी श्रद्धा से पूजा होती है.

चूंकि जामताड़ा का नाला क्षेत्र पश्चिम बंगाल से सटा हुआ है, यहां की पूजा पद्धति और वेशभूषा में बंगाल की झलक स्पष्ट दिखाई देती है. अष्टमी से ही जिले भर में दर्जनों दुर्गा प्रतिमाओं की स्थापना के साथ मेले का आयोजन होता है. जामताड़ा बाजार क्षेत्र में लगने वाला मेला लोक संस्कृति, भक्ति और सामूहिक उल्लास का केंद्र बनता है.

भले ही आज जामताड़ा साइबर अपराध के कारण चर्चा में रहता हो, लेकिन इसकी दुर्गा पूजा की परंपरा इसकी असली पहचान है. यह परंपरा न केवल ऐतिहासिक है बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध है. जरूरत है इसे पहचानने और संरक्षित करने की.

